Friday, February 27, 2026

नरसंहार और घेटो: समकालीन भारत में मुसलमान

 


२७ फरवरी २००२ को, भारत के गुजरात राज्य के प्रशासन की देखरेख में एक भयंकर नरसंहार हुआ। इस हिंसा में २००० से अधिक भारतीय नागरिकों की मौत हो गई, जिनमें ज्यादातर निर्दोष मुसलमान थे, कई महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे।

इस दुखद घटना के बाद, भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को इस नरसंहार में कथित संलिप्तता के कारण २००५ से २०१४ तक संयुक्त राज्य अमेरिका और २००२ से २०१३ के बीच कई यूरोपीय देशों द्वारा वीजा देने से इनकार कर दिया गया था।

क्या अहमदाबाद (गुजरात, भारत) शहर का जुहापुरा घेटो भारत का गाजा है? क्या २००२ का गुजरात नरसंहार १९९४ के रवांडा नरसंहार के समान है? क्या कश्मीर भारत का वेस्ट बैंक है? और नरेंद्र मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच संबंधों की वास्तविक प्रकृति क्या है?

शार्लोत थोमा ने अपनी उल्लेखनीय किताब "नरसंहार और घेटो: समकालीन भारत में मुसलमान" पर आधारित हमारी चर्चा के दौरान इन सभी सवालों के जवाब स्पष्टता और दृढ़ विश्वास के साथ दिए।

२००२ के गुजरात नरसंहार के संदर्भ में, शार्लोत ने हाशिए पर पड़े हिंदुओं, विशेष रूप से बहिष्कृत आदिवासी आबादी का राजनीतिक अभिजात वर्ग द्वारा शोषण करके कैसे उन्हें एक अन्य हाशिए पर पड़े धार्मिक समूह:, मुसलमानों के खिलाफ जघन्य हिंसा को अंजाम दिया गया इस पर प्रकाश डाला है। उन्होंने सार्वजनिक सेवाओं के वितरण के भ्रष्ट और पूरी तरह से मनमाने तरीकों को उदाहरण के रूप में उद्धृत किया है।

शार्लोत का यह भी कहना है कि जुहापुरा का घेटोकरण एक जानबूझकर किया गया कृत्य है जिसका उद्देश्य मुसलमानों का आर्थिक शोषण जारी रखना और उन्हें भारतीय नागरिक के रूप में उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करना है। यह ध्यान देने योग्य है कि जुहापुरा में एकमात्र सर्वव्यापी सार्वजनिक सेवा कानून प्रवर्तन (पुलिस और न्यायपालिका) है। हालांकि जुहापुरा के मुसलमान अन्य सभी भारतीयों की तरह कर चुकाते हैं, फिर भी उन्हें स्कूल, अस्पताल, पीने का पानी और स्वच्छता जैसी आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं से वंचित रखा जाता है।

शार्लोत के अनुसार, अगर एक निष्पक्ष और प्रभावी कल्याणकारी राज्य का अस्तित्व, जो सभी को गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच का जिम्मा लेता, तो वह मुसलमानों के खिलाफ हिंसा के इन बर्बर कृत्यों के आकर्षण और उनमें भागीदारी को बेहद कम कर देता।

अपने शोध कार्य और जुहापुरा में लंबे समय के अपने ठहराव के दौरान, शार्लोत थोमा इस निष्कर्ष पर पहुंची हैं कि यह इलाका प्रभुत्व का प्रतीक होने के साथ-साथ प्रतिरोध का केंद्र भी है। जुहापुरा में प्रतिरोध के इस नए रूप का आंशिक कारण २००२ के नरसंहार के बाद शिक्षित, आर्थिक और सामाजिक रूप से गतिशील-सक्रीय मुस्लिम वर्ग का आगमन है।

साहस और शैक्षिक उत्कृष्टता का यह संगम आपके लिए प्रस्तुत है!

 

टिप्पणी:

१)       इस साक्षात्कार में दो भाषाओं में (इंग्रेजी और हिंदी) एक साथ उपशीर्षक उपलब्ध कराए गए हैं।

पता:

https://www.youtube.com/watch?v=lfMB4bYugXU

२)      इस साक्षात्कार को निम्नलिखित भाषाओं में एक लेख के रूप में पढ़ा जा सकता है: अंग्रेजी, फ्रेंच, हिंदी, मराठी और बंगाली।

पता:

https://thefrenchmasala.blogspot.com/2026/02/blog-post.html


 

अनुबंधनमस्ते! मेरा नाम अनुबंध काटे है  और मैं पेरिस में रहने वाला एक अभियंता हूँ।  आज मै शार्लोत थोमा को मेरे साथ  बातचीत के लिए यहाँ पाकर बेहद ख़ुश हूँ।  शार्लोत, आपका स्वागत है! 

शार्लोत: नमस्ते!

अनुबंध: आज हम आप की किताब के बारे में बात करने जा रहे हैं  जिसका शीर्षक है, "Pogrom and Ghetto" (नरसंहार और घेटो)। जो मुख्य रूप से हमें भारत के गुजरात राज्य में, अहमदाबाद शहर में बसे जुहापुरा नामक झुग्गी बस्ती, घेटो (ghetto)  की हकीकत बयां करता है।  यह किताब आपके  डॉक्टरेट शोध प्रबंध से उभरी है।

लेकिन, शार्लोत, सबसे पहले  मैं आपका परिचय कराना चाहूंगा। तो, पहले आपकी शिक्षा। आपने साइंसपो तूलूज़ (Toulouse) से अंतरराष्ट्रीय संबंध, संघर्ष, जोखिम (risk)  और सुरक्षा जैसे विषयों पर  २००२-२००६ में मास्टर की उपाधि ली। फिर, २००६-२००९ के बीच…  क्या यह  साइंसपो पेरिस में था?

शार्लोत: जी हां, दरअसल, उस वक्त मैं पहले से ही साइंसेज पो तूलूज़ में थी। चूंकि मेरा जन्म १९८३ में हुआ था, इसलिए मैंने ३५८ के सुधार से  पहले ही अपनी पढ़ाई पूरी कर ली थी। तो, वास्तव में,  मैंने साइंसेज पो से अंतिम वर्ष की उपाधि पूरी की। यह शैक्षिक उपाधि अंतर्राष्ट्रीय संबंध और साथ ही राज्य के समाजशास्त्र पर केंद्रित थी। हालांकि, यह स्नातकोत्तर उपाधि नहीं थी। यह था मेरे डिप्लोमा का चौथा साल जिसके भीतर मैंने अपना  पहला शोध प्रबंध (research paper) लिखा। और मुझे लगता है शायद यही कारण है जिसने आपका ध्यान इस ओर आकर्षित किया।  इसके अलावा, यह आज हमारे लिए प्रासंगिक है क्योंकि  इस दौरान मेरे इस पहले शोध प्रबंध के लिए, मैंने विनोबा भावे पर काम किया,  जो कि (महात्मा) गांधी के एक साथी थे। और मै इस बात पर काम कर रही थी कि धार्मिक शब्दावली का प्रयोग करके विनोबा भावे कैसे एक लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर और गैर-सांप्रदायिक तरीके से, भारतीयों के लिए एक लोकतांत्रिक तरीके कि रुपरेखा तैयार कर रहे थे।

तो, यह सिर्फ उस बात को स्पष्ट करने के लिए था। हम मेरी किताब पर भी वापस आएंगे। लेकिन यह (जुहापुरा) कोई झुग्गी बस्ती नहीं है, बल्कि वास्तव में एक घेटो (ghetto) है। यह बहुत अलग है और यही हमारे चर्चा का विषय है।  इसीलिए इसे कहना अहम् है।

और फिर साइंसेज पो पेरिस के बारे में। बाद में मैंने साइंसपो पेरिस में नौकरी कर ली। मुझे वहाँ स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में दाखिला मिल गया। २००६ में साइंसेज पो पेरिस में मुझे स्नातकोत्तर उपाधि करने का मौका मिल गया। इस बार, वास्तव में, मैंने राजनीतिक रूप से उन्मुख (oriented) संबंधों का तुलनात्मक अध्ययन किया। दरअसल, यह उस समय एशिया विकल्प के साथ मौजूद था और इस दायरे में संयुक्त राज्य अमेरिका और मध्य पूर्व भी थे। इसी ढांचे के भीतर ही आगे चलकर मैंने जुहापुरा पर अपना शोध प्रबंध शुरू किया। इसलिए, जिस जगह की हम बात कर रहे हैं, जिस मुस्लिम इलाके की हम बात कर रहे हैं, यह अहमदाबाद के बाहरी इलाके में स्थित है। यह ध्यान देने योग्य है कि अहमदाबाद  गुजरात राज्य की आर्थिक राजधानी है, और यह राज्य उत्तर पश्चिमी भारत में स्थित है।

अनुबंधबिल्कुल सही। धन्यवाद।

मैं इसमें कुछ और जानकारी जोड़ना चाहूँगा। तो, २०१७ से २०२१ के बीच CERI में आपने पीएचडी का पद भी संभाला था।

लेकिन, मुझे अभी भी एक बात पर फिरसे आना होगा। चूँकि आपने विनोबा भावे का उल्लेख किया है, मुझे इसमें हमारी चर्चा से संबंधित कम से कम एक समान धागा दिखता है, या फिर दो समान धागे। क्योंकि किताब में आपने अहमदाबाद के गांधी जी के साबरमती आश्रम के बारे में भी बात कि है। और मेरी निजी बात करें तो मेरा जन्म भारत में हुआ था।  उस शहर में जहां गांधी जी ने अपना दूसरा आश्रम (सेवाग्राम), वर्धा (महाराष्ट्र) में स्थापित किया था। और इसी शहर में विनोबा भावे का पवनार (वर्धा) आश्रम भी है।

अब आइए, आपके पेशेवर अनुभवों के बारे में बात करते हैं। २००७ से २००९ के बीच, आपने कुछ समय के लिए  "कूरियर इंटरनेशनल" ("Courrier International") में,  एक पत्रकार के रूप में काम किया था।

शार्लोत: दरअसल, यह मेरी स्नातकोत्तर उपाधि के दौरान, मेरी पढ़ाई के साथ-साथ चलता था। क्योंकि, यदि हमारे श्रोताओं ने मुझे ध्यान से सुना है, तो ये दौर मेरे स्नातकोत्तर उपाधि के संबंध में मूल्यांकन से भी मेल खाता हैं। दरअसल, स्नातकोत्तर उपाधि के दौरान मैंने कूरियर इंटरनेशनल में काम किया, जहाँ मैं "दक्षिण एशिया अनुभाग प्रमुख" के पद पर, इंग्रीड थेरवाथ (Ingrid THERWATH) की जगह पर नियुक्त कि गयी थी।

अनुबंध: और हमारे भारतीय श्रोताओं के लिए,  "कूरियर इंटरनेशनल" के बारे में कुछ जानकारी। यह एक बहुत ही रोचक समाचार पत्र है जो विभिन्न देशोंके बारे में  लेख प्रकाशित करता है। मूलतः, ये लेख विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित होते हैं जिसका बाद में "कूरियर इंटरनेशनल" द्वारा फ्रेंच भाषा में अनुवाद किया जाता है।

इसके बाद, २०१४-२०१५ के बीच आपने साइंसेज पो लिल (Lille) में भी काम किया। फिर, साइंसेज पो ल हाव्र में आपने पाठ्यक्रम पढ़ाए…

शार्लोत: दरअसल, हर बार, मैं वहां कक्षाएं पढ़ाती थी। मैं कभी भी साइंसपो पेरिस या साइंसपो लिल की कर्मचारी नहीं थी। मैं बस कभी कबार वहाँ  कुछ पाठ पढ़ाती थी।

अनुबंध: बहुत खूब। तो अब हम आगे बढ़ते हैं।

अब आपकी किताब के बारे में बात करना शुरू करते है। सबसे पहले, मैं चाहूंगा कि आप हमें समझाएं कि इस किताब को लिखने का विचार आपको कैसे आया? आपने यह मसला क्यों चुना? यह सब कैसे हुआ?

शार्लोत: तो, वास्तव में, पुरातत्व के रूप में… क्योंकि मैं  फूको (Michel FOUCAULT) के पुरातत्व का अनुसरण करती हूँ... अंत में, मैं जिस सैद्धांतिक ढांचे का उपयोग मेरे शोध प्रबंध में करती हूँ उसका सम्बन्ध मिशेल फूको से है। तो, इसलिए मैं इसे "फूकोल्डियन पुरातत्व" से संबोधित करुँगी। यह सब बहुत लंबे समय से चला आ रहा है क्योंकि… तो, मैंने अपना फैसला कर लिया था…

सबसे पहले, दर्शकों को समझाने के लिए, जिस किताब की हम बात कर रहे हैं,  "नरसंहार और घेटो: समकालीन भारत में मुसलमान", यह एक किताब है जो मेरे शोध प्रबंध से निर्मित है। इसलिए, मैंने पहले किताब लिखने का विकल्प नहीं चुना। हालाँकि शोध प्रबंध के बाद किताब प्रकाशित हुई है। और मैं उस पर बाद में बात करूंगी, लेकिन किताब लिखना... यह एक तरह से अपने प्रबंध को दोबारा लिखने जैसा है।

इसके अलावा, इस किताब में मैंने कुछ चीजों को शामिल नहीं किया है जैसे कि जो भी सैद्धांतिक ढांचा मैंने तैयार किया था,  जिसे मैंने अपने शोध प्रबंध में प्रदर्शित किया था। और खास कर के यह गुमनामी बनाए रखने और लोगोंके संरक्षण के कारणों कि वजह से किया था, विशेष रूप से मौजूदा राजनीतिक संदर्भ में जिसमें हम मेरे साक्षात्कारकर्ता, जैसा कि उन्हें कहा जाता है... उनकी सुरक्षा की बात कर रहे हैं इसलिए मैंने एक पूरा अध्याय ही निकाल दिया था।  मेरे मानवजाति-वर्णन (ethnography) में  यानी, वास्तव में... अंत में स्थानों और लोगों के बारे में, जिनकी मै बात कर रही हूँ, उनके बारें में एक बहुत सटीक जानकारी देने के लिए... तो, मेरे शोध के पुरातत्व की ओर वापस लौटते हैं। 

दरअसल, संक्षेप में कहें तो मुझे भारत में दिलचस्पी, मेरी १५ साल की उम्र से ही है। और जब मैं बहुत छोटी थी, तो मुझे किस बात में ज्यादा दिलचस्पी थी?  तो, मैं नॉर्मंडी (Normandy, France) से आती हूँ। मैं ५४३ निवासियों वाले एक गाँव में पली-बढ़ी। और ऐसे माता-पिता के साथ जिन्हें न तो किसी अंतरराष्ट्रीय मामले में और न ही किसी विदेशियों में कोई दिलचस्पी थी। इसलिए, यह मेरे इर्दगिर्द के माहोल से बिल्कुल भी मेल नहीं खाता था। लेकिन मुझे नहीं पता, यह सब कैसे हुआ... अक्सर जिंदगी हमारे साथ अजीबोगरीब चीजें करती है। और अगर आप को पूरा सच बताना है तो मेरी दादी ने  जियो पत्रिका (Geo, magazine) की सदस्यता ले रखी थी। यह एक भूगोल पत्रिका है, जो वास्तव में दुनिया के अलग अलग देशों के बारे में  बात करता है। तो, वास्तव में, मेरे घर के छोटी सी खिड़की से, घाटी के बिल्कुल निचले हिस्से से… मेरे पास संयोगवश से बाकी दुनिया पर एक खुली खिड़की थी।

और फिर, जिस चीज में १५ साल की उम्र से मेरी रुचि रही है...  इस मामले में, तो यह वास्तव में  धर्म और राजनीति के बीच संबंध है। क्योंकि, दरअसल, मैं हूँ...  तो, मैं… मैं फ्रांसीसी हूँ। मेरा समाजीकरण (फ्रांसीसी) धर्मनिरपेक्षता (Laïcité) के एक निश्चित ढांचे के भीतर हुआ है, जिसमें राज्य का  सभी धर्मों के प्रति एक उदारवादी दृष्टिकोण होता है, लेकिन जिसमें  किसी एक धर्म को राज्य का अधिकृत धर्म होकर मान्यता नहीं होती है। खैर, सब बातों पर विचार करें तो मोटामोटी यहाँ कोई धर्म मौजूद नहीं होता है... मेरा मतलब है सार्वजनिक स्थानों में,  बहुत बड़े पैमाने पर... और वैसे निजी स्थानों में भी, यह बहुत ज्यादा उपस्थित नहीं होता है। लेकिन विशेष रूप से सार्वजनिक स्थानों, आदि में। और दरअसल, मैं संयोगवश इसी तरह भारत के संपर्क में आ गयी। और इसके अलावा,  यह किसी दूसरे ज़माने का भारत था। यह तब भी एक धर्मनिरपेक्ष भारत था। इसलिए, मेरे मन में कांग्रेस दल (भारत के) के बारे में  बहुत सारे नकारात्मक विचार हैं लेकिन उस समय (भारत में)  कांग्रेस दल द्वारा सरकार थी। हालाँकि १९९९ से २००४ के बीच भाजपा का एक संक्षिप्त कार्यकाल रहा। लेकिन जो बहुत कम आक्रामक था अगर आज की तुलना में उसे देखें तो … क्षमा कीजिए, लेकिन मेरा मतलब है कि जो आज की तुलना में बहुत कम जहरीला था। तो, असल में बात यह थी कि किस तरह मै  भारत के बारें मै कुछ थोड़ी बहोत चीज़े समझ रही थी... और फिर… मेरी धर्मनिरपेक्षता में रुचि बढ़ने लगी। और उच्च माध्यमिक विद्यालय में मैंने सामाजिक विज्ञान भी पढ़ा। मैंने समाजशास्त्र कि पहचान कि जो वास्तव में, मुझे लगता है, मेरे जीवन का  सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक अनुभव बना और जिसने, मेरे राजनीतिक विचार को भी प्रभावित किया। मुझे लगता है कि जब आप राजनीतिक समाजशास्त्र पढ़ते हैं, इसके बाद हमें जिसे "योग्यता-आधारित व्यवस्था" (meritocracy) कहा जाता है,  उसे वस्तुनिष्ठ रूप से स्वीकार करने में कठिनाई होती है... क्योंकि हमें पता चल जाता है कि इसका अस्तित्व ही नहीं है...यथार्थ में, किताबों में… मतलब, असल व्यवहार में। संक्षेप में कहें तो, मुझे इन सब चीजों में  थोड़ी बहुत दिलचस्पी थी।

और फिर, मुझे इस बात में भी रूचि थी कि (भारत में) अलग अलग धर्म कैसे रहते हैं। तो कोई कैसे भारत जैसे देश में  अपने धर्म का पालन कर पाता है,  एक लोकतांत्रिक ढांचे के  भीतर रह कर... तो, ठीक है...  मेरा मतलब है कि एक ऐसे ढांचे में जो  गणतांत्रिक (Republican) और लोकतांत्रिक है। तो, मेरा पहला कदम वह विनोबा भावे के  बारे में शोध प्रबंध था, जिसकी मै बात कर रही थी। क्योंकि विनोबा के बारे में मुझे जो बात दिलचस्प लगी, वह यह थी कि वह एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी हिंदू संस्कृति और हिंदू धर्म का दावा, एक ऐसे माध्यम से, एक ऐसी शब्दावली का इस्तमाल करके किया जिसमें हिंदू धार्मिक संज्ञाएँ एक अत्यधिक प्रभावित तरीके से इस्तमाल कि गयी थी, हालांकि, जैसा कि मैंने पहले कहा था, उनका राजनीतिक विचार फिर भी लोकतांत्रिक था। उन्होंने इस दृष्टिकोण का उपयोग करके, लोगों को हिंदू धार्मिक शब्दावली का इस्तमाल करके लोकतांत्रिक और गणतंत्रात्मक राजनीतिक प्रक्रिया से परिचित कराया। इसलिए, धीरे-धीरे, समय के साथ मैं इस विषय के संपर्क में रही। मैं ये सब इसलिए यहाँ कह रही हूँ क्योंकि हम भारत से मेरे जुड़ाव की कहानी जान रहे है। उदाहरण के लिए, किसी एक निश्चित मोड़ पर,  मुझे ऐसा भी लगा कि क्या मैं (भारतीय) कम्युनिस्ट पार्टी पर काम करना चाहूंगी? अंततः सीपीआई (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) की पार्टियां,  मतलब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियां। क्योंकि मेरा सवाल अभी भी प्रासंगिक था। आप धर्म और राजनीति को किस प्रकार व्यक्त करते हैं? (फ्रांस से भिन्न) किसी अन्य देश में, मतलब संस्थागत और संस्थागत संदर्भ में,  वैचारिक दृष्टि से,  जो कि धर्मनिरपेक्षता है... और यह धर्मनिरपेक्षता है जो कि “Laïcité” (फ्रांसीसी धर्मनिरपेक्षता) से बेहद अलग है। यह मेरे पसंदीदा तर्कों में से एक है। कभी-कभी मुझे लोगों को यह बात समझाने में कठिनाई होती है क्योंकि वे अक्सर  जल्दबाजी में होते है। हालाँकि, (भारतीय) धर्मनिरपेक्षता  यह “Laïcité” (फ्रांसीसी धर्मनिरपेक्षता) के समान नहीं है। बिलकुल नहीं! क्योंकि, भारतीय राज्य के विपरीत फ्रांसीसी राज्य किसी भी धर्म को  मान्यता नहीं देता। कुछ दिनों पहले तक, भारतीय राज्य... क्योंकि इस समय इसकी स्थिति वास्तव में बहुत खराब है। लेकिन धार्मिक समूहों और लोगों को (संवैधानिक रूप से) भारतीय राज्य अपने निजी कानून, जैसे कि विवाह, विरासत और परिवार पर निजी कानून बनाने की अनुमति देता है ।

संक्षेप में, पीसी (कम्युनिस्ट पार्टी) और फिर, खैर, यह उस वक्त मुझे... मुझे यह थोड़ा अस्पष्ट लगा। खैर, उसके बाद हम २००० के दशक में हैं।  इसमें... मैंने भारत की अपनी पहली यात्रा की। अंततः, यह यात्रा २००४ में साइंसेज पो में  मेरी पढ़ाई के दौरान कि गयी थी। इस प्रकार, मैं २००५ में (फ़्रांस) वापस आ गयी थी। मैं विनोबा भावे पर यह शोध अध्ययन लिख रही थी। और फिर मैं आगे बढ़ी। इसलिए लगभग २००६ के आसपास,  मेरा वह कम्युनिस्ट पार्टियों पर दृष्टिकोण चल रहा था।

और फिर मेरी परवरिश ईसाई धर्म कि है… दरअसल, मेरी परवरिश... तो, मेरी परवरिश इसाई रीति-रिवाजों के अनुसार हुई है। मेरी विद्यालय तक कि पढाई भी एक निजी (कैथोलिक) विद्यालय में  हुई है। मुझ पर सारे धार्मिक संस्कार आदि किये गए थे। हालाँकि, चर्च के प्रति मेरा दृष्टिकोण बहुत आलोचनात्मक है। मतलब, एक संस्था के तौर पर, लेकिन खैर कोई बात नहीं। मैं इसाई समुदाय को थोड़ा बहुत जानती हूँ, इसलिए मैंने मन ही मन सोचा, वाह, सच में…  मैं लोगों को यह सब इसलिए बता रही हूं क्योंकि यह जानने के लिए जरुरी है कि कैसे हम ज्ञान और अनुसंधान का सफ़र तय करते है।

मैंने मन ही मन सोचा, वे मुसलमान जो संयोगवश, हिंदुओं के बाद भारत में मौजूद दुसरा सबसे बड़ा जातीय-धार्मिक समूह है। और इसीलिए भारत, इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। मैंने मन ही मन सोचा, "अरे वाह, मुसलमान!" और दरअसल उस समय, यानी २००६ में, आप इन्टरनेट पर “भारत में मुसलमानों” को टाइप करते हैं तो आपको तुरंत ही तरह-तरह के लेख मिल जाते थे। मेरा मतलब है कि उस वक्त  २००२ के मुस्लिम विरोधी नरसंहार पर प्रति सप्ताह कई लेख लिखे जाते थे। यह नरसंहार जो गुजरात राज्य के उस वक्त के नरेंद्र मोदी सरकार के तहत घटित हुआ था, जो आज भारत के  वर्तमान प्रधानमंत्री है और जो २००१ और २०१४ के बीच  गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री थे। इसलिए मैंने मन ही मन सोचा, यह एक ऐसा विषय है जिसमें मेरी रुचि है!  लेकिन फिर, क्योंकि मेरा सवाल  यह नहीं था की... जब मैंने और छानबीन की... तो फिर सवाल पहले जैसा नहीं रहा... तो अब हम उस मुद्दे की जड़ तक पहुँच रहे हैं जो मेरी पीएचडी शोध प्रबंध और किताब के संबंध में है। लेकिन मेरा सवाल था... इसका सीधा संबंध नरसंहार से नहीं था। क्योंकि मुझे पता था कि पहले से ही इस विषय पर उत्कृष्ट शैक्षिक (academic)प्रकाशन मौजूद थे। मेरा मतलब है, ये प्रत्यक्षदर्शी विवरण थे जो बहुत अहम् हैं। उदाहरण के लिए, मैं सोच सकती हूँ लेखक जैसे हर्ष मंदर, तीस्ता सेतल्वाद और … मुझे कुछ नाम याद नहीं आ रहे हैं क्योंकि वास्तव में ऐसे बहुत सारे शख्स थे। और खैरत है कि ये कार्यकर्ता, ये सामाजिक कार्यकर्ता उस समय, जब नरसंहार हो रहा था,  दस्तावेजीकरण के लिए, जब यह घटनाक्रम घटित हो रहा था, उस वक्त वहां मौजूद थे। मुझे सेद्रिक प्रकाश भी याद है। 

अंत में, वास्तव में ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो बहुत महत्वपूर्ण थे, और जिन्होंने परिणामस्वरूप उस समय हिंसा के बारे में विस्तार से दस्तावेजीकरण किया है। तो, इस हिंसा का परिणाम यह है कि... तो इस “हिंसा की भयावहता” इन विवरणों (reports) में पाई जा सकती है जैसे कि « Human Rights Watch » ("ह्यूमन राइट्स वॉच")। एक और विवरण है जिसका नाम मुझे याद नहीं आ रहा… लेकिन हाँ...  जी हां, वह था, "हमें आपको बचाने का कोई आदेश नहीं मिला है।"  यह "ह्यूमन राइट्स वॉच" द्वारा बनाया गया है।

लेकिन मेरा सवाल यह था: एक बार, एक मुस्लिम धर्म के भारतीय नागरिक के रूप में ... और जब कि अपने धर्म का पालन करना यह एक संवैधानिक अधिकार है… मैं आपको  याद दिला दूं कि भारत आज भी एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र है  जो किसी एक धर्म को मान्यता नहीं देता, और इसलिए यह एक धार्मिक सिद्धांत पर आधारित भेदभाव को नकारता है। इसलिए, एक बार जब आपकी सरकार आपके साथ ऐसा कर देती है... क्योंकि आज इसमें अधिकारियों की प्रबल मिलीभगत  काफी हद तक सिद्ध हो चुकी है। मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि नरेंद्र मोदी को  संयुक्त राज्य अमेरिका (२००५-२०१४) और यूरोप (२००२-२०१३) ने वीजा देने से इनकार कर दिया था। लगभग २०१३ तक कथित तौर पर  इस नरसंहार में संलिप्तता के कारण और उनके  स्थानीय राज्य मंत्रियों की संलिप्तता के कारण।

अंत में,  जब मैं "राज्य सरकार" कहती हूं तो मेरा तात्पर्य स्थानीय (गुजरात) राज्य से है... दरअसल, एक बार जब आपकी सरकार (राज्य) ने  आपके साथ ऐसा कर लिया है तो मेरा सवाल यही था; आप दोबारा नागरिक कैसे बनते हैं? तो, यह वास्तव में कैसे काम करता है? तो, आपका इस प्रक्रिया में क्या होगा ? आपकी भूमिका और आपका भविष्य क्या है? मैं यहां मुसलमानों की बात कर रही हूं, मुसलमानों के रूप में, भारतीय मुस्लिम धर्म के नागरिकों के बारें में। (राज्य) अधिकारियों के साथ आपके संबंध कैसे हैं? आप अब अपने राज्य के साथ अपने संबंध किस तरह से संजोगते हैं? वह राज्य जो न केवल आपकी रक्षा करने में विफल रहा, लेकिन जिसने आप पर जुल्म ढाने के लिए सक्रिय रूप से काम किया! और फिर इसके विपरीत, एक बार जब अधिकारियोंने  ऐसा कर लिया है... तो इसमें उनका लक्ष्य क्या था?  क्योंकि, और हम इस पर फिर से चर्चा करेंगे,  जब हम मेरे काम के बारे में विस्तार से बात करेंगे। और मैं इस नरसंहार के बारे में क्यों बात कर रही हूँ, इसके पीछे एक वास्तविक कारण है। मैं घेटो के बारे में भी क्यों बात कर रही हूँ...?  आज इसका एक ठोस कारण है। तो, एक बार जब अधिकारियों ने आपके साथ ऐसा कर दिया, जिन्होंने आप पर इस हद तक हिंसा बरसाई, वे आपको फिरसे नागरिक कैसे बनने देते हैं? और बस! यही मेरे अनुसंधान पुरातत्व का  शुरुआती बिंदु है।

अनुबंधसमझ गया। बहुत-बहुत धन्यवाद। चलिए आगे बढ़ते हैं। 

मुझे आपकी किताब में सबसे अच्छी बात यह लगी… मै कहूँगा कि मेरे लिए, कम से कम दो प्रमुख पहलू हैं।

सबसे पहले, मैं वास्तव में इसकी सराहना करता हूँ वह है इसकी शैक्षणिक गहराई। इसकी संदर्भ सूची बहुत विस्तृत है।  अंग्रेजी में कई संदर्भ उपलब्ध हैं। इस में अंग्रेजी और फ्रेंच के समाचार विवरण और लेखोंके कई सन्दर्भ मौजूद हैं।  इसलिए, यह पहली बात है।

दूसरी बात, यह वास्तव में आपके क्षेत्रीय अवलोकन और साक्षात्कार के बारें में है। वे विपुल मात्रा में मौजूद हैं। यह उस समय की बात है जब आप वहां रही थी। और जिस वक्त आपको तीन स्थानीय परिवारोंद्वारा उनके घर रहने का न्योता दिया गया था। जैसे कि आपने किताब में यह बात लिखी है। इससे आपको एक "पक्की जुहापुरा वाली" लड़की बनने का मौका मिला! और यह वाकई बहुत बढ़िया बात है!

हालाँकि, भले ही अब परिस्थितियाँ शायद अनुमान लगाने के लिए आसान और स्पष्ट है, फिर भी मैं चाहूंगा कि आप हमें एक बात समझा दें। कुछ संदर्भों के लिए, आपने लिखा है कि "यह संदर्भ अब उपलब्ध नहीं है।" ऐसा क्यों?  खैर… मेरे पास तो इसका जवाब बिल्कुल भी नहीं है! 

तो कृपया इस सवाल का जवाब दीजिए! 

शार्लोत: सबसे पहले मुझे यह भी स्पष्ट कर देना चाहिए,  जी हाँ, आपने जिक्र किया था… बस समझाने के लिए, देखिए,  जमीनी कामकाज कैसे करते है और बाकी सब कुछ... इसमें कई बारीकियाँ हैं… जब आप शोध प्रबंध लिखते हैं, आप बहुत सारे स्रोतों और संदर्भों को पढ़ते हैं। इसके लिए अंग्रेजी में कई संसाधन उपलब्ध हैं। क्योंकि कई… औपनिवेशिक (colonial) संबंधों और जुड़ावों के कारण  कई स्रोत अंग्रेजी में हैं। कई शोध पत्र अंग्रेजी में हैं। और फिर कई प्राथमिक स्रोत भी मौजूद हैं। वैसे प्राथमिक स्रोत किसे कहते हैं? उदाहरण के लिए, मैं इसी तरह से मुस्लिम या इस्लामी संगठन के धार्मिक पहलुओं पर छानबीन करती हूँ। तो, मेरे लिए, जिसे हम प्राथमिक स्रोत कहते हैं वह यह है जिसको मैंने पढ़ा। मैंने उनकी विवरण पुस्तिका, उनके  प्रकाशन और सब कुछ पढ़ा... बस इतना ही। सेवाभावी संस्थाओंके विवरण और ऐसा बाकी सब कुछ। ये सब प्राथमिक स्रोत हैं। इसलिए, वास्तव में  यही "कच्चा या प्रारम्भिक तथ्य” (“raw data”) है। यह एक बात है और दूसरी ओर विवरण पुस्तिका के लिए... दरअसल, शोधकर्ताओं के लिए इसे पढ़ना जरुरी है,  इस बात को समझने के लिए कि लोग कैसे सोचते हैं। दरअसल,  जिन लोगों का हम अध्ययन करते हैं... जिन नायकों का हम अध्ययन कर रहे हैं, वे कैसे सोचते हैं।

और इन परिवारों के बारे में भी मै कुछ कहना चाहूँगी। अंततः, वास्तव में इनके लिए… यह बस दिखावे या हावभाव के लिए नहीं है। हालांकि, मेरी इनके प्रति कृतज्ञता असीम है। इन लोगों की ओर जिन्होंने मेरा स्वागत किया। और वैसे जिनसे मैं हमेशा सहमत नहीं होती थी। जिनके साथ, ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ कि हमेशा सब कुछ सुचारू रूप से चलता रहे… तो… खैर, मुझे यह "पश्चिमी"("Western")शब्द का प्रयोग बिल्कुल पसंद नहीं है... यह शायद इसलिए किया जाता है क्योंकि... मुझे लगता है कि यह कुछ हद तक एक सरलीकरण है। फिर भी, मेरा मतलब है,  एक फ्रांसीसी महिला के लिए  यहाँ आकर पूर्ण तल्लीनता के साथ  एक उच्च वर्गीय मुस्लिम परिवार में, जो हालाँकि आर्थिक दृष्टिकोण से गरीब है... जैसे उस वक्त मैं किसी आलीशान कमरे में नहीं ठहरी थी। नौकरानियों के फ़ौज के साथ और बाकि सुविधाओं के साथ... मैं १० लोगों के साथ, एक ही कमरे में सोती थी... मेरा मतलब है, घर के आम बैठक कक्ष में, इत्यादि।  मैं रोजमर्रा के कामों में हिस्सा लेती थी, जो कि काफी संघर्षपूर्ण था… क्योंकि " रोजमर्रा के कामों में भाग लेने का अधिकार" प्राप्त करने के लिए घर में मुझे एक "जुहापुरवाली" के रूप में पहचान की जरूरत थी, न कि एक अतिथि के रूप में। और मैं कहती थी,  "लेकिन मैं मेहमान नहीं हूँ! मैं आपके परिवार की एक सदस्य हूँ!” और यह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था। यही सबसे महत्वपूर्ण है… मेरे लिए यह अनुभव मेरे जीवन का एक अविश्वसनीय, अद्भुत अनुभव था। यह अनुभव, क्योंकि, मुझे लगता है कि इसके लिए आपकी अनुकूलता (to adapt) की अच्छी क्षमता की भी  आवश्यकता होती है। क्योंकि आपको इस तरह से एक ऐसे माहौल में खुद को ढालना होता है जो आपके अपने माहौल से बेहद अलग है...

और इसमें आपको अनेक नयी चीज़े सिखने का अवसर मिलता है... खास कर के यह जानते हुए कि, चूंकि मैं एक महिला हूँ,  लोगों को मेरे साथ कैसे बर्ताव करे, मुझे किस श्रेणी में रखे, यह तय करने में परेशानी हो रही थी। इस प्रकार, मुझे पुरुषों के सामाजिक दायरे तक पहुंच प्राप्त थी। यह तो वाकई बेहद अजीब था …उनके लिए यह अजीब था क्योंकि मुझे उनकी बातचीत सुनने का अधिकार था... यह इस लिए क्योंकि मेरे साथ कैसे बर्ताव करे यह वे तय नहीं कर पायें … जो भी हों, वे मेरा सही आकलन नहीं कर पाए। साथ ही वो सब कुछ जो इसमें आता है... जो की पीछे रसोईघर में चुपचाप से चलते रहता है … महिलाओं की बातचीत, खाना पकाने के वक्त जो सब कुछ होता है … यह एक घिसे-पिटे मुहावरे जैसे लगेगा  लेकिन जो कुछ भी उस वक्त होता है... उदाहरण के लिए, जब हम खाना बनाते हैं। उस वक्त हम एक दूसरे से  जो कुछ भी कहते हैं और हमारे आसपास जो कुछ भी होता है... वास्तव में, वह सब कुछ बहुत ही समृद्ध  और वास्तव में अविश्वसनीय था।

मैं आपका प्रश्न भूली नहीं हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि यह सब बताना जरूरी है। क्योंकि यही चीज़ आपके “असल काम" को बनाती है। और इसका  यह मतलब नहीं है कि... मैं लोगों को यह बात भी बताती हूं कि... इसका मतलब यह नहीं है कि "हम लोगों की बातों को अक्षरशः सत्य मान लेते हैं।” यह एक ऐसा वाक्य है जिसे हम अक्सर खुद से दोहराते हैं;  जब आप वैज्ञानिक होते हैं, तो आप हमेशा साक्षात्कारकर्ता के शब्दों को गंभीरता से लेते है लेकिन कभी भी उसे कोई परम सत्य नहीं मानते। कहने का तात्पर्य यह है कि... क्योंकि प्रत्येक उत्तरदाता की अपनी-अपनी वास्तविकता होती है। और यह बिल्कुल सामान्य बात है। हमें वहां जाकर कोशिश करनी होती है कि इन सभी बहुआयामी वास्तविकताओं में से  एक सामान्य दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जाएँ।

और अब आपके प्रश्न का उत्तर देने के लिए, मेरे स्रोतों के बारे में कुछ शब्द:...  तो, मेरे खयाल में... खैर, वैसे मुझे इस किताब के बाद  सोशल मीडिया पर "हिंदुत्व ट्रोल" द्वारा बेहद गाली गलोच का सामना करना पड़ा। हालाँकि मैं इन दोनों के बीच स्पष्ट रूप से भेद कर सकती हूँ। उन “हिंदुओं” के बीच जो हैं एक  राजनीतिक हिंदू धर्म के समर्थक है  और बाकी बचे सब हिंदू। मैं इसे फिर भी कहूँगी... यह मानना है कि कई स्रोत गायब हो गए है क्योंकि वे सत्ताधारी लोगों पर सवालिया निशान उठाते है। क्योंकि, सच में, मुझे यही लगता है … यही मेरी इस पर समझ है। और यह प्रमाणित हो चुका है  जिस तरह से उन्होंने  वह सब कुछ छिपा दिया है। और हम जानते हैं कि २०१९ में नई दिल्ली में   बहुत मिलती-जुलती घटनाएं पुनरुत्पादित हुई हैं। उस वक्त दंगों के दौरान… वैसे मेरे लिए ये दंगे नहीं हैं। ये हमले हैं…   ये मुस्लिम विरोधी हमले हैं। और हाँ, यह सब अब बहुत आम बात हो गई है। आज के भारत में मुसलमानों पर हमले करना यह कोई बड़ी बात नहीं है…… इससे संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए भी कोई समस्या नहीं होती।

अनुबंध: जी हां, इस हकीकत को स्वीकार किया गया है। मेरा मतलब है कि कई लोग इससे सहमत है लेकिन कुछ ऐसे भी लोग भी हैं जो इससे असहमत हैं। लेकिन चलिए आगे बढ़ते हैं।

मेरा प्रस्ताव यह है कि... इस विषय के और विस्तार में जाने से पहले, आइए श्रोताओं के लिए अहमदाबाद शहर का  थोड़ासा भूगोल प्रस्तुत करते हैं। तो, मैंने यह नक्शा आपकी किताब से लिया है। 




और यहाँ, मैं चाहूँगा कि आप हमें शहर के प्रमुख स्थलों के बारे में हमारी पहचान करा दें। वैसे, आपने किताब में तीन मुख्य जगहों का उल्लेख किया है; वेस्टर्न सिटी, पुराना शहर जिला और तीसरी जगह… खैर, मैं उसे भूल गया … बेशक, इसमें जुहापुरा भी है। और हां, तीसरा क्षेत्र औद्योगिक क्षेत्र है!

शार्लोत: हाँ, धन्यवाद। वैसे, इसे स्वीकार करना हमेशा महत्वपूर्ण होता है… क्योंकि मेरे लिए, यहाँ फर्क यह है कि …  इसीलिए, मैं (शैक्षणिक) नरभक्षण का कड़ा विरोध करती हूँ। क्योंकि यहाँ सबके लिए जगह है। तो, सबसे पहले, धन्यवाद।  भले ही वे शायद  इस साक्षात्कार को न देखें, इत्यादि। लेकिन २०१४ में जिन नक्शाकारों ने इस  नक़्शे को बनाया उनका धन्यवाद! क्योंकि, मैंने इसे नहीं बनाया। इसे बनाने वाले साइंसेज पो के मानचित्रकला (cartography) विभाग के लोग है। और उन्होंने मेरी मदद करने के लिए यह काम मुफ्त में किया। इसलिए, मैं उनका उल्लेख यहाँ भी कर रही हूँ। क्योंकि यह बात ध्यान में रखनी बहुत महत्वपूर्ण है कि ये सभी लोग वैज्ञानिकों के लिए एक आवश्यक संसाधन हैं और अच्छा होगा अगर हम उनकी रक्षा करें और हम उनमें निवेश करना जारी रखें। इसलिए, मैं इस नक़्शे पर वापस आऊंगी।

दरअसल, आप यहाँ देख रहे हैं... मुझे नहीं पता मैं आपको यह किस हद तक यह दिखा सकती हूँ... क्योंकि पुराना शहर,  वह मूलतः वहाँ, केंद्र में जिस पर “अहमदाबाद” लिखा हुआ है, वहाँ है।  हालांकि, दाईं ओर… वैसे मेरा भूगोल कमजोर है, मेरा मतलब है,  कम से कम स्थान, जगह की दृष्टि से जागरूकता के स्तर पर।  तो, साबरमती यह वह बड़ी नदी है  जो यहाँ से होकर बहती है, उसके के पूर्वी किनारे पर... तो बिना किसी आश्चर्य से… और पूर्वी तरफ, उस जगह में   जहां "अहमदाबाद" लिखा है, यह रहा पुराना शहर। बस इतना ही।

और फिर दूसरी तरफ "पश्चिमी शहर" है।  तो, यहाँ का पुल है एलिस ब्रिज,  जिसका मैं जिक्र कर रही हूं।  इस तरह के पुलों के निर्माण कि बदौलत शहर के इस पूरे पश्चिमी हिस्से को विकसित होने का मौका मिला। यह हिस्सा बहुत अमीर है  क्योंकि पुराना शहर, यह बहुत हद तक मुस्लिम बहुल क्षेत्र है, पूरी तरह से मुस्लिम बहुल है। और जो कि एक बहुत ही अच्छी तरह से एकीकृत है। क्योंकि यह (पुराना शहर) एक किलेबंद शहर है इसलिए यह बहुत अच्छी तरह से एकीकृत हो पाया है  जैसे कि हम इन्हें कहते हैं… इन मोहल्लों को "पोल्स" कहा जाता है। जो एक छोटा शहरी  इलाका है जिनका वास्तुकारोंद्वारा व्यापक अध्ययन किया गया है। संक्षेप में कहें तो, यह सब कुछ बहुत ही खूबसूरत है। आज, पुराना शहर, यह वास्तव में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुँच रहा है। विशेषकर इसलिए क्योंकि यह मुस्लिम बहुल है।  क्योंकि यह मुख्य रूप से मुसलमानोंद्वारा बसा हुआ है। यहाँ कुछ संस्थायें हैं…जैसे की यूनेस्को द्वारा संचालित एक संरक्षण परियोजना है। और एक फ्रांसीसियों द्वारा भी है... जो कि पुराने, « विरासत इमारतों » को संरक्षित और पुनरुद्धारित करने के लिए है। और वास्तव में, इतनी नहीं जीतनी होनी चाहिए थी… मैं तो बस कल्पना ही कर सकती हूँ कि स्थिति क्या होती अगर ये इलाका हिंदू होता! क्योंकि, इसके अलावा, वास्तव में गुजरात के अधिकारी  अहमदाबाद काम करना पसंद करते हैं।

एक बार फिर मै याद दिला दूँ कि अहमदाबाद  गुजरात की आर्थिक राजधानी है और गांधीनगर,  जो एक नया शहर है, उसकी राजनीतिक राजधानी। और असल में यह सब कवायत अहमदाबाद की प्रतिमा  एक आदर्श शहर बनाने के बारे में है। इसे नवउदारवाद और भाजपा की नितियोंके एक नमूने (model) के रूप में प्रस्तुत करने के लिए है। इसलिए, वे मुख्य रूप से "पश्चिमी शहर" में निवेश करते हैं, जिसका हमने अभी अभी जिक्र किया और जो (साबरमती) नदी के  पश्चिमी तट पर स्थित है। यानी, यह सब विकास नदी के किनारे, साबरमती नदी के किनारे वाले क्षेत्र में हो रहा है। और फिर वह "औद्योगिक पट्टी" का हिस्सा है, जो शहर के पूर्व में स्थित है। दरअसल, यह अहमदाबाद से और भी दूर है।  इसलिए, इस "औद्योगिक पट्टी" में,  जो साबरमती नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित है,  लेकिन जो मोटे तौर पर अहमदाबाद को घेरे हुए है।

वैसे, यह समझना आसान है। हम कल्पना कर सकते हैं कि मूल रूप से सन् १४१५ से अहमदाबाद, अहमद शाह का शहर था। हाँ, मुझे लगता है १४१५ में ही है। उस समय इस शहर की स्थापना अहमद शाह द्वारा हुई थी।  पहले तो इसे हाशिए पर रखा गया था है लेकिन फिर औद्योगीकरण के साथ इसका विकास हुआ। क्योंकि गुजरात एक ऐसा राज्य है जिसे वैश्वीकरण के गतिशीलता, सक्रियता में काफी पहले ही रखा गया था, विशेष रूप से, अफ्रीका की ओर। इसीलिए गांधी जी, जो एक गुजराती थे, वे आगे जा कर अफ्रीका में बसने के लिए गए क्योंकि उस वक्त  गुजरात – अफ्रीका के बीच एक बड़ा समुद्री संपर्क था। इस प्रकार, गुजरात एक ऐसा राज्य था जो बहुत तेजी से गतिशील, प्रगत हो गया।  दरअसल, ऐसे कई उदाहरण हैं, जैसे कि ऐसे लोग  जिन्हें “महाजन” या फिर संघटना (guilds),  दुकानदार कहा जाता है। इसलिए, यह शुरू से ही एक समृद्ध शहर रहा है। और उसके बाद, जब पुल बन गए... और फिर “पश्चिमी शहर” के विकास में एक जनसांख्यिकीय उद्देश्य भी है। परिणामस्वरूप,  शहर के पश्चिमी भाग में भी...  लेकिन सभी हिस्से में नहीं…  शहर के "अमीर इलाके",  जैसे की "थलतेज बंगलों" जैसे मोहल्ले, यह पश्चिमी भाग में  बहुत है।

जी हाँ, बिल्कुल। और आपने अहमद शाह का ज़िक्र किया। और कहीं न कहीं वही शख्स थे जिन्होंने इस शहर को नाम दिया था या… 

शार्लोत: यह "कहीं न कहीं " नहीं है, यह वही शख्स है, हाँ, पूरी तरह से!  यह अहमद शाह का शहर है! 

अनुबंध: जी हाँ। और जैसा कि आपने किताब में लिखा है और जिस बात ने मुझे आश्चर्यचकित या प्रभावित किया, वह यह जानना है कि यह "सुल्ताना" (राज्य) कोई एक इस्लामी राज्य नहीं है। और आप जिस बात का जिक्र कर रहे हैं वह है "जिज़िया", यह कर उस वक्त लगाया गया था, और जिसे शियाओं पर भी लागू किया गया था। क्योंकि मुझे लगता है कि अहमद शाह अब्दाली "सुन्नी" पंथ के थे। तो इस्लाम के भीतर मौजूद अन्य सांप्रदायिक समूहों पर भी यह कर लगाया गया था। और फिर, ज़ाहिर है, हिंदुओं पर भी। लेकिन इसे ईसाइयों, यहूदियों, जैनियों पर भी लगाया गया था …  तो, यह पूरी योजना का हिस्सा है और इसमें केवल हिंदू ही नहीं थे। इसलिए, मुझे लगता है कि यह कुछ हद तक... 

शार्लोत: अरे... बिलकुल! खैर, हम इस बारे में संक्षेप में बात कर सकते हैं। यही स्थिति हर जगह है। मेरा मतलब है, यह हर जगह यह एक औपनिवेशिक (colonial) मानसिकता का नतीजा है। उदाहरण के लिए, अगर हम फ्रांस की बात कर रहे हैं तो अल्जीरिया, मोरक्को आदि में भी यही स्थिति है। हर जगह औपनिवेशिक मानसिकता हावी है।  जिससे लोग इस तरह से सोचने पर मजबूर हो जाते हैं क्योंकि यह "बांटो और राज करो" के सिद्धांत पर आधारित है।  दूसरे शब्दों में, मूल रूप से, जो भी आक्रामक (उपनिवेशवादी) है, वे चाहे जो भी हों, उनके पास अक्सर प्रशासन करने की पर्याप्त मानवीय संख्या/क्षमता नहीं होती है। उदाहरण के लिए, अंग्रेजों की कल्पना कीजिए। ठीक है, मान लीजिए कि यह दुनिया कि उस समय की अग्रणी शक्ति थी। लेकिन अंत में, उपमहाद्वीप की तुलना में हम उनके द्वीप का आकार देख सकते हैं। मानवीय दृष्टि से देखा जाए तो इसे संभालना संभव नहीं है। तो, क्या करने की आवश्यकता है?  फूट डालो और राज करो! इसलिए, इस बात को  लोगों के दिमाग में बिठा दिया जाता हैं… इसलिए, इसके बाद,  इस मानसिकता को बदलने में समय लगता है…

आपने मुझे जो पूछा, उसके संबंध में मै बहुत ही सटीक रूप से जवाब दूंगी। हालाँकि, १९०५ में निर्वाचक मंडलों के  विभाजन (separation of the electorates) के साथ... तो, मूल रूप से, हम लोगों के दिमाग में  यह बात डाल देते है कि अगर आप मुसलमान हैं… तो आप ऐसा नहीं करते…  इस प्रकार, आप जो भी मुस्लिम हो… आप जो भी हो,  आपका पंथ, आपकी संबद्धता, चाहे आप हों  बहरालवी, देवबंदी, सुन्नी, इस्माइलिया... इस किसी भी बात का… हमें इन सब बातों की कोई परवाह नहीं है। दरअसल, हम इस सब को रखते है। मुस्लिम एक इकाई है जैसे हिंदू एक इकाई है।  जबकि हिंदू धर्म में, दक्षिणी हिंदू धर्म यह बिल्कुल भी उत्तरी वाला हिंदू धर्म नहीं है। मेरा मतलब है, वहाँ मनाए जाने वाले त्योहार,  खाना एक जैसा नहीं है… बहुत सी चीजें अलग हैं। लेकिन अंग्रेजों ने सुविधापूर्वक  मुसलमानों और हिंदुओं के प्रस्तुतियों को अत्यधिक सरलीकृत कर दिया।

मैं मध्य युग के विषय पर बाद में आउंगी। हालाँकि, कुछ हद तक मैं राजनीतिक हिंदू धर्म का जिसे "हिंदुत्व" कहा जाता है, उसके विरोधाभासी पक्ष के संबंध में आपका ध्यान लाना चाहूँगी। हिंदुत्व, जिस राजनीतिक विचारधारा ने आज भारत में वर्चस्व स्थापित किया है और जो भारत को आकार दे रही है… जो भारतीय राज्य को नया आकार दे रही है और जो इसे धर्मनिरपेक्षता से अलग करने के प्रयास में है। मुझे यह काफी दिलचस्प लगता है कि एक राजनीतिक विचार जिसे १९ शतक के अंत में संहिताबद्ध किया गया था और जो अक्सर आगे उभर कर आता है... तो, हर बार जब वे भारत की शक्ति की शेखी बघारते हैं...  मुस्लिम सुल्तानों द्वारा हिंदू  कैसे "उत्पीड़ित" हुए थे इसका दावा करते है।  लेकिन वास्तव में, वे उसी श्वेत उपनिवेशवादी राजनीतिक विचार को दोहराते है और उसे हूबहू लागू करते हैं। और यही वो चीज है जो मुझे...  आखिरकार, मैं अभी इसी मसले पर काम कर रही हूँ...  लेकिन यह अभी भी नवप्राप्त मुक्ति का जैसे एक विचार है और अंततः, जैसे कोई प्रतीक्षित संप्रभुता बहाल होने का विचार है... इसलिए मुझे इस पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन खैर। इसलिए, मैं आपकी कही बात पर वापस आती हूँ। क्योंकि आप एक महत्वपूर्ण मुद्दे को उजागर कर रहे हो। और यही वह बात है जिसे सभी गंभीर वैज्ञानिक और गंभीर शैक्षिक कार्यकर्ताओं ने साबित किया है।

तो, जैसा कि मैं कह रही थी, "जिज़िया"...  खैर, इस लगान की बात करें तो...  इसे कर के रूप में मुस्लिम शासकों द्वारा  और ना कि "इस्लामी मुस्लिम शासकों" द्वारा लागू किया गया था। उन सभी पर … उन सभी समूहों पर इसे थोपा गया  जो उनके खुदके, उनके अपने नहीं थे। हालांकि, इसे इस्लाम के अन्य सम्प्रदायों पर भी लागू किया गया था, ऐसे सम्प्रदायों पर जो कि सुल्तान द्वारा अपनाये इस्लाम के रूप से अलग थे। एक बार जब हम इस बात को पहचान लेते हैं  तो इसे समझना आसान है। यह एक प्रकार का कराधान है। बेशक यह जातीय या धार्मिक आधार पर  भेदभावपूर्ण है। हम इस बात से पूरी तरह सहमत हैं। और इसमें कोई गणतंत्रवादी और लोकतांत्रिक मूल्य नहीं है। हालांकि, यह दूसरे व्यक्ति के धर्म का अपराधीकरण नहीं है!

इस संदर्भ में यह भी याद रखना महत्वपूर्ण है कि  वहाँ कई विवाह हुए हैं...  विशेषकर राजपूतों और मुसलमानों के बीच। अंत में, मेरा मतलब है, यह सब कुछ है... सचमुच यह बहुत ही तुच्छ, संकीर्ण बात है। और आज जो व्याख्या  प्रस्तुत की जाती है और जिसका विश्लेषण  केवल मेरे द्वारा ही नहीं किया गया है। उदाहरण के लिए,  हम "होलोकॉस्ट के मिथक" के बारे में भी बात कर सकते हैं। तो आज इन सभी बातों का इस्तमाल जानबूझकर पूरी तरह से चुनावी  और राजनीतिक हितों पर आधारित है।

अनुबंधजी हाँ। आपने "विरोधाभास" शब्द का प्रयोग किया। एक और विरोधाभास है जो महत्वपूर्ण है। इस बात पर भी जोर देना अत्यावश्यक है कि भारत में जाति व्यवस्था है और अधिकांश भारतीयों के लिए,  मुझ समेत, जैसे बहुत लंबे समय तक मुझे नहीं पता था  कि भारत में मुसलमानों के बीच भी जातियाँ होती हैं। इसलिए, मैं आपके साथ कुछ साझा करना चाहता हूँ… 

शार्लोत: हाँ और ईसाइयों के भीतर भी! 

अनुबंध: हाँ। तो… हम कह सकते है कि जातिवाद यह हिंदू धर्म का रोग है…  और हिंदुओंकी वजह से  अन्य लोग इससे संक्रमित हुए। इसलिए, मैं इस स्लाइड को जल्दी से प्रस्तुत करने जा रहा हूँ और फिर मैं आपको टिपण्णी ने के लिए आमंत्रित करूंगा। 




तो भारत में मुसलमानों के बीच,  जातियां या फिर "जमात" मौजूद है, इस तथ्य के बावजूद कि  सैद्धांतिक रूप से सभी मुसलमान समान हैं।  हालांकि, इनमें जातियों के तीन प्रकार होते हैं;  अशरफ, अजलाफ और अजराल।

पहले अशरफ, अगर हम  हिंदुओं के साथ तुलना करें तो वह "ब्राह्मणों" के समकक्ष होंगे। ये उच्च जाति के लोग हैं जो  फ़ारसी और अरबी मूल के है। और उनके उदाहरण है जैसे कि  "खान”, “शेख”, “पठान" और अन्य। 

दूसरा है अजलाफ। अजलाफ, एक मध्यवर्ती जाति है। हिंदुओं के लिए यह "ओबीसी - अन्य पिछड़ा वर्ग" जैसे हो सकता है। वे इनके वंशज हैं वह मध्य जाति के हिंदू जिन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था। 

तीसरे और आखिरी हैं अज़रल,  जो हैं निम्न और बहिष्कृत वर्ग, समकक्ष  हिंदुओं के लिए यह अछूतों के बराबर होगा।  और उनके पेशे अक्सर निम्न स्तर के पेशे होते हैं जैसे सफाईकर्मी, चमड़ा बनाने वाले, इत्यादि।

कृपया, क्या आप इस पर विस्तार से बता सकते हैं? 

शार्लोत: जी हाँ, बस यही बात है। एक संक्षिप्त टिप्पणी। 

मुझे लगता है कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसे कौन कहता है, और किस परिपेक्ष में, लेकिन खैर। मै कहूँगी की यह हम दोनों के बीच की बात है,  लेकिन, मुझे लगता है कि आपने इसका ज़िक्र,  स्पष्टता के लिए संक्षेप में ही किया था। फिर भी, मैं उस शब्द के खिलाफ लड़ती हूं। मैं "अछूत" शब्द के इस्तमाल के खिलाफ पूरी तरह से लड़ती हू... यह लब्ज, जो कि समतुल्य है, और मैं यह कहती हूँ फ्रांसीसी पुरुषों और फ्रांसीसी माहिलाओं के लाभ के लिए, जो हमारी बात सुन रहे होंगे... तो इस लब्ज का इस्तमाल अश्वेत लोगों के लिए "नीगर" शब्द का प्रयोग करने के बराबर है।  और यह कहना मेरे लिए बेहद दुखद है। लेकिन "अछूत" शब्द का प्रयोग करके हमारा तात्पर्य यह है कि उस व्यक्ति को छुआ नहीं जा सकता। क्योंकि उस व्यक्ति को छूने से हम प्रदूषित हो जाएंगे। तो, यह एक… अंत में, मेरे मन में पहले से ही… खैर, यह विचार... मुझे कई बार यह ख्याल आया क्योंकि लोगों को इस बात का एहसास नहीं है, हालाँकि उन्हें वास्तव में इसका एहसास होना चाहिए। मेरे लिए, यह मेरी छोटी सी लड़ाई है।

तो, जैसा कि आपने शुरुआत में कहा था, "बहिष्कृत" (outcast) बहुत अच्छा लब्ज है और इसके अलावा,  मुझे लगता है कि इसमें अर्थ ज्यादा स्पष्ट है;  हिंदुओं के लिए "अछूत" या "दलित।” तो, याद दिला दें कि "दलित" का अर्थ है उत्पीड़ित। और वैसे, यही उनका राजनीतिक नाम है। लेकिन "बहिष्कृत," स्पष्ट रूप से हमें समझाता है  कि ये वे लोग नहीं हैं जो  जाति व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर है। ये वे लोग हैं जो, अन्य जगहों के विदेशियों की तरह…  तो, जैसे मेरे मामले में, हम सब  चार प्रमुख जाति व्यवस्था के बाहर हैं।

और वास्तव में… यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा ईसाइयों के लिए होता है। उच्च जातियों और  निचली जातियों के बीच का अंतर, अलगाव  यह जिस धर्म पर चर्चा हो रही है,  उसमें कथित या  अनपेक्षित रूपांतरण पर आधारित होता है।  तो, वास्तव में दोनों ही मामलों में,  चाहे  ईसाइयों के लिए या फिर  मुसलमानों में, उच्च जातियाँ, यह  वे लोग हैं जो सीधे तौर पर,  जो प्रत्यक्ष तौर पर आये हैं।  अतः, सेंट ज़ेवियर के  प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी या मुसलमान, जो (भारत में) आ चुके थे  ऐसे पहले मुसलमान।  लेकिन ये लोग, अजराफ और अजराल जैसे नहीं हैं  जिन्होंने धर्म परिवर्तन किया है, इसके विपरीत अजराफ और अजराल अक्सर वे लोग है  जो हिंदू धर्म या कैथोलिक धर्म से  धर्म परिवर्तन कर चुके थे...  क्षमा करें, ईसाई धर्म से... जाति व्यवस्था से बचने के लिए, ठीक इसी उद्देश्य से।  लेकिन निश्चित रूप से एक घोर विफलता के साथ,  जैसा कि हमने अभी चर्चा की। अक्सर ऐसा ही होता है। उदाहरण के लिए, गुजरात में,  कई "देसाई" हैं। अब देसाई का मतलब  मुस्लिम जाति भी हो सकता है  या कोई हिंदू जाति,  यानी एक उपजाति।  गुजरात के मामले में  यहां बड़ी संख्या में हिंदू हैं जो मध्य युग में इस्लाम की ओर धर्म परिवर्तन कर गए थे ताकि "खारा पानी" के  मिथक से बाहर निकलें... "काला पानी," क्षमा करें, " खारा" बिल्कुल नहीं, बल्कि "काला।" इसलिए, "काला पानी", जिसका अर्थ है  "काला पानी" जो यह तथ्य कि हिंदू व्यापार नहीं कर सकते। वे व्यापार के लिए समुद्र में नहीं जा सकते थे  क्योंकि धार्मिक परिपेक्ष में "भारत माता" को छोड़ना उन्हें संभव नहीं था। तो, यह सब प्रक्षेप पथ (trajectories) समझाने के लिए था और वास्तव में, मुझे और कुछ नहीं कहना है क्योंकि आपने... इस उत्कृष्ट आकृति के लिए धन्यवाद!  क्योंकि यह मुसलमानों के भीतर मौजूद जाति व्यवस्था को हूबहू प्रतिबिंबित करता है…

अंत में, इस ईसाइयों और मुसलमानों के बीच की जातियाँ और हिन्दुओं की जातियाँ, इनके बीच के फर्क के बारे में मैं बस इतना ही कहना चाहूंगी कि यह है अनुष्ठानिक अपवित्रता की अवधारणा … और अंत में, देखिए, मुझे नहीं पता कि... मुझे लगता है कि बहुत से लोग पहले से ही इससे परिचित हैं अगर वे आपके चैनल को देखते हैं, मेरा मतलब है यह अपवित्रता की रस्म, यानी वास्तव में एक स्पर्श के सम्बन्ध में ... ऐसा माना जाता है कि ये लोग  या फिर इनके केवल संपर्क में आने से ही  हमारी पवित्रता खतरे में आती है। यह प्रथा अब ईसाई और  मुसलमान  के बीच कुछ कम प्रचलित है। क्योंकि, खैर, मैं ऐसा नहीं कहूंगी के यह एक नकारात्मक पहलू है…

खैर, वास्तव में, मैं ऐसा नहीं मानती कि यह  समाज का सबसे समतावादी संगठन है। हालांकि, मैं तो सिर्फ एक सामाजिक वैज्ञानिक हूं। मैं बस इतना ही कहूंगी कि  वास्तव में संकरण हुआ है जैसा कि धर्म के मामले में होता आया है। उदाहरण के लिए, बरेलवी इस्लाम बहुत हद तक हिंदू रीति-रिवाजों से प्रभावित है। इसके विपरीत, हिंदू धर्म में,  जब हिंदू दरगाहों में जाते थे,  इसलिए की कब्रों के लिए  संकर संत… और यह संकरित पहलू  इस्लाम से आया था।  इसलिए, यहाँ भी, मैं हमेशा यही कहती हूं,  उन लोगों को याद दिलाना चाहती हूँ जो,  दरअसल, जो हमें  लगातार बताए जाते है,  इस तथाकथित "सभ्यताओं के टकराव" के बारें में। मुझे इस पर एक पल के लिए भी विश्वास नहीं है। और यह वास्तव में यह कहना कि भारतीय समाज में,  ईसाइयों, हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हमेशांसे केवल झगड़े ही थे,  यह बात कहना गलत है। मैं लोगों को हमेशा  यह भी याद दिलाती हूं कि सबसे पहले  यह समस्या तब उत्पन्न हुई जब… ज़ाहिर है, जब भारत का  विभाजन हुआ… इसलिए, उस वक्त अंतरधार्मिक मुद्दे थे। हालांकि, भारतीय लोकतंत्र के प्रारंभिक वर्ष मतलब   १९५०-१९६० के दशक के दौरान,  जो दांव पर लगा हुआ था या जो  प्रमुख चिंताएँ हावी रहीं थी वह थी भाषाई लड़ाइयाँ! जहां भाषाई कारणों से, भाषा के आधार पर राज्य की सीमाओं की पहचान के लिए लोग एक दूसरे को मार रहे थे। इसलिए… वह नजरिया  जिसके माध्यम से हम आज जीते हैं, यह एक बार फिर से विघटित हो जाता है।

अनुबंध: आपने किताब में एक और शब्द का प्रयोग किया है, छुआछूत के संबंध में, "बहिष्कृत" के अतिरिक्त,  और यह शब्द है "सामाजिक दूरी।” अतः, यह अध्याय यहीं समाप्त होता है।

आगे बढ़ने के लिए, किताब में आपने स्पष्ट रूप से कहा था कि २००२ में, ये आपके लिए "दंगे" नहीं थे। यह एक नरसंहार था। खासकर अगर हम  इसकी तुलना अन्य दंगों से करें जो इससे पहले, अतीत में गुजरात में हो चुके हैं।  हालांकि, इससे पहले कि हम बात करें इन दंगों या नरसंहार के बारे में,  मैं योगेंद्र यादव के कथन को उद्धृत करना चाहूंगा।  योगेंद्र यादव जो भारत के एक राजनीतिक वैज्ञानिक हैं। उनके अनुसार, जब दंगों या नरसंहारों की बात आती है,  तो इसमें कुछ भी स्वाभाविक नहीं है। सब कुछ पहले से ही अच्छी तरह से योजनाबद्ध है। अतः, यह एक महत्वपूर्ण पहलू है जिसे समझना आवश्यक है।

२००२ के नरसंहार के बारें में आपने दो पहलुओं की पहचान की। सबसे पहले, इस में चुनावी उद्देश्य दांव पर था।  दूसरा,  यह विचारधारा के बारे में है। मैं बस संक्षेप में कुछ विचार बताना चाहता हूँ जो आपने इस किताब में समझाए है। और फिर, मैं आपको जवाब देने के लिए आमंत्रित करूंगा।

आपने कहा था कि, "२००२ में उत्तरी या मध्य जिलों में  हिंसा चरम पर थी लेकिन सौराष्ट्र और कच्छ में ऐसा नहीं था, जहाँ  मार्च २००३ में होने वाले चुनावों के लिए  कांग्रेस दल अनुकूल स्थिति में था।" तो, बात यह है। हिंसा आगामी चुनावों के लिए लक्षित थी। और जब आप बात करती हो विचारधारा के बारे में, आप कहती हों कि "लक्ष्य आंशिक रूप से नष्ट कराना था  पूर्णतः वश में कर लेने के लिए।" इसलिए, उद्देद्श अल्पसंख्यकों का पूर्णतः उन्मूलन करना नहीं था।  क्योंकि अन्यथा  हिंदुओं द्वारा किए गए हमले  मुस्लिम बहुल इलांकों में होते। नहीं, इसके विपरीत हमने जो देखा  वो है कि हिंसा कि ये घटनाएँ  विशेष रूप से हिंदू बहुल इलाकों में स्थापित मुस्लिम आवासीय क्षेत्रों में हुई। जैसे कि अहमदाबाद के नरोदा पाटिया या गुलबर्ग सोसाइटी जैसे इलाके और वे बड़े मुस्लिम बहुल इलाके, पुराने शहर की तरह  या जुहापुरा तक, उनमें नहीं। इसलिए, जुहापुरा में बहुत कम घटनाएं हुईं। और आपने "Tandalja abaroda" का भी जिक्र किया है। इसमें बहुत कम घटनाएं हुईं। और अंत में, वह (मुस्लिमोंकी) अधीनता जिसे अधिकारियों द्वारा  हकीकत में लाने का इरादा था वह जुहापुरा की घेटो में  पुनर्गठन में सन्निहित होनेवाले मुसलमानों से सफ़ल हो गया।  और जिस बात ने मुझे वास्तव में प्रभावित किया, वह यह है कि अंत में, आप एक छोटी सी बात जोड़ते हैं और कहते हैं कि “इस कृत्यका (जुहापुरा घेटो का होना) विश्लेषण ऐसा भी किया जा सकता है, जैसे अल्पसंख्यकों द्वारा किया गया यह "प्रतिरोध का पहला कदम” हो।

अब इसका विस्तृत विवरण देने के लिए मै आप को न्योता देता हूँ। 

शार्लोत: सबसे पहले, मुझे लगता है कि यह कहना महत्वपूर्ण है, मैं दंगों की नहीं बल्कि नरसंहारों की बात क्यों कर रही हूँ? सीधे शब्दों में कहें तो, दंगे जो दो समूहों के बीच टकराव हैं,  जो ऐसी स्थिति पैदा करते हैं जिसमें दो ऐसे समूह जिनकी संख्यात्मक रूप से तुलना की जा सकती है। यह बात (२००२ गुजरात) नरसंहार के मामले में  बिल्कुल भी सच नहीं थी। मैं नरसंहार के बारे में क्यों बात कर रही हूँ?  क्योंकि उन नरसंहारों के कारण,  ये वो परिभाषा है जिसका मैं उपयोग करती हूँ। क्योंकि मेरे लिए, हर बार, ज़ाहिर तौर से, हर बार,  मैं जो कुछ भी कहती हूँ उसे मै  परिभाषित करती हूँ। मैं ये बात यूं ही, यूं ही नहीं कह रही हूं...  यह मेरे साथ यूं ही नहीं हो जाता!  नहीं, यह मेरी "राय" नहीं है, यह मेरा "विश्लेषण" है! और मुझे लगता है कि इस बात को ध्यान में  रखना महत्वपूर्ण है।

नरसंहार अल्पमत पर लक्षित हमले होते हैं। उन्हें निशाने पर लिया जाता है, उनके धार्मिक और नस्लीय संबद्धताएँ, इत्यादि के वास्ते और इसमें अधिकारियों की सक्रिय या निष्क्रिय मिलीभगत के साथ। वास्तव में यही है जो हुआ है।  यहाँ मुसलमानों को निशाना बनाया गया  क्योंकि वे मुसलमान थे। और इसमें अधिकारियों की सक्रिय मिलीभगत भी शामिल थी। और यह याद रखना चाहिए कि मुसलमान संख्यात्मक रूप से  हिंदू हमलावरों की  तुलना में बिल्कुल भी  समतुल्य नहीं थे। हमें यह बात याद रखनी चाहिए। तो, नरसंहार के संबंध में मैं यही कहना चाहती थी।

मैं इसे एक अनुस्मारक (reminder) के रूप में कहने वाली थी, लेकिन मैं कुछ हद तक योगेंद्र यादव के कथन से संबंधित जवाब दूंगी। मैं उनके विचार से सहमत हूं, लेकिन मैं इसे थोड़ा और स्पष्ट करना चाहूंगी। यानी,  इसका मतलब यह नहीं है कि दंगे, अंततः, ये नरसंहार २६/०२ को या २७/०२ को फलां समय पर सुनियोजित थे। देखिए, हम यह नहीं कह रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि, तथ्यात्मक रूप से,  बुनियादी ढांचे से संबंधित बहुत सी चीजें थीं  जो पहले से ही योजनाबद्ध थी। उदाहरण के लिए, और यही बात है  गैस सिलेंडरों के बारे में। यह अब भी अविश्वसनीय है!  भारत में रहने वाला हर व्यक्ति यह जानता है कि अपना गैस सिलेंडर बदलवाने के लिए, आपको थोड़ी  मुश्किलों का सामना तो जरुर करना पड़ेगा। अंत में, इसमें थोड़ा समय लगता है। यह आपको इतनी आसानी से नहीं मिलेगा। तो फिर, जब आप लोगों को आते हुए देखते हैं... मुझे नहीं पता कि कितने गैस सिलेंडर थे उनके पास...

अंत में, मैं कहूंगी कि जब तक वह व्यक्ति  एक गैस एजेंसी का खुद मालिक न हों,  मुझे नहीं लगता कि यह संभव है। जब आप लोगों का साक्षात्कार लेते हैं, वे आपको बताते हैं कि... क्योंकि मैंने वास्तव में अहमदाबाद पर काम किया है। मैं किताब में बड़ौदा के बारे में थोड़ी बात करती हूँ  लेकिन केवल इस भावना से कि  एक (तुलनात्मक) दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जाएँ।  जब आप साक्षात्कार करते हैं उन लोगों के साथ जो आपको यह बताते हैं कि  वे काफी हैरान थे क्योंकि,  अक्टूबर-नवंबर २००१ में,  उनकी जनगणना करने के लिए वहाँ कुछ लोग आए थे। इसलिए, लोगों को  वास्तव में समझ में नहीं आया कि यह किस बारे में था। क्योंकि यह निर्धारित नियमित जनगणना प्रक्रिया नहीं थी (जो फरवरी २००१ में पहले ही हो चुकी थी)। इस मामले में,  यह वास्तव में एक असामान्य, संदिग्ध तरीके से हुआ था। ये सब मुसलमान थे जिन्होंने मुझे इसके बारे में बताया। उस समय उनके लिए यह समझना मुश्किल था  कि ऐसा क्यों हो रहा था।  और फिर जब वे कहते हैं, “हमें बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि  हमारे पड़ोस में…” यह सब बात मेरी किताब में मैंने शामिल कि है… लेकिन हमारे पड़ोस में, यहां शाकाहारी उपाहारगृह हैं,  हिंदू नामों के साथ और यहां तक कि  हमें यह बात पता नहीं थी कि उनके मालिक मुसलमान थे!”  इन (उपहार गृहों) को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि हमलावरों के पास वाणिज्य और  व्यवसायों की (जनगणना) सूचि थी। खैर, इस मामले में योगेंद्र यादव और मैं सहमत हैं।  वह किसी ऐसी चीज के बारे में बात कर रहे है जो  पूर्व नियोजित तैयारी से संबंधित है। यानी, योजना यह थी कि ऐसी स्थिति आये तो तैयार रहे। और किसी भी मामले में, अधिकारियों के साथ पूर्ण मिलीभगत करना।

मेरा कहना है कि इसका उद्देश्य... दरअसल, आज भारत में हमें यही देखने को मिलता है। अब (प्रत्यक्ष) हिंसा की आवश्यकता कम होती जा रही है और यह इसलिए है क्योंकि वास्तव में, यह प्रक्रिया अब कानून के माध्यम से अधिकाधिक हो रही है। इस प्रकार, वास्तव में, मुसलमानोंको कानून की बदौलत तेजी से जिंदगी जीने से वंचित किया जा रहा है। इन लागू किए गए कानूनों के कारण। यदि उद्देश्य होता हत्या करना, विशुद्ध और शुद्ध रूप से,  तब तो यह नरसंहार की श्रेणी में आएगा। यदि इसका उद्देश्य मुसलमानों पर उन्हें खत्म करने के लिए हमला करना होता, तो हमलावर अहमदाबाद में (मुस्लिम बहुल) इलाके जैसे  पुराना शहर और जुहापुरा को निशाना बनाते। लेकिन हमले हुए  उन स्थानों के बाहरी इलाकों में, जैसा कि मैंने आपको बताया, इसीलिए... (मुस्लिम) लोग मुसलमानों के मोहल्लों में चले गए  जैसे की पश्चिमी शहर सहित, जिसके बारे में हम पहले बात कर रहे थे। इसीलिए लोग… दरअसल, उस समय वास्तव में क्या हुआ था? लोग डरे हुए थे, लेकिन वे बच के भाग नहीं सकते थे… इसलिए, उन्होंने धार्मिक विशिष्टता का चुनाव किया जिसे वे सुरक्षात्मक माना करते थे। मैं यही कह रही हूँ। हालाँकि, वे पुराने शहर में नहीं जा सके, क्योंकि पुराना शहर, वहां पहले से ही बहोत भीड़भाड़ थी।

हालांकि, जुहापुरा एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। यह मूल रूप से काफी गरीब या निम्न मध्यम वर्ग की आबादीवाला था। इसलिए, यहाँ जगह (ज़मीन) उपलब्ध थी। और फिर वे लोग भी हैं जिनके पास पहले से ही है वहाँ छोटी-छोटी झोपड़ियाँ थीं। इसलिए, इस तरह से, उन्होंने वहीं बसने का फैसला किया।  हालांकि, यह एक शरणस्थल था। उन्होंने वहां शरण ली। विशेषकर धनी लोग, वरिष्ठ अधिकारी… खैर, कम से कम (सरकारी) अधिकारी तो नहीं। लेकिन पुलिस अधिकारियों ने,  क्योंकि वहां पुलिस अधिकारी मौजूद हैं… क्योंकि कुछ मुस्लिम अधिकारी भी वहाँ मौजूद हैं,  लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। हालांकि  वरिष्ठ सिविल सेवकों के मामले में यह स्थिति  काफी हद तक बदल गई है। वरिष्ठ अधिकारियों  और इसी तरह… मुझे नहीं पता। यहां तक कि उनमें हवाई जहाज के पायलट भी हैं... संक्षेप में कहें तो, ये सभी लोग अमीर लोग हैं।  क्योंकि, एक बार फिर, अहमदाबाद  यह एक समृद्ध शहर है।  वहां के मुसलमान अमीर हैं।  वे जुहापुरा में आये, फिर से संगठित हुए।  दरअसल, कहीं से तो शुरुआत करनी ही होगी… तो, यहीं पर मैं अपने "प्रतिरोध" की बात पर वापस आती हूँ। विरोध शुरू करने के लिए, और क्यों करना यह विरोध? मेरा कहना है कि यह पहली बात है,  यह प्रतिरोध का पहला कदम है। यह स्वयं की सुरक्षा करने के बारे में है  एक ऐसे मुहल्लें में रह कर जहाँ कि  सीमाओं सहित, जैसे की इन्हें "सीमाएँ", कहा जाता है, जो संरक्षित हो। इसलिए, आप प्रतिरोध करना शुरू कर देते हैं।  और सबसे बढ़कर, यह आगमन है  इन उच्च वर्गों के लोगोंका जिन्होंने  जुहापुरा को रूपांतरित किया एक वंचित पड़ोस से,  एक मुस्लिम-विभाजित पड़ोस से  एक मुस्लिम घेटो में।

क्योंकि यही चीज़ एक घेटो को बनाती है। असलियत यह है कि यह मुस्लिम बहुल  इलाका है, लेकिन यही बात इसे घेटो बनाती है... मैं लोइक वाकोंत (Loïc WACQUANT) की अवधारणा पर काम करती हूं,  जो तर्क देते हैं कि कि घेटो का संबंध आर्थिक गरीबी से बिलकुल भी नहीं है। यह बिल्कुल विपरीत है। इसलिए, मेरे लिए, फ्रांस में कोई घेटो नहीं है।  यह सब दुर्लक्षित क्षेत्र है। घेटो अपनी विविधता से ही परिभाषित होती है… घेटो में लॉकडाउन है, एक बंधन,  एक पहचान का कलंक है  और संस्थानों का दोहराव जो राज्य द्वारा प्रदान नहीं कि जाती। तो, दूसरे शब्दों में कहें तो,  भारत सरकार जुहापुरा में शिक्षा और स्वास्थ्य  प्रदान नहीं करता है। यह स्वयं निवासियों द्वारा ही किया जाता है जो  सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करते है। आप देख सकते हैं कि एक बार जब हम इसे लागू कर देते है... आपके पड़ोस में जब आप सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करने में सक्षम हो जाते है, तो इसके लिए आपके पास संसाधनों की आवश्यकता होगी।  आपको अमीर होना पड़ेगा। अन्यथा, आपके पास साधन नहीं होंगे... मुझे नहीं पता, अस्पतालों, दवाखानों, इत्यादि को  वित्त पोषित करने के लिए। ऐसा ही हुआ… जैसे ही ऐसा हुआ, वहीं पर मैंने प्रतिरोध देखा। यह उच्च और निम्न जातियोंके  आगमन के साथ हुआ। मेरा मतलब है,  मध्य और उच्च जातियों के आगमन के साथ, जो अपने पैसों के साथ जुहापुरा पहुंचे थे, उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि इत्यादि के साथ। यह प्रतिरोध का पहला कदम है क्योंकि ये वही लोग हैं  जो इस घेटो का विकास करेंगे।

एक और बात। यह कहना बिल्कुल गलत है कि जुहापुरा के घेटो में  या फ़्रांस के उपनगरों में,  कि वहां सरकार की कोई उपस्थिति नहीं है। भारतीय सरकार की जुहापुरा में  एक बहुत मजबूत उपस्थिति है। वास्तव में वे अत्यंत उपस्थिति हैं। उस इलाके में बस एक ही ऐसी सार्वजनिक सेवा है जो अत्यंत उपस्थित है, यह है पुलिस और न्याय व्यवस्था।  लेकिन यही तो समस्या है। इसीलिए यह एक विकल्प है। अच्छा, देखो, ऐसा है… क्या आप मेरी बात समझ रहे हैं?  यही कारण है कि आपको यह नहीं सोचना चाहिए कि इस घेटो का (सरकार द्वारा) परित्याग हो गया है। इन मोहल्लों में एक बहुत मजबूत सहायता प्रणाली मौजूद है।

अनुबंधजी हाँ। कुछ समय बाद हम इस बारे में,  जुहापुरा में जीवन कैसा है, इस बारें में बात करेंगे।

हालांकि, दंगों और नरसंहार से जुड़े  इस इतिहास कि बात को पूरा करने के लिए... तो जैसा कि आपने जिक्र किया है,  २००२ से पहले गुजरात में कम से कम तीन बड़े दंगे हुए थे। १९६९ में दंगे हुए थे…वैसे, १९६३ और १९६८ में भी दो घटनाएं हुई थीं। लेकिन शायद उनकी गंभीरता थोड़ी कम थी। फिर, हमारे पास  १९८५ और  १९९२ के दंगे भी है।  मुझे इसमें जो दिलचस्प लगा और  आपने किताब में जिसका उल्लेख किया है  वह यह है कि ये केवल अंतर-सामुदायिक, अंतर-धार्मिक संघर्ष नहीं थे बल्कि इसमें सामाजिक-आर्थिक पहलू भी शामिल हैं। जैसा कि आप  उदाहरण के तौर पर बात कर रहे थे, उस वक्त वस्त्र उद्योग का पतन और  साथ ही भारी बेरोजगारी, जिसका कहीं न कहीं  इस हिंसा को और बढ़ावा देने में योगदान रहा था। और फिर १९६९ के लिए आपने कुछ  सबूत भी पेश किए हैं। जैसे कि दंगों के योजनाबद्ध  प्रकृति के संबंध में। उदाहरण के लिए, १९६८ में,  वहाँ पहले से ही एक हिंदू शिविर था। जहां दंगों के दौरान कैसा व्यवहार करना चाहिए इसकी जानकारी दी गई थी।

और वर्ष २००२ के संबंध में  एक आखिरी बात। ख्रिस्तोफ जाफ्रलो की किताब में, « मोदी के नेतृत्व में गुजरात », उन्होंने यह भी उल्लेख किया है कि हिंसा से काफी पहले पंजाब राज्य से हथियार प्राप्त किए गए थे, और उन्हें हमलावरों के बीच वितरित कर दिया गया था। इसलिए, इसमें थोड़ी-बहुत पूर्व तैयारी देखि जा सकती है। लेकिन मेरे लिए, ये तीन मुख्य दंगे हैं जिनका आपने जिक्र किया था।

आप इस पर कुछ कहना चाहते हैं? 

शार्लोत: जी हाँ, वास्तव में तो… तो इसमें काफी फर्क है अर्थात् १९६९, १९८५ और अंततः १९९२ के बीच… नहीं, लेकिन कम से कम,  १९६९ और १९८५ में, ये पहली बार दंगे थे। यानी, यहाँ मुसलमान और भारतीय हैं, और हिंदु है, क्षमा करें…  लेकिन २००२ में  यह अलग था। जी हाँ, दरअसल यही कहना था मुझे… इसे कैसे कहें, असल में... जैसा कि मैंने कहा,  शायद लुई दू मों (Louis du Mont)  इसे सुन कर नाराज होंगे,  लेकिन मुसलमान और हिन्दुओं  के बीच कोई तात्विक विरोध नहीं है। जैसे कि कहाँ जाता है की इस विरोध का, नफ़रत का  माहोल हमेशा से चला आ रहा है,  यह बात सच नहीं है... नहीं, नहीं, यह सच नहीं है। दरअसल,  लोग सदियों से एक साथ रहते आए हैं।  इसे याद रखना चाहिए कि ईसाई,  उनके संबंधित धर्म की रचना के संबंध में  मुसलमानों की तरह पहली शताब्दी में भारत पहुंचे।  हम यहाँ हाल ही में हुए किसी अप्रवासन की बात नहीं कर रहे हैं। और मेरे लिए अंतरसामुदायिक हिंसा के लिए  मुख्य कारण,  मुख्य वजहें,  यह हमेशा से आर्थिक ही रही है। इसके अलावा, यह दिलचस्प भी है, क्योंकि  गुजरात एक समृद्ध, अमीर राज्य है। और ये दंगे दरअसल… जी हाँ, जैसा कि आपने बताया,  यह एक अत्यधिक औद्योगीकृत राज्य था।  उस वक्त भी यह  भारत का मैनचेस्टर था क्योंकि ग्रेट ब्रिटेन  भारत को कपड़े, वस्त्र वापस भेज रहा था  जिनपर प्रक्रिया करने की जरुरत थी,  और इन्हें उसके बाद फिरसे ग्रेट ब्रिटेन में भेजा जाता था। और वास्तव में,  १९५०-१९६० के दशक में औद्योगिक पुनर्गठन का  एक चरण चल रहा था। तो, हम कुछ बहुत बड़े बदलावों से गुजर रहे हैं जिसमें  औद्योगिक इकाइयाँ, जो बड़े तौर पर मजदूरों को कार्यरत करते हुए रसायन विज्ञान में अत्यंत आधुनिक उद्योग थे, वगैरा वगैरा...  इसलिए, उस वक्त एक बहुत बड़े पैमाने पर  मजदूरों को काम से हटाया गया था। यह याद रखना होगा की उस समय जब आप कारखाने में काम करते थे, तो यह सिर्फ एक नौकरी नहीं थी, यह एक सामाजिक सुरक्षा कवच था। क्योंकि, वहाँ सब कुछ मिलता था … सहायता की कई  ऐसी संस्थाएँ थीं जिन्हें साझा किया जाता था। मिसाल की तौर पर, कैसे कहे... अब मैं बस यूं ही बेतरतीब बातें कर रही हूं, लेकिन वे मजदुर संघ नहीं हैं। यह वैसा नहीं था, लेकिन फ़िलहाल हम अपूर्ण रूप से इसका अनुवाद संघों के रूप में कर लेते है, इस खास दौर की जो हम बात कर रहे हैं, उसके लिए। लेकिन इसी की बदौलत हिंदू और मुस्लिम श्रमिकों को साथ मिलकर काम करने का मौका मिला।

अक्सर दंगे गरीब इलाकों में काफी बार होते हैं। शुरुआत में, इन इलाकों में  हिंदू और मुसलमान "अछूतों" की  आबादी ज्यादा होती है जो की  बेरोजगारी के पहले शिकार होते है। इसलिए, वे "नेताओं" के  चंगुल में आसानी से आ जाते हैं। क्योंकि, इसके अतिरिक्त ख्रिस्तोफ जाफ्रलो (Christophe JAFFRELOT), जिन्होंने मुझे अच्छी तरह पढ़ा है, उनके काम के अलावा  इस विषय पर सबसे महत्वपूर्ण काम, सबसे प्रासंगिक लेखन किया गया है « वार बेरेन शॉट » द्वारा।  उदाहरण के लिए, २००२ के संबंध में  वह साबित करते है की मुसलमानों के खिलाफ  हमले सबसे हिंसक उन मोहोल्लों में होते हैं,  जहाँ वास्तव में, हिंदू अपने "नेताओं" पर, अपने इलाके के नेताओं पर  सार्वजनिक सेवाएँ प्राप्त करने के लिए सबसे अधिक निर्भर हैं। यानी, जैसे की किसी अस्पताल में  बिस्तर के लिए, कैसे कहें,  किसी स्कूल में जगह पाने के लिए, इत्यादि... तो, यहीं पर आपको एक “दलाल” की आवश्यकता होगी क्योंकि सार्वजनिक सुविधाएँ, एक सार्वजनिक  और सार्वभौमिक तरीके से अनुपस्थित है। मैं यह कर रही हूँ... मेरा मतलब है,  मैं यहां इसका जिक्र कर रही हूँ;  क्योंकि यह एक दृष्टिकोण है,  इस मामले में थोड़ा राजनीतिक दृष्टिकोण,  राजनीति विज्ञान से जरा हटके  लेकिन फिर भी राजनीति से संबंधित... दरअसल, जिस पल से यहां सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध होती हैं,  लोग एक दूसरे को काटने-मारने  के लिए कम इच्छुक होते हैं। मतलब, यह वास्तव में उसी क्षण से होता है  जहां लोग बराबर खाना खा सकते है,  वे अपना ख्याल खुद रख सकते हैं, इत्यादि... जी हां,  और यह सिर्फ मुसलमानों तक ही सीमित नहीं है…

उदाहरण के लिए,  हम बात कर रहे थे... मैं जरा जल्दी में बोल रही हूँ,  लेकिन हम १९८५ के दंगों के बारे में बात कर रहे थे। १९८५ के दंगों की जड़ें १९८१ तक जाती हैं  जबकि असल में यह मामला कुछ निम्न हिंदू जातियों के उच्च जातियों के विरुद्ध मांगों के बारे में था। इसके खिलाफ और इसके विपरीत क्योंकि उस वक्त सरकार बहोत सारे  आरक्षण की बात कर रही थी, संक्षेप में बताने के लिए… लेकिन उस वक्त सरकार पिछड़े सामाजिक वर्गों के लिए,  निम्न हिंदू जातियों के लिए, सिविल सेवा और विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए आरक्षण बढ़ाने जा रही थी। और उच्च जातियों ने इसका विरोध किया। तो, यह घटना केवल हिंदुओं के बीच घटी थी। हालाँकि, १९८० और १९८५ के बीच,  हिंदू लामबंदी के उद्यमियों द्वारा, जिसमें मूल रूप से पूरा संघ परिवार शामिल था,  जैसे की रास्वसं, बजरंग दल, विहीप, इत्यादि द्वारा, यह काम उनकी तरफ़ से किया जा रहा था और इसी तरह से जन परिवर्तन किया गया…  मूलतः, बहुत संक्षेप में बताने के लिए, उन्होंने लोगों के मनमे यह बात जताने की कोशिश की कि “तुम्हारा शत्रु हिंदू उच्च जाति नहीं है जो आपसे ज्यादा पैसे कमाता है, लेकिन यह पड़ोस में रहने वाला मुसलमान है,  जो आप जितना ही गरीब है।“  देखिए, यही तो रूपांतरण है। और बेशक मैं इस सोच से सहमत नहीं हूं। मैं इसे भ्रामक मानती हूँ। और वास्तव में,  शोध कार्य से भी यही पता चलता है। तथ्य, जब आप आंकड़ों को देखते हैं तो  तथ्य इसे साबित करते हैं।

अनुबंध: जी हाँ, बहुत बढ़िया। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

बस एक आखिरी पहलू बचा है, जो यह है कि जुहापुरा में जीवन। लेकिन इससे पहले कि हम उसकी बात करें,  मैं २००२ के नरसंहार पर, उसकी विशिष्टता पर आपके कहे का सारांश  प्रस्तुत करना चाहूंगा। मैंने संक्षेप में बताने के लिए  एक छोटी तालिका तैयार की है। शायद हम इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख पा रहे हैं।

 


लेकिन मैं सिर्फ इन बिंदुओं को पढ़ने जा रहा हूं। अतः, २००२ की घटना, २००२ के नरसंहारों की विशिष्टता:  यह "राज्य द्वारा आयोजित नरसंहार था।” अतः, इसका स्वरूप राजनीतिक है। "चूंकि इसमें (नरसंहार में)  हिंदू बहुसंख्यक वर्ग, पुलिस, प्रसारमाध्यम,  सरकार, ये सभी लोग शामिल थे,  इसलिए व्यावहारिक रूप से  मुसलमानों को अपनी रक्षा करना असंभव था।“ “आंतरिक शत्रु को, उसकी मानवता से नकार के, उसे मिटाने का यह दोहरा जुनून था।” “इस दौरान सुनियोजित तरीके से  महिलाएं और बच्चे निशाना बनाये गए थे।" हाल के भारतीय इतिहास में "इस कद्र हिंसा का   लैंगिक विकृतिकरण अभूतपूर्व है।” "इसमें परिवार के सामने महिलाओं और लड़कियों का बलात्कार,"  पुरुषों के साथ बलात्कार भी होता है," जिसका आपने उल्लेख किया है। तो, बलात्कार क्यों? क्योंकि “यह प्रभुत्व का एक  शक्तिशाली कृत्य है जो किसी मनुष्य को अपने शरीर और अपनी आत्मा दोनों में अपमानित करने का मौका देता है।“ 

इसके बाद, "शिक्षित उच्च जातियाँ  और आर्थिक रूप से संपन्न लोग भी इस बार हमले का शिकार हुए थे।“ फिर, "मुस्लिम धार्मिक श्रद्दा स्थलों की तबाही।“ उदाहरण के लिए, एक सूफी संत की समाधि,  उनके दरगाहें नष्ट किये गए।  यहां तक कि पुरातात्विक महत्व वाले स्थल भी, जैसे मोहाफिज खान की मस्जिद जिसका निर्माण १४८५ में हुआ था,  फिर उर्दू कवि और सूफी संत वाली गुजराती द्वारा  १७०७ में रचित मकबरे को भी तबाह किया गया। और फिर आपने जो बात  अधोरेखित की है वह यह है कि आज, उन्होंने उस जगह... "इन स्थानों पर भगवे झंडे",  जो हिंदू धर्म के प्रतीक हैं, गाड़े गए है। फिर, हमारे पास "आदिवासी समूहों के इस्तमाल"  का मुद्दा आता है। “हमलावरों का अधिकांश हिस्सा  आदिवासी जिलोंसे आया था।“ “लेकिन मुख्य रूप से उनकी गतिविधियाँ लूटपाट और आग  लगा देने तक सीमित थी।  आम तौर पर, उनकी भूमिका बलात्कार और हत्याओं में नहीं थी।" और इन सबका परिणाम यह हुआ कि  "१९६५ से, १९८५ और १९९२ के  दंगों के मामले के विपरीत एक अत्यंत पीड़ित, दुखी समुदाय का जन्म हुआ।“ तो आप इस सब पर क्या सोचती हों? 

शार्लोत: जी हाँ। सबसे पहले तो, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद…  यहीं पर आपको एक अभियंता का दिमाग देखने को मिलता है! इस आरेख के लिए धन्यवाद, यह बहुत स्पष्ट है। और यही इसका सार है। या यूं कहें कि  यही सब कुछ संक्षेप में बताता है।

क्योंकि मुझे एहसास है, मुझे लगता है,  यह भी उल्लेख करना महत्वपूर्ण है,  इन सबमें वापस जाने से पहले…  लेकिन जल्दी ही…  इस नरसंहार का अंतिम लक्ष्य...  दरअसल, लक्ष्य क्या था? आप यूं ही लोगों को नहीं मार सकते। मैं कहती हूं कि तब लक्ष्य यह था, जैसा कि हमने कहा, मैं कह रही हूं कि लक्ष्य  इन हमलों में यह मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर  एक निर्विवाद वर्चस्व स्थापित करने के बारे में था। अधिकारियों के दृष्टिकोण की बात करने के लिए मै फिर से वापस आयुंगी, लेकिन अंततः, मैं इसमें एक "विरोधाभासी रूप" साबित करती हूँ क्योंकि मैं इस विरोधाभास का विश्लेषण कर रही हूँ। मेरे सभी शोध कार्योंका उद्देश्य किसी भी प्रकार का विरोधाभास न छोड़ना है। दरअसल, इसी (हिंसा) ने जुहापुरा के निवासियों द्वारा  प्रतिरोध को बढ़ावा दिया, जैसा की हमने पहले कहा था, उसके आधार पर... धनी लोगों ने जुहापुरा पहुंच कर इस इलाके का बहुत अच्छे तरीके से विकास किया है और जैसा कि स्थानीय लोग आज आपको बताते हैं  “जुहापुरा एक अनमोल रत्न है! हम स्वयं निर्मित देवदूत हैं।” और इसलिए, वे अपने इस आत्म-विकास पर और अब किसी पर (आश्रित) न रहने पर बहुत गर्व करते हैं, क्योंकि वे एक उपेक्षित घेटो के कलंक से बाहर निकल आए हैं।  इसलिए, इस बात पर प्रकाश डालना महत्वपूर्ण है।

तो, "वर्चस्व और प्रतिरोध:  जुहापुरा में घेटोकरण के विरोधाभास”,  मेरे शोध प्रबंध का मूल शीर्षक है,  यह मेरा खुद का मूल शीर्षक है। मैं ऐसा इसलिए कह रही हूं क्योंकि दो या तीन  ऐसे लेख प्रकाशित हुए है, जिनमें  बिना मेरा जिक्र करते हुए मेरे शोध प्रबंध का  शीर्षक इस्तमाल किया गया है ।  मुझे यह थोड़ा गलत लगता है।  खैर… 

और अधिकारियों के दृष्टिकोण से,  यह दृष्टिकोण…  मुझे लगता है कि यही कारण है… मैं कह रही हूं कि हिंसा लक्षित थी और वास्तव में, “Espace politique” में  मैं एक लेख लिख रही हूँ जो वास्तव में धार्मिक, नस्ली नरसंहार की सक्रियता के विषय में है। क्योंकि, बात यही है। मेरे लिए सब कुछ इसी वजह से है। इसलिए, यह इस पूरे  कारणों की वजह से है जो मैंने आपको बताए...उदाहरण के लिए, आप देखिए, जब हम बलात्कार की बात करते हैं,  तो यह (सामान्य) बलात्कार नहीं थे... बलात्कार वैसे भी बेहद अमानवीय है।  लेकिन ये सामान्य बलात्कार के मामले नहीं हैं।  ये वे बलात्कार हैं जो किए गए थे  त्रिशूल, तलवारों  के साथ, मतलब  हिंदू देवताओं के निशानों के साथ।  इसलिए, इसका भी कुछ अर्थ है। इसका मतलब है की दूसरे के शरीर में स्वयं को गाड़ना,  दूसरे की पवित्रता को भंग करने के इरादे से,  दरअसल, उन्हें "दूषित" करने के लिए। आप समझ रहे है?  बलात्कार के मामले में भी यही बात लागू होती है। पुरुषों के साथ भी बलात्कार किया गया। अक्सर ऐसी मान्यता है की मुस्लिम (पुरुष)  बहुत अधिक प्रजनन करते है  और भी इस तरह की मान्यताये है। उन पुरुषों के साथ बलात्कार किया गया। दरअसल, अक्सर उनके लिंग काट दिए जाते थे।

अंत में, मेरा मतलब है, रवांडा में नरसंहार की सक्रियता में इस तरह की चीज़े हमें देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए, तुत्सी और हुतु के बीच,  जहां दोनों पक्षों ने एक दुसरे पर हमला किया था…  इसे कैसे कहें, उनकी कल्पना में प्रभुत्व का जो खयाला था उसे लक्ष्य बनाकर। आप समझ रहे है?  इसलिए, यह कहना इसीलिए महत्वपूर्ण है।  और आप हिंदू (भगवा) झंडों के बारे में बात कर रहे थे। दरअसल, मुझे थोड़ी देर हो जाएगी… लेकिन जिन जगहों को  निशाना बनाया गया,  जिन धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया था, यह स्पष्ट करना बहुत महत्वपूर्ण है कि  ये रोजमर्रा की जिंदगी की  मस्जिदें नहीं हैं। जैसे की “मुसलमानों” की, आस-पास की  मस्जिदें, इत्यादि। जो की सचमुच आपके पड़ोस में ही हैं… नहीं, उनके लक्ष्य विरासत के स्थल थे। जैसे की "दरगाह" के वे स्थल जो... कैसे कहें,  वे स्थान जहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों न केवल जाया करते थे बल्कि जिनकी अभियाचनाभी (practiced) कि जाती थी। इसलिए, विविधता वाले स्थान,  धार्मिक समन्वयवाद की जगहे। इस वजह से, लोगों के मन में बसी इस धारणा को नष्ट करना  आवश्यक था कि यह जगहें और यह दरगाहें कभी अस्तित्व में थीं। आज, वालिद गुजराती की दरगाह,  जो कि एक बेहद प्रसिद्ध व्यक्ति हैं।  आज यह दरगाह सीमेंट सेढकी हुई है।  यह मर रही है…  खैर…और “विरासत मस्जिदों” की बात करें तो...  क्योंकि सांस्कृतिक विरासत का यही अर्थ है। इसलिए, यह हम सभी की  सांस्कृतिक विरासत है। 

और मैं आपको यह भी याद दिलाना चाहती हूँ  कि कई अभियान चलाये जाते हैं जैसे  ताजमहल को पर्यटन गाइडों से हटाने का सवाल! क्योंकि यह उत्तर प्रदेश के  मुसल्मानोंने बनाया था। अहमदाबाद का नाम बदल के इसे एक हिंदू नाम  देने की भी बार-बार मांगें होती रहती हैं। खैर, यह एक ऐसे अज्ञात गांव का नाम है  जिसका कभी कोई अस्तित्व ही नहीं था। माफ़ कीजिये, मैं थोड़ी बेबाक बात कह रही हूँ। लेकिन इतिहास हमें यही दिखाता है।  तो, कभी कभी... खैर, मैं भी कभी-कभी खुद को इनकी सांस्कृतिक पुनर्निर्माण की आपत्तिजनक बातों पर थोड़ा मज़ाक करने की इजाज़त देती हूँ। और इसलिए, मेरे लिए अधिकारियों के दृष्टिकोण से यह योजना थी की इन जगहों को  पुनः प्राप्त किया जाएँ। “जगहें” क्योंकि… जैसा कि मैं कह रही थी, "मुस्लिम बहुल क्षेत्र",  जिन क्षेत्रों को निशाना बनाया गया था,  वे समृद्ध इलाके थे,  वे अमीर इमारतें थी। तो, वास्तव में,  इनके लिए इन सब मौल्यवान इमारतों को सस्ते में, फ़ोकट में हथियाना यह कोई  बुरी तरकीब नहीं है। इस प्रकार, आपको इसमें बहुत लाभ होता है। तो, बात यही है…  मैं चुनावी पहलू को छोड़ दूंगी, जिसे समझना काफी "सरल" है। आपने इसका जिक्र किया था। बस एक याद दिलाना चाहती हूं कि नरेंद्र मोदी,  उनकी नियुक्ति २००१ में हुई थी, वे निर्वाचित नहीं हुए थे। केशूभाई पटेल की जगह लेकर, उनका पदभार ग्रहण करके,  पटेल जो की रास्वसं और भाजपा दोनों के थे,  लेकिन जिनका मध्यावधि चुनाव में, चुनाव परिणामों  के लिहाज से खराब प्रदर्शन रहा था। इसलिए, इसके बाद होने वाले चुनाव में  भाजपा को हार की आशंका थी। और इसलिए, उनके लिए यह एक मुश्किल स्थिति होती। क्योंकि, १९९५ में गुजरात एक पहला  ऐसा राज्य था जहाँ भाजपा अकेले,  अपने बलबूते पर जीती थी। तो, सीधे शब्दों में कहें तो, असल में, दंगा भड़काना भाजपा के लिए अपने मतदाताओं को संगठित करने का एक तरीका है। मामला चाहे जो भी हो, गुजराती राजनीतिक परिदृश्य में, जहाँ  वामपंथी राजनीतिक दलों का अभाव है, जैसे की सीपीआई - "भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी",  जिनके प्रति वहाँ कोई आकर्षण नहीं है। और जहां कांग्रेस पहले से ही है एक बेहद दक्षिणपंथी, रूढ़िवादी वल्लभभाई पटेल की परंपरा के अनुरूप वाली कांग्रेस है।

खैर, मैं इस चुनावी अध्याय को यहीं समाप्त कर रही हूँ।  मुझे उम्मीद है कि लोग मुझे माफ कर देंगे।  लेकिन इसे समझना काफी सरल है। लेकिन वहीं दूसरी ओर, वैचारिक पहलू के संबंध में, आज हमें  क्या देखने को मिलता है और जो आज भी भारत में राजनीतिक चिंतन को प्रभावित कर रहा है। इसलिए, उन क्षेत्रों को पुनः प्राप्त करने के लिए,  उन हिंदू स्थलों को शुद्ध करने के लिए,  वास्तव में २०२० में नई दिल्ली में  यही हुआ है। नई दिल्ली की कहानी भी बिल्कुल वैसी ही है। ये वे क्षेत्र हैं जो वास्तव में... ये क्षेत्र इतने गरीब नहीं थे। उन्हें बरामद कर लिया गया है और जिसके  परिणामस्वरूप, एक निर्बाध हिंदू क्षेत्र के  निर्माण की अनुमति मिली गयी। यह मुसलमानों को एकजुट करने में मदद करता है। तो, यही संयुक्त राज्य अमेरिका में अश्वेत घेटो का सिद्धांत है। यह भी सिद्धांत है संयुक्त राज्य अमेरिका में अश्वेतों की घेटो का। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम इस आबादी को,  जिसे निम्नतर माना जाता है और जो द्वितीय श्रेणी के नागरिक हैं, उन्हें नहीं चाहते। वहीं दूसरी ओर, हम उनके आर्थिक शोषण  को अपने फायदे के लिए  जारी रखना चाहते है!  इसलिए, हम उन्हें गायब नहीं करने जा रहे हैं क्योंकि हमें उनकी जरूरत है। इसलिए, हम उन्हें एक साथ समूहित करते हैं। 

अनुबंध: इन सबके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद शार्लोत! यह बहुत ही प्रासंगिक स्पष्टीकरण था।

अब मैं इस साक्षात्कार को जुहापुरा के साथ  समाप्त करना चाहूंगा, क्योंकि यह किताब  मुख्य रूप से जुहापुरा के बारे में है। जिन्हें इस विषय में रुचि है उनके लिए मैं किताब के  अध्यायों से ही उद्धरण देने जा रहा हूँ,  जो आपने विकसित किये है। और चूंकि आप जानते हैं  इस विषय की संवेदनशीलता और कैसे आज भी भारत में यह काफी हद तक एक वर्जित विषय है।

शार्लोत: बिल्कुल, जी हाँ! खासकर भारत में, सच है!

अनुबंध: इसलिए, इस बारे में बात करना महत्वपूर्ण है। तो, जुहापुरा से संबंधित कुछ अध्याय।  जुहापुरा,  एक झुग्गी बस्ती से लेकर एक घेटो तक।” आपने लॉकडाउन का जिक्र किया,  घेटो में सरकार,  घेटो में शरणार्थी-शिविर,  रोजमर्रा की प्रतिरोध रणनीति, रोजमर्रा की जिंदगी जीने की कला।” इस किताब के निष्कर्ष में, आपने तीन महत्वपूर्ण बातों की ओर  इशारा किया है;  इसमें सरकार द्वारा जुहापुरा के लोगों की ओर,  खासकर मुसलमानों की ओर भेदभाव किया जाता है। इसलिए, यहाँ कोई सार्वजनिक सेवाएँ  मौजूद नहीं हैं जैसे कि पानी, विद्यालय, अस्पताल,  जिनके बारे में हमने बात की थी। फिर प्रतिरोध की रणनीतियां और स्वसहायता गुट भी हैं। और फिर, एक आखिरी बात जो कि बहुत ही रोचक और महत्वपूर्ण है। यह वर्चस्व के बारे में है। आपने प्रभुत्व के दो प्रकार के बारे में बात की है; एक है लैंगिक प्रभुत्व  और दूसरा है अन्य जातियों का वर्चस्व। तो यह सब बात है। और अब वहां के लोगों के लिए आर्थिक स्थिति  काफी मुश्किल है। और हाँ, यह बताना भी अत्यावक्षक है कि कि आपने यह किताब  लिखी थी उसमें कुछ समय बीत गया है, जैसे  यह किताब २०१८ की प्रकाशित है। तो, स्वाभाविक रूप से, तब से आज चीजें बदल गई हैं।

लेकिन इस अनुभव के बारे में आपका क्या विचार है?  जुहापुरा के संबंध में, इन टिप्पणियों के बारे में?  क्या आप हमसे कुछ कहना चाहेंगे? इस अध्याय का उचित समापन करने के लिए?

शार्लोत: हां, और उससे भी पहले क्योंकि यह किताब मेरे शोध प्रबंध पर आधारित है। लेकिन परिणामस्वरूप, मेरे शोध का क्षेत्र, मैंने यह काम २००९ से २०१४ के बीच किया था। इसलिए, २०१६ में मैंने इसमें कुछ चीजें जोड़ दीं है। लेकिन यह बात को पूरी तरह स्पष्ट करने के लिए है। मै इसमें और क्या जोड़ सकती हूँ?  हां, क्योंकि मेरे लिए… लेकिन जुहापुरा के बारे में  हमें कोई « लुभावना चित्र » भी नहीं बनाना चाहिए। मेरा मतलब है, जुहापुरा के मुसलमान,  वे सभी एकजुट नहीं हैं। क्या वे सब एक साथ हैं? बिलकुल नहीं!

वैसे, कुछ लोग तो भाजपा को भी मत देते हैं, शक्तिशाली लोगों का  साथ देने के लिए। वे मुझसे यही कहते हैं। अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए। इसलिए, ये अक्सर उनके भीतर “सांप्रदायिक” अल्पसंख्यक होते हैं... जो की अल्पसंख्यकों द्वारा आज्ञाकारिता का  प्रतिनिधित्व करते है, लेकिन फिर भी। और फिर, सबसे बढ़कर, वास्तव में,  ऐसी सभी स्थितियों में जैसे होता है। दुनिया में कुछ  प्रभुत्वशाली लोग है और कुछ अधीन लोग होते हैं। तो, यहां निचली जातियाँ या मुस्लिम बहिष्कृत लोग एक ऐसे संदर्भ में हैं  जहां कोई सार्वजनिक सेवा नहीं है,  पुलिस को छोड़ कर। यहां कोई सार्वजनिक सेवा नहीं है,  कोई कल्याणकारी राज्य नहीं है। और वास्तव में हम  यह कैसे परिभाषित करते हैं कि हम किस स्थिति में हैं?  परिणामस्वरूप, हम ऐसी स्थिति में हैं जो मुख्य रूप से  विकास के लिए निजी पहलों पर निर्भर करता है। और बल्कि, यही निजी पहलें है जो  लाभार्थियों का चयन करती है।

तो, यही तो पूरी समस्या है। क्यों? क्योंकि हम  भाई-भतीजावाद के खिलाफ हैं, दान-पुण्य के खिलाफ हैं... क्योंकि वास्तव में इसमें लोग "चुनते" हैं  जबकि सार्वभौमिक कर के साथ,  सरकार बिना किसी मनमाने ढंग से, गैर-चयनात्मक तरीके से,  न कि किसी को "चुनने" के द्वारा निवेश करती है। इसमें सबसे गरीब लोग खुद को पूरी तरह से निर्भर पाते हैं … एक बार फिर, वे खुद को पिरामिड के सबसे निचले  हिस्से में पाते हैं, आप समझ रहे है? और आपके पास वहाँ इसमें कुछ सोचने के लिए है। वैसे भी, इसे आज भी देखा जा सकता है... कम से कम तब तो  ऐसा ही था… खैर, मुझे लगता है कि तब से अब ज्यादा बदलाव नहीं आया है, लेकिन हर सुबह आप इसे देखते हैं... “मुस्लिम दैनिक मजदूरों” की एक लम्बी कतार। तो, यही लोग हैं जो वास्तव में बहुत ही मितव्ययी, गरीबी का जीवन जीते हैं और जिनका औरोंसे कम,  मेरा मतलब है, ऐसी मजदूरी जो बाजार दर से भी कम होती है क्योंकि उनके साथ सभी लोग भेदभाव करते हैं।  दरअसल, सचमुच ऐसा है… और यही बात मैं कह रही थी। और यही उनकी योजना है। 

तो, ये मेरे निष्कर्ष हैं जिन्हें मैंने २०१४ में पहचाना था। उसके बाद दो या तीन लोगोंने  उस दिशा में  शोध कार्य जारी रखा। लेकिन, मैं अब भी दावा कर रही हूँ  इन सब की प्रसूति का,  जो पूरी तरह से मेरी है। लेकिन, उदाहरण के लिए,  मैंने ही इसकी शुरुआत की थी की जुहापुरा को एक मुस्लिम शहर के रूप में पहचाना जाये और ना की पहले की तरह कोई घेटो। क्योंकि यह एक वास्तविक (समृद्ध) स्थान है,  यह बहुत ही घना है... अंत में, जुहापुरा, बहुत घना है। और यह बहुत ऊँचा बन रहा है। दरअसल, अगर लोग जिज्ञासु हैं, तो वे गूगल इमेजेज पर इसकी कुछ तस्वीरें देख सकते है। आपको हर जगह निर्माण का, मरम्मत का कार्य दिखाई देगा। या फिर, मेरी किताब खरीद लो! नहीं, मैं तो बस मजाक कर रही थी। लेकिन निर्माण कार्य बहुत बड़ा है। यह लंबवत रूप से अधिक सघन होता जा रहा है,  "अल बुर्ज टावर" जैसी मीनारों के साथ, जो हमें याद दिलाएगा  गोल्फ से जुड़े कुछ नाम। तो, यह एक ऐसा शहर है  जहां यह और भी ज्यादा... इसे कैसे कहें,  जहाँ एक दूसरे के बीच का फासला और भी गहरा हो रहा है।

और मैं इसे फिर से कहूंगी, लेकिन वास्तव में  महिलाएं… उनके लिए... फिर भी,  यह काफी हद तक एक रूढ़िवादी शहर है।  वहाँ की महिलाएं... कम से कम यह कह सकते है की उनके लिए स्थिति और भी जटिल हो जाती है कि...  यहां भी, पूर्वाग्रह से बचने की आवश्यक है। मैं इसे कैसे कहूँ? यहाँ सब कुछ सामंजस्यपूर्ण नहीं है… क्षमा कीजिए, लेकिन महिलाएं  नरसंहार के बाद, जो विधवा हो गईं, वे कुछ मुस्लिम व्यक्तियों द्वारा (यौन) तस्करी का शिकार हो गयी। अंत में, मेरा मतलब है,  यह सिर्फ इसलिए बता रही हूँ क्योंकि मैं अपने काम के प्रति ईमानदार हूं।  तो, वहाँ महिलाएं असुरक्षित हैं।  ज़ाहिर है, और एक बार फिर… हाँ, हमेशा की तरह। आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो वे सबसे कम सुविधा प्राप्त वर्ग हैं। लेकिन यह एक ऐसा इलाका है जो अभी भी... यह एक शहर के भीतर एक शहर है, जो अभी भी वैसा ही है। यह एक बहुत ही सक्रीय, गतिशील इलाका है... और जिसका खाड़ी देशों के साथ  मजदूरों के लिए गहरा संबंध है।

अनुबंध: ठीक है। बहुत-बहुत शुक्रिया, शार्लोत।

अब, हमारी बातचीत को संपन्न करने के लिए और बहस को थोड़ा और व्यापक बनाने के लिए,  और इसका वर्तमान के साथ एक  सम्बन्ध बनाने के लिए मै कुछ कहना चाहूँगा। मेरी राय में, आज गाजा में जो हो रहा है… और मुझे लगता है कि इस संबंध को  उजागर करना बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि हिंदुत्ववादी वर्चस्ववादियों के लिए, भारत में रास्वसं और भाजपा के लोगों के लिए… यह विरोधाभासी है, लेकिन उनके लिए, उनका आदर्श हिटलर का, नाज़ी विचारधारा का आदर्श था। लेकिन आज, इस संबंध में,  आज उनका आदर्श इज़राइल है,  गाजा में इज़राइल जो कर रहे हैं उसके लिए। 

शार्लोत: हाँ… बिलकुल! 

अनुबंध: और फिर, हमें इस बात को भी अधोरेखित करने की आवश्यकता है कि भारत  इजरायली हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है। वे दोनों एक ही पद्धति का उपयोग करते हैं जैसे मुसलमानों के घरों को नष्ट करने के लिए  उत्तर प्रदेश में "बुलडोजर" का मामला। इसलिए… क्या इस विषय पर आपके कोई विचार हैं?

शार्लोतहां, हां… आह, आप भी ना! जाहिर है,  मुझे बहुत देर हो जाएगी लेकिन कोई बात नहीं...  क्योंकि मैं किसी ऐसी बात को  नजरअंदाज नहीं कर सकती जो  बहुत गंभीर और महत्वपूर्ण है। सबसे पहली बात। जी हां, उन सभी के लिए  जो वहां हमारी बात सुन रहे हैं। तो एम.एस. गोवालकर… यह मजेदार है क्योंकि  मैं अभी उन्हें पढ़ रही हूँ।  वह “हिंदुत्व” के विचारकों में से एक हैं।  एक बार फिर “हिंदुत्व”, मैं यह अंतर करती हूँ। इसलिए, मैं "हिंदू" नहीं कह रही हूँ  लेकिन “हिंदुत्व।”  १९६० के दशक में वे बताते हैं कि...  हिटलर ने जो किया उसे मुसलमानों के साथ भी  दोहराने कि आवश्यक है, उनके साथ भी  ऐसा ही किया जाना चाहिए, यह उन्होंने साफ-साफ लिख डाला! “हमें मुसलमानों से उसी तरह से निपटना होगा जिस तरह  हिटलर ने यहूदियों के साथ व्यवहार किया था।“ तो, हम अभी भी एक राजनीतिक विचार से जुंझ रहे हैं,  जिसकी वजह से कभी-कभी मुझे लगता है कि हमें थोड़ा चिंतन करना चाहिए। खासकर जब हम ताली बजाते हैं और विशेष रूप से, जब फ्रांस के वर्तमान राष्ट्रपति (इमैनुअल मैक्रॉन) २१०९ में भारतीय लोकतंत्र की  "लोकतांत्रिक उपलब्धियों" की सराहना कर रहे थे, जबकि भारत ने उस वक्त, हालही में कश्मीर का विशेष दर्जा  निरस्त किया था। मुझे लगता है कि उन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है... उन्हें थोड़ी सी जरूरत है की वे अपनी राजनीतिक समझ पर थोड़ा सा काम करें।

आप जो कह रहे हैं वह अत्यंत प्रासंगिक है और अत्यंत गंभीर है। इस संबंध में कई बातें हैं। पहला यह है कि कश्मीर में २०१९ में, क्षमा करें, २०२४ में,  आतंकवादी हमले के बाद से और यह इससे जुड़ा हुआ है… देखिए, मेरा मतलब यही है... जो आप कहते हैं  बुलडोजरों द्वारा मचाई गई तबाही… तो, आपको वह  (अहमदाबाद शहर का) छोटा सा नक्शा याद है ना? आप हमें शुरुआत में जिसे दिखा रहे थे?  वहाँ हमारे पास "औद्योगिक इलाका" था... और अगर लोगों को अब भी नक्शा याद हो... बस एक महीने पहले, कुछ ऐसा ही, शायद उससे भी थोड़ा कम,  दानिलिम्दा के पास, जो उसी क्षेत्र में है,  उत्तर में औद्योगिक क्षेत्र, या बल्कि दक्षिण में, क्षमा करें, औद्योगिक क्षेत्र के दक्षिण-पूर्व में। वहाँ १९६० के दशक से  मुस्लिम लोगों की बस्ती है...  जो वास्तव में हैं… लेकिन फिर ऐसा है जैसे… जैसे आप और मैं, हम अपने घर पर हैं,  फिर हम सुबह उठते हैं, और फिर,  एक बुलडोजर आता है और आपका घर तोड़ देता है!  बस ऐसे ही हुआ! मैंने गुजरात में अपने  जान-पहचान के लोगों से इस बारे में चर्चा की।  संक्षेप में कहें तो, क्योंकि वे भारतीय (गुजराती मुस्लिम) हैं।  तो उन्होंने इसे ध्वस्त कर दिया।  मुझे लगता है लगभग ८० घर हैं। इसलिए, ३०० परिवार बेघर हो गए हैं।  किस आधार पर, किस मकसद से?  कि वे पाकिस्तानी  या बांग्लादेशी आतंकवादियों को आवास प्रदान कर रहे थे! तो, वर्तमान में हम जो देख रहे हैं, विशेषकर वेस्ट बैंक में, उसके आधार पर यहाँ थोड़ी निरंतरता दिखती है।

मैं गाजा के साथ तुलना के विषय पर भी वापस आती हूँ, विशेष रूप से कश्मीर पर, जो एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर भी मैंने काम किया था। कुछ भी हों, कश्मीरी और गाजावासियों के बीच एक बहुत मजबूत एकजुटता है। और अगर आपने तस्वीरें आदि देखी हैं। लेकिन, उदाहरण के लिए, श्रीनगर की दीवारों पर,  जो की कश्मीर की राजधानी है,   "गाजा की आजादी",  इसे लगभग हर जगह लिखा है। जब आप कश्मीरियों से बात करते हैं, या फिर आप  भारतीय अधिकारियों के बारे में जहां कहीं भी पढ़ें,  अंततः, आज के हिंदू अधिकारियों के अनुसार, उनका सिद्धांत, उनके मंसूबे, उनका मकसद कश्मीर को वेस्ट बैंक में बदलना है। दूसरे शब्दों में कहें तो, हमें यहां भी सावधानी बरतनी चाहिए। इससे पहले कांग्रेस हमेशा कश्मीर के मुद्दे से आर्थिक और सुरक्षा के दृष्टिकोण से निपटती थी। इसमें कोई दो राय नहीं है।  कश्मीरियों को कभी सम्मान नहीं मिला। लेकिन भाजपा इसमें पहचान का एक नया आयाम जोड़ती है। और इसलिए, उनका मकसद एक वेस्ट बैंक का  निर्माण करना है। यानी, कुछ ही छोटे गाँव,  कमोबेश मुस्लिम गाँव को बनाये रखना और बाकी सब कुछ, असल में…  दरअसल, यही तो बात है...  २०१९ में (कश्मीर का) विशेष दर्जा  हटाने के साथ ऐसा ही हो रहा है। जिससे गैर-कश्मीरियों को जम्मू और कश्मीर में जाकर, वहां जमीन खरीद कर बसाने के लिए संभावना तैयार की जा रही है। वहां करीब ८५,००० हिंदू बसे हुए हैं और फिर पर्यटक भी हैं। अंत में, इनकी संख्या  ३.५ मिलियन (३५ लाख) है, जो लगभग कश्मीर की आधी आबादी के बराबर है। और इसी तरह वे वहाँ  ज़मीन खरीदते हैं... तो, इन सब बातों का तात्पर्य यह है कि गुजरात के अलावा,अभी जो कुछ भी हो रहा है वास्तव में… एक वास्तविक… और (भारतीय) अधिकारी इस बात को छिपा नहीं रहे हैं।

जैसा आपने कहा, आपने जिन  समानताओं का उल्लेख किया है आर्थिक मोर्चे पर,  हथियारों के साथ,  कूटनीतिक और राजनीतिक। नेतन्याहू और मोदी अपनी आपसी मित्रता,  बातों को छिपाते नहीं हैं। वहाँ दोनों के बिच कुछ करने की प्रबल इच्छाशक्ति है। यह एक वर्चस्ववादी शासन है। इसलिए, मैंने उस पहलू पर काम किया। लेकिन मैं एक शोध लेख का मसौदा तैयार  कर रही हूँ जहां मैं स्थापित करती हूं,  पूरे संयम के साथ, फासीवादी अवधारणा के साथ,  एक संबंध स्थापित करने के लिए जैसा कि गौवालकर ने वर्णित किया है,  यानी, किसी भी ऐतिहासिक संदर्भ  में खरें ना उतर कर। लेकिन वास्तव में, ऐसा है की  फासीवाद जाता है और फिर वह वापस आता है। यह चला गया था और अब हम कई राज्यों में  इसका पुनरुद्धार होते देख रहे हैं।

और वास्तव में...  हां, आज मुसलमान, लेकिन ईसाइयों की तरह  उनके लिए एक भी दिन ऐसा नहीं छूटता,  बिना खबरों में पढ़े  कि एक दमनकारी कानून  केंद्र सरकार द्वारा या संघीय राज्यों द्वारा, जो मुसलमानों के खिलाफ न लाया गया हों। कर्नाटक में बुर्खे का विरोध करने के लिए एक कानून लाया गया है।  तो, मुसलमानों के लिए जो बुरखा है,  लेकिन फिर हिंदू इसे कैसे पहनते हैं?  हिंदू महिलाएं कई कारणों से पर्दा पहनती हैं। वे बुरखा पहनती हैं। क्यों?  ताकि धूप में उनकी त्वचा में जलन न हो,  दरअसल, और विशेषकर अमीर महिलाएं, वे अपने चेहरे को ढक लेती हैं,  ताकि अंततः वे काली  ना दिखे। संक्षेप में, मैं यहीं पर अपनी बात समाप्त करूंगी। हाँ, समानता स्पष्ट है।

एक बार फिर, पर्यटन को एक हथियार के रूप में  इस्तमाल करना, और जिसे  वे छुपाते भी नहीं हैं।  शार्लोत, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!  क्षमा करें, इस बारे में एक आखिरी बात। लेकिन यह भी याद रखना महत्वपूर्ण है कि कई हिंदुओं ने  गाजा में युद्ध लड़ने के लिए जाने की स्वेच्छा से पेशकश की थी।

अनुबंध: जी हाँ, और भारत सरकार ने इन प्रयासों का खुलकर समर्थन किया था! 

शार्लोत: बिल्कुल सही। सक्रिय रूप से। बस इतना ही। 

अनुबंधशार्लोत, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद और आपको बधाई! इस कार्य के लिए, इस किताब को लिखने के लिए  और इसे प्रकाशित करने के लिए,  जो, मुझे लगता है कि निस्संदेह बेहद मुश्किल और साहसी काम था। मुझे उम्मीद है कि इस किताब को बहुत से लोग पढ़ेंगे और सिर्फ फ्रांस में ही नहीं। बल्कि, मुझे उम्मीद है कि यह किताब अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रकाशित होगी।

इसलिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।

शार्लोत: लेकिन मै भी आपका बहुत-बहुत शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ! आपका भी धन्यवाद इस प्रस्तुति कार्य के लिए। मेरा मतलब है, आपके द्वारा तैयार की गई  प्रस्तुति सामग्री के लिए। चार्ट, सारांश और सब कुछके लिए। मुझे लगता है कि यह बहुत महत्वपूर्ण है। और यह सब बहुत दिलचस्प है। आपके द्वारा किए गए कार्य का सारांश  जो लोग हमारी बात सुनते हैं, उनके लिए। तो, धन्यवाद।

मुझे बोलने का अवसर देने के लिए भी धन्यवाद। यह पहली बार था जब मैंने मेरे काम के बारे में इतनी विस्तृत जानकारी देकर बात की। तो, मुझे पूरा यकीन है की हम इसका दूसरा भाग जरूर बनाएंगे!  शुक्रिया! 

और मुझे सुनने वाले सभी लोगों को धन्यवाद। मैं आपको याद दिलाना चाहूंगी कि क्योंकि… अतित में मुझे थोड़ी तकलीफ हुई है…  मैं आपको याद दिला दूं कि यह सब  एक विश्लेषण है। तो, एक बार फिर, कृपया सोशल मीडिया पर  मेरा दिन खराब न करें और परस्पर सम्मान करें।

मैं ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्योंकि वास्तव में  मुझे जटिल समस्याओंका सामना करना पड़ा जब कई बार  मेरे बातचीत के दौरान, सम्मेलनों में बाधा डालने के लिए  कुछ लोग खुद आये थे और इसी तरह की अन्य गतिविधियाँ,  हाँ, मेरी तरफ से बस इतना ही।

अनुबंध: इसीलिए, आपको एक बार फिर से बधाई! और मुझे उम्मीद है कि जल्द ही आपसे बात करने का मौका मिलेगा।

शार्लोत: बिल्कुल सही! मेरी भी यही राय है, धन्यवाद।


शार्लोत थोमा

 

शार्लोत थोमा एक राजनीतिक वैज्ञानिक (Sciences Po Paris – सियोंस पो पेरिस) और IRIS (Institut de relations internationales et stratégiques) में एशिया कार्यक्रम की सहयोगी हैं। उनका शोध कार्य भारतीय मुसलमानों, विशेष रूप से गुजरात और कश्मीर में, उन की सामाजिक-स्थानिक सक्रियता-गतिशीलता पर केंद्रित है। उनके डॉक्टरेट शोध प्रबंध पर आधारित उनकी पुस्तक, " नरसंहार और घेटो: समकालीन भारत में मुसलमान", २०१८ में प्रकाशित हुई (कार्थाला, IISMM श्रृंखला)।

उन्होंने सियोंस पो लिल और सियोंस पो पेरिस में राजनीति विज्ञान और शहरी अध्ययन पढ़ाया है, और IWM वियना में वह जूनियर विजिटिंग फेलो थीं। शार्लोत थोमा CERI - सियोंस पो में धार्मिक घटनाओं के वेधशाला (DGRIS-CERI-EPHE डीजीआरआई-सीईआरआई-ईपीएचई) और धर्म के अध्ययन के लिए Louis Massignon (लुई मैसिग्नन) चेयर के लिए पोस्टडॉक्टोरल शोधकर्ता भी रही हैं, और उन्होंने नोरिया अनुसंधान नेटवर्क के दक्षिण एशिया कार्यक्रम (SAProg - एसएप्रोग) का सह-नेतृत्व किया है, जिसके अंतर्गत उन्होंने दक्षिण एशिया वेधशाला (DGRIS-Noria डीजीआरआई-नोरिया) का निर्देशन किया।

 

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The Geopolitics of Railway - मराठी

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