इस भाग २ चर्चा में, मैं रेणुका
विश्वनाथन के साथ उनकी हाल ही में प्रकाशित किताब, "Bless This Mess" के
बारे में मै अपनी बातचीत जारी रखता हूं। रेणुका एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त IAS (Indian Administrative
Services) अधिकारी हैं और वह भारत के दिवंगत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
की यूपीए सरकार के तहत ग्रामीण विकास सचिव भी थीं।
इस सत्र की हमारी बातचीत के कुछ
मुख्य पैलू :
🔆 रेणुका के पिता और केरल के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of Kerala) को
कैसे एक मनमाने,
अनुचित और अनौपचारिक तरीके से उनके पद से हटा दिया गया था। साथ ही, हम वर्तमान समय
में भारतीय न्यायपालिका की स्थिति का आकलन करते हैं।
🔆 दुनिया के विभिन्न देशों की लोकतांत्रिक साख के अनुसार उनका
आकलन। जिसमें कार्यशील लोकतंत्र,
लगभग लोकतंत्र,
अलोकतांत्रिक देश और थोपें गए लोकतंत्र जैसी श्रेणियों शामिल है।
🔆 फ्रांस और यूरोपीय संघ में सबसे अच्छी और सबसे बुरी
लोकतांत्रिक प्रथाओं में से कुछ।
🔆 फ्रांसीसी प्रसार माध्यमों पर लगभग पूर्ण व्यावसायिक कब्जे की
स्थिति का वर्णन करने वाला एक रेखाचित्र।
🔆 दुनिया में धनतंत्र (pluotocracy) का खतरा और
पश्चिमी देशों में उसका सरकारी यंत्रणा पर धीरे-धीरे बढ़ता हुआ कब्जा।
🔆 हमारे समय में किताबें पढ़ने की प्रासंगिकता और महत्व।
🔆 अंत में,
जहां रेणुका ने अपनी अगली किताब के कुछ रहस्यों को खुलकर बताया...
टिप्पणी:
१)इस साक्षात्कार में दो भाषाओं में (फ़्रांसिसी और हिंदी) एक साथ उपशीर्षक उपलब्ध कराए गए हैं।
पता: https://www.youtube.com/watch?v=GJ8_uOLCOjo
२)इस साक्षात्कार को निम्नलिखित भाषाओं में एक लेख के रूप में पढ़ा जा सकता है: अंग्रेजी, फ़्रांसिसी, हिंदी, मलयालम और कन्नड़।
पता: https://thefrenchmasala.blogspot.com/2026/03/bless-this-mess-hindi_30.html
अनुबंध : नमस्ते! चूंकि यह साक्षात्कार हमारी अपेक्षा
से अधिक समय तक चला, खासकर हमने जिन सभी रोचक विषयों पर चर्चा की, उनके कारण... तो
रेणुका विश्वनाथन के साथ इस वार्तालाप का यह दूसरा भाग आपके लिए सादर है। इसका
आनंद लें!
आगे बढ़ते हुए, अब मैं भारतीय न्यायपालिका के विषय पर चर्चा
करना चाहूंगा। हालांकि, मैं वास्तव में चाहूंगा कि आप इस एक उदाहरण पर
अपना ध्यान केंद्रित करें जो आपकी किताब में वास्तव में एक हृदयस्पर्शी उदाहरण के
रूप में सामने आता है और वह है आपके पिता के बारे में किया हुआ वर्णन। आप के पिता
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे और फिर आगे जा के वे केरल के मुख्य न्यायाधीश भी
बने। वे अपने परिवार में पढ़ाई करने इतनी तरक्की करने वाले पहले व्यक्ति थे। वे
केरल की "एझवा" जाति से आते थे जो कि अत्यधिक हाशिए पर रखी गयी थी।
असल में हुआ ये था कि आप के पिता को अपने पद से, बिना किसी
औपचारिकता के, एक अपारदर्शी और एक अनुचित तरीके से हटा दिया गया था। और इस
मामले की जड़ तक जाना, इसके पीछे के सत्य की खोज करना, यह सब आपके लिए
बहुत मुश्किल था। इसमें एक तरह से आपको सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मुरलीधर
द्वारा भी मदद मिली थी। क्या आप कृपया हमें इस मामले के बारें में संक्षेप में बता
सकते हैं? इस मामले में असल
में क्या हुआ था?
रेणुका : मैंने इस मामले को किताब के न्यायपालिका अध्याय
में एक परिप्रेक्ष्य में, एक सीमित हद तक रखा है। मैं बस यह समझाना चाहती
थी कि न्यायपालिका वास्तव में... हम चाहे कुछ भी करें, यह कभी भी पूरी तरह से विधायिका या कार्यपालिका
से स्वतंत्र नहीं हो सकती है। और अगर हम इसके विपरीत मान लें,
तो यह गलत है। किसी भी
देश में यह संभव नहीं है और उस अर्थ में कोई भी पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं हो
सकता। यह एक समस्या है। मेरे पिता के मामले में यह हुआ था कि… और मैं यह बताना
चाहती थी कि हम सभी का यह मानना था कि महाभियोग ही एकमात्र उपाय है जिसके द्वारा
आप वास्तव में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को अपने पद
से हटा सकते है। मेरे पिता के मामले में जो हुआ है, वह यह है कि... विशुद्ध रूप से उनपर एक
प्रशासनिक कार्रवाई की गई, नाकि कोई संवैधानिक प्रावधान के आधार पर, ऐसा संवैधानिक
प्रावधान जो अपने बल पर बहोत ही सिमित छुट देता है। इसमें कहा गया है कि यदि कोई
व्यक्ति, यदि कोई उच्च
न्यायालय के न्यायाधीश या मुख्य न्यायाधीश, यदि उसकी आयु का निर्धारण करना हो… इसमें सिर्फ
एक पंक्ति है जो यह बताती है कि भारत के राष्ट्रपतिद्वारा न्यायाधीश की आयु का
निर्धारण हो सकता है। फिरसे, यह एक प्रशासनिक कार्रवाई है। यह न्यायिक
कार्रवाई नहीं है। और यह निश्चित रूप से महाभियोग नहीं है। यह ऐसा मंच नहीं है
जहाँ आपके साथ बर्ताव किया जायेगा, जिस तरह से सबसे छोटे अपराधी के साथ भी व्यवहार
किया जाता है, यानी, आपको औपचारिक रूप से एक अवसर मिलता है, जिससे कानूनी तौर
पर आप अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकें और अपनी बात रख सकते है और जहाँ संभवतः एक
निर्णायक समितिद्वारा या फिर आपके सह न्यायाधीशों के समूह द्वारा फैसला सुनाया जा
सके।
और यह सब संभव नहीं हो पाया, संविधान में प्रस्तुत इस एक पंक्ति की वजह से।
जब संविधान लिखा गया था, तब शायद किसी ने भी इस बारें में नहीं सोचा
होगा, कि कैसे इस तरह
के तरीकों से इस प्रावधान का दुरुपयोग किया जा सकता है। वैसे भारत में राष्ट्रपति
काफी हद तक एक नाममात्र के मुखिया हैं। हम जानते हैं कि राष्ट्रपति का चुनाव
प्रत्यक्ष रूप से नहीं होता है। वह नहीं है… वह केवल भारतीय गणराज्य के नाम के ही
प्रमुख हैं। असली शक्ति तो सरकार के पास है, मूलतः प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के पास।
तो, हम एक ऐसी स्थिति
में हो सकते है जिसमें लिया गया राजनीतिक निर्णय … खैर, आप जानते हैं कि अगर कोई व्यक्ति एक ऐसा
असुविधाजनक न्यायाधीश है जो वह नहीं कर रहा है, जो हम चाहते है कि वो करें और वह उस तरह के
फैसले नहीं दे रहा है जिससे निर्णयों में हेरफेर करना हमारे लिए आसान हो जाये।
अब मुझे और आप को इस बारे में बात करने की ज़रूरत नहीं है
कि पिछले ८ या १० वर्षों में (भारत में) क्या हुआ है। हम यह जानते हैं और शायद यही
कारण है कि आप मेरे द्वारा न्यायपालिका को ५ अंक दिए जाने से असहज हैं। और आपने
शायद न्यायपालिका को कम अंक दिए होते। यह एक महत्वपूर्ण बात है और इसलिए मैंने
न्यायपालिका को कुल मिलाकर ५ अंक दिए है... बेशक, मुझे खुद को सर्वोच्च न्यायालय और उच्च
न्यायालयों तक ही सीमित रखना चाहिए था क्योंकि वे ही न्याय अधिकार क्षेत्र को
मुख्यता से लागू करते हैं।
हालांकि, सच्चाई यह है कि वहाँ व्यवस्था में बड़ी संख्या
में न्यायाधीश... और यकीन मानिए, ऐसे बहुत सारे लोग हैं... ऐसे बहुत सारे
न्यायाधीश है, और निचले न्यायालयों में भी, जो ऐसे निर्णय दे रहे हैं जिनपर हमें बहुत फक्र
होना चाहिए। मेरा मतलब उन लोगों से है जो किसी मामले का वस्तुनिष्ठता से विश्लेषण
करके उसका सही समाधान निकालते है, जिन्हें आवाम सराहती है और जिन्हें देखकर कहती
है कि हाँ, हमें अब भी
न्यायपालिका पर भरोसा है। अब, मेरे पिता के मामले में ऐसा हुआ कि उन्हें
राष्ट्रपति की ओर से एक सुचना भेजी गयी। और हाँ, जिसका उन्होंने जवाब दिया था। हमें यह सारी
जानकारी सूचना के अधिकार (आरटीआई) के माध्यम से मिली और इसीलिए मैं आरटीआई के पक्ष
में हूँ क्योंकि आरटीआई लगभग उसी समय लागू हुआ था जिस वक्त मैंने नौकरी छोड़ी।
अनुबंध : माफ कीजिएगा, मै यहाँ बस एक बात जोड़ना चाहता हूँ… यह सब
उनके जन्म प्रमाण पत्र के बारे में था, है ना?
रेणुका : जी हां, यह उनके जन्म प्रमाण पत्र के बारे में था।
उन्होंने एक ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जहां उन्होंने कहा कि उन्होंने जो प्रस्तुत
किया था... और मैंने किताब में उनके जन्म प्रमाण पत्र की प्रति दे दी है। जहां
उन्होंने कहा था कि यह जन्म प्रमाण पत्र वैध्य नहीं था। दिलचस्प बात यह है कि मेरे
पिता के चयन के समय उन्होंने जो जन्मतिथि प्रस्तुत की थी उसे उन्होंने स्वीकार कर
सुसंगत माना था। मेरा मतलब है, अपने पूरे कॉलेज के दिनों के दौरान, और उनकी नियुक्ति
के दौरान उन्होंने उसी जन्मतिथि को बनाये रखा था और इसमें एक भी गलती नहीं हुई थी।
और आप उस दस्तावेज़ को देख सकते हैं और इस नतीजे पर पहुच सकते हैं कि इसके साथ कोई
छेड़छाड़ नहीं की गई है। हालांकि, यह जन्म प्रमाण पत्र नहीं है। भारत के साथ
समस्या यह है कि हमारें यहाँ कभी भी आधिकारिक जन्म प्रमाण पत्र जारी नहीं किया गया, उस अस्पतालद्वारा
जिस अस्पताल में आपका जन्म हुआ हो। क्योंकि अक्सर लोग अस्पताल में पैदा नहीं होते!
यहां तक कि मैं भी, उनसे कई साल बाद मेरा जन्म होने के बाद भी मेरे साथ ऐसे नहीं
हुआ। हालाँकि मेरा जन्म अस्पताल में हुआ था। मतलब, मेरा जन्म अस्पताल में हुआ था लेकिन मेरे पास
जन्म प्रमाण पत्र नहीं है। क्योंकि जन्म प्रमाण पत्र, एक कानूनी जन्म प्रमाण पत्र जारी करने की यह
औपचारिक प्रथा केवल १९९० के दशक में लागू हुई थी। इससे पहले यह मौजूद नहीं थी।
हममें से अधिकांश, बल्कि ९९% लोगों को कभी भी उनका जन्म प्रमाण पत्र नहीं
मिला।
इस मामले में एक प्रविष्टि (entry) थी। ग्राम अभिलेखों में प्रविष्टियों (entries) का एक पूरा सेट
मौजूद है जो बेहद भ्रामक या विरोधाभासी है। और फिर वे हमारे परिवार के किसी भी
वास्तविकता से बिल्कुल मेल नहीं खाते क्योंकि यह किसी ने, कहीं पर कुछ लिखा है... जहाँ उसी नाम का एक
दूसरा व्यक्ति था, लेकिन जिस का नाम किसीने एक कागज पर एक अलग जन्मतिथि के साथ, हाथ से दर्ज किया
था। और न्यायाधीश, न्यायपालिका, विधि पेशा, स्थापित कानून के तहत यह प्रमाण माना जाता था
कि दसवी की परीक्षा के संबंध में, आपके सहायता प्रमाण पत्र (leaving
certificate) में जो भी तारीख
आपके लिए दर्ज कि गयी थी उसे आपकी जन्मतिथि माना जाता था। और वही मैंने किताब में
प्रस्तुत कि है। और यही वह तारीख है जिसे मेरे पिता उनकी जन्म तारीख मानते थे। मैं
अपने पिता की कही बात से पूरी तरह सहमत हूँ। यह तारीख उसी जन्मतिथि से भी मेल खाती
है जिसे आज भी हम उन्हें याद कर के मनाते हैं। तो, यह तारीख हमारे परिवार के लिए उनके जन्मदिन कि
तारीख है। इस बारें में कभी हमें कोई संदेह नहीं था कि उनकी जन्मतिथि कुछ अलग थी।
और यह तारीख पूरी तरह से, बाकी सब से, जो भी तब तक हुआ
है, उनके अंतिम दिनों
तक सुसंगत है।
लेकिन किसी दस्तावेज़ में छोटी सी प्रविष्टि (entry) जिसे उन्होंने एक
ग्राम अभिलेख से निकाला था और कहा कि वही उनकी सही जन्मतिथि थी, बिना किसी प्रमाण
के और बिना मेरे पिता को अपनी बात अन्य न्यायाधीशों के समक्ष रखने का मौका दिए। और
ऐसा करना वास्तव में कानून के तहत आवश्यक था। कानून के तहत उन्हें ये मौका मिलना
जरुरी था। लेकिन इसका पालन नहीं किया गया। और एक सुबह, उन्हें एक टेलीग्राम मिलता है जिसमें यह लिखा
होता है कि, आज से आपको
सेवानिवृत्त किया जाता है। यह सिर्फ एक टेलीग्रामथा। उन्हें कोई लिखित आदेश भी
नहीं मिला। मेरा मतलब है कि सरकार का ऐसा कोई आदेश जिसमें यह बताया गया हो कि
राष्ट्रपति भवन के बारें में सारे दस्तावेज मुझे, जब मैंने आरटीआई याचिका दायर कि तो हासिल हुए
और इसमें मेरी मदद के लिए मैं वकील श्री. वेणु गोपाल, श्री. गोपाल शंकर नारायणन कि आभारी हूँ और
न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर कि जिन्होंने इस मामले का फैसला किया। उन्होंने
राष्ट्रपति भवन को ये सब दस्तावेज़ देने के लिए मजबूर किया। वे इसे रोक रहे थे
लेकिन कानून ने कहा कि यह आपको देना ही होगा। इसलिए उन्होंने इसे हमें दे दिया। और
अब मेरे पास सारे कागजात हैं। और वे दस्तावेज़ बहुत साफ साफ तरीके से दिखाते हैं
कि राष्ट्रपति को भी उस वक्त इस मामले में कुछ संशय था। यहां तक कि राष्ट्रपति भी
यही कह रहे थे, "सुनो, आप मुझे यह निर्णय लेने के लिए इतनी जल्दी
क्यों कर रहे हो?" मुझे वह दस्तावेज़ मिल गया है! उसमें यही लिखा
है। हालांकि, वहां कुछ न कुछ
जरूर हो रहा था।
मेरे पिता निश्चित रूप से उस तरह के व्यक्ति थे नहीं थे
जिन्होंने कभी भी किसी भी कार्यकारी अधिकारियों के निर्देशानुसार, उनके दबाव में
काम किया हों। तो यह एक कारण था… और दूसरी
वजह जो मैं कहना चाहूंगी वह यह है कि... और यह व्यापक रूप से माना जाता है, आप इस बारें में
किसी से भी पूछ सकते हैं, केरल और दिल्ली में उन लोगों से, जो कानूनी पेशे
से है और जो इस मामले की जानकारी रखते है। यह व्यापक रूप से माना जाता था कि वहाँ
निश्चित रूप से, इस पुरे मामले में एक जातिगत कारक की भूमिका थी। मैं सिर्फ
इतना ही कह सकती हूं। मुझे केवल वही पता है जो दूसरों ने मुझे बताया है, है ना?
अनुबंध : मुझे लगता है कि भारतीय राजनीति के अधिकांश
टिप्पणीकारों के लिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं होगी अगर यह किस्सा सच है। फिर
भी, मैं दर्शकों को
याद दिलाना चाहता हूँ कि आपके पिता का जन्म १९१५ में हुआ था,
है ना? हाँ। तो, कल्पना कीजिए कि
सरकार मांग कर रही थी उनके १९१५ में जारी
जन्म प्रमाण पत्र के लिए!
हम इसकी तुलना हालहिं में हुए नागरिकता अधिनियम संशोधन के
विरोधी प्रदर्शनों से भी कर सकते है, है ना? और इसमें हमने कठिनाइयां देखि है। इसलिए, यह मांग एक तरह
से काफी अव्यावहारिक या अनुचित है।
न्यायपालिका, अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों के बारे में मैं एक
और तुलना करना चाहता था और वह उदाहरण है पाकिस्तान का। जिस तरह राष्ट्रपति परवेज
मुशर्रफ को वहां के न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं द्वारा किये गए आंदोलनों के कारण
अपनी सत्ता छोड़नी पड़ी। तो, यह सब हमारे पड़ोसी देश में हुआ था।
अब अगला अध्याय बेहद दिलचस्प है। यह लोकतंत्र में महिलाओं
की भूमिका के बारे में है जिसके बारें में आपने चर्चा कि है। इसलिए, मैं एक बार फिर
कुछ मुख्य अंश पढ़ने का प्रस्ताव करता हूँ।
आपने कहा कि यह राजनेताओ के “नियत” का सवाल है। दरअसल, उनमें से अधिकांश
लोग इस मसले से अवगत हैं। महिलाओं की वास्तविक चिंताओं को वे समझते तो हैं, लेकिन फिर भी
उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता... वे एक तरह से उनके प्रति उदासीन हैं और यह
विभिन्न कारणों कि वजह से… आपने महिलाओं के मुख्य दिक्कतों के बारें में एक सूची
बनाई है।
इसमें पहला मसला "शारीरिक सुरक्षा और गरिमा" का
है। आपने घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न के मुद्दों को उजागर किया है। दूसरा यह है…
और इस संबंध में, आपने २००२ में “द सिटिजन” में एक लेख लिखा था: “हम महिलाओं
के खिलाफ हिंसा के बारे में अपने घरों में बात क्यों नहीं करते?” दूसरा है
"शिक्षा और स्वास्थ्य, उच्च निरक्षरता"। २०१० की जनगणना में कहा
गया था कि ३५% महिलाएं निरक्षर थी, जिसका मतलब है कि केवल ६५% ही साक्षर थी जबकि
पुरुषों का प्रतिशत ८१% था। इसके बाद उनमें मातृ मृत्यु दर भी अधिक है। महिलाओं
में कुपोषण की समस्या है।
आपने राजस्थान का उदाहरण भी दिया। उदाहरण के लिए, १९८७ में आप वहां
टोंग संसदीय निर्वाचन क्षेत्र की चुनाव पर्यवेक्षक थी। और आपने पाया कि अधिकांश
महिला मतदाता अपने नाम पर हस्ताक्षर नहीं कर सकती थी। आपके लिए यह एक चौंकाने वाली
बात थी। क्योंकि आप केरल से आती हों जहाँ महिला साक्षरता दर ९०% था जबकि कर्नाटक
में यह ६८% था।
आपने जो तीसरा मुद्दा उठाया वह "आय और आजीविका"
से संबंधित था। जैसे कई व्यवसाय जिसमें महिलाओं की उच्च भागीदारी है जैसे शिक्षक, बच्चों की देखभाल
करने वाली, स्वास्थ्यकर्मी, कचरा उठाने वाली, नर्सें... और
आपने कहा कि परिवारों का एक बड़ा अनुपात महिलाओं की आय पर निर्भर होता है और अभी
तक यह बात भारत में उतनी अच्छी तरह से समझी नहीं गयी है। चौथा है "सामाजिक
समानता"। तो, आपने परिवार और संपत्ति कानूनों के बारे में, उत्तराधिकार
संबंधी कानून के बारे में बात की,जो अक्सर भेदभावपूर्ण होते हैं। और इसमें
पितृसत्ता के कारण व्यावहारिक बाधाएं भी हैं।
आपने आम आदमी पार्टी (आप) के साथ महिलाओं से जुड़े
मुद्दोंपर राजनीतिक अनुभव के बारे में बात की। और आप वास्तव में उनसे खुश नहीं थी।
सत्ता में काफी समय तक रहने के बावजूद आम आदमी पार्टी में महिला नेताओं और
मंत्रियों की संख्या बहुत कम है। आप इस बात से निराश थी कि महिलाओं से जुड़े
मुद्दे पार्टी के घोषणापत्र में अंतिम समय में शामिल किये जाते थे, जिसका उद्देश्य
केवल महिला मतदाओंको लुभाना था लेकिन इसे किसी गंभीर इरादे से नहीं किया जाता था।
एक तरह से, यह केवल एक
प्रतीकात्मकता के लिए है। यह प्रतीकात्मकता का ही एक संकेत है। आपको यह जानकर
हैरानी हुई कि कई वरिष्ठ आप नेता आपके द्वारा "महिला सशक्तिकरण" इस
संज्ञा का प्रयोग करने पर आपत्ति जता रहे थे, जो कि आपके लिए दिल्ली में महिलाओं के लिए
मुफ्त बस पास का एक परिणामस्वरूप था। आपने कहा कि आप सरकार, जो महिला मतदाताओं के भारी समर्थन से सत्ता में
आयी थी, उसके बावजूद
उन्होंने सुरक्षा अधिकारियों के लिए और आश्रय स्थलों के लिए धनराशि बढ़ाने के लिए
और घरेलू हिंसा के इस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए कुछ नहीं किया जब की इससे
आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के लिए समानता और नौकरी की सुरक्षा प्रदान की जा
सकती थी। ये सब नीतिगत मुद्दे थे। इन्हें बिना किसी विवाद से,
आसानी से लागू किया जा
सकता था, लेकिन ऐसा नहीं
किया गया।
और आपने कहा कि जब बैंगलोर स्थित आप पार्टी कार्यालय में
आपने पहली बार प्रवेश किया, तो आप राज्य इकाई के प्रमुख के उस सुझाव से आप
चौंक गयी थी जब उन्होंने आपको बगल के कमरे में बैठक कर महिला विंग में शामिल हो कर
महिलाओं के मुद्दों पर विचार करने को कहाँ। यह कुछ वैसा ही है जैसे जब कोई महिलाएं
हमारे घरों में आती हैं तो उन्हें सीधा रसोईघर में भेज दिया जाता है! तो, ऐसा लगता है कि
वहां आपके साथ कुछ ऐसा ही हुआ।
और आपने कहा कि आप २०२० में कर्नाटक आप संगठन से अलग हो गयी
हालाँकि अभी भी आप उन्हें अपना मत देती हो, उनके लिए अभियान चलाती हों और एक स्वयंसेवक का
काम भी करती हों।
आपने “ट्रिपल तलाक” विधेयक की सराहना की जो आपके लिए
महिलाओं के कठिनाई को सीधे तरीके के साथ संबोधित करता है। आप वास्तव में राजनीति
में महिलाओं के लिए आरक्षण के पक्ष में नहीं हों, क्योंकि आपके अनुसार इसका नतीजा महिला मतदाताओं
द्वारा मांग की गई नीतियों के कार्यान्वयन में नहीं होगा।
और अंत में, आप जैसे एक स्वाभाविक आशावादी व्यक्ति के लिए
भी भारतीय महिलाओं का राजनीतिक भविष्य अंधकारमय प्रतीत होता है।
जी हाँ। अब आपकी बारी है।
रेणुका : मुझे लगता है कि आपने वास्तव में महिलाओंके इस अध्याय का
बहुत अच्छे से सारांश प्रस्तुत किया है।
और इन चारों बिंदुओं के संबंध में जिनमें महिलाओं की रुचि
होती है, मुझे पूरा यकीन
है, सौ प्रतिशत यकीन
है की आम आदमी पार्टी समेत सभी दलों के राजनेता, अन्य संगठन वगैरा इन सब मुद्दों से अच्छी तरह
अवगत हैं। क्योंकि आपको बस किसी एक अकेली महिला मतदाता से बात करनी चाहिए और आप
उससे वही प्रतिक्रिया पाओगे जो मैंने दी है और यही सभी महिलाएं चाहती हैं। यही वे
चीजें हैं जो वे चाहती हैं। मुझे वास्तव में इस बात से बहुत निराशा महसूस होती है
कि आम आदमी पार्टी यह सब आसानी से कर सकती थी... दिल्ली में काफी पैसा था और
उन्होंने इसका इस्तेमाल विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया भी। उन्होंने इसका
इस्तेमाल कुछ बेहतरीन योजनाओं के लिए किया।
उदाहरण के लिए, महिलाओं के लिए बस यात्रा। मुझे यह एक बेहतरीन
योजना लगी क्योंकि वास्तव में इससे महिलाएं कम लागत पर आय अर्जित कर सकी, इससे उनके खर्चों
की सूची से वास्तव में आवागमन लागत हट गयी। इससे घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओंको
उस हिंसा से बचने का एक तरीका भी प्रदान किया गया। और घरेलू हिंसा के संबंध में
मेरा मतलब केवल अपने जीवनसाथी से हो रही हिंसा से ही नहीं है,
हालाँकि उन सभी लोगों से
है जो घर की चारदीवारी के भीतर, घर के अंदर हिंसा कर रहे हैं। आपको नहीं पता कि
उन में से कौन इसे कर रहा है। इसलिए, यदि कई कामकाजी महिलाएं, जो पैसा कमा रही हैं और जो यह पाती है कि अपनी
कमाई पर उनका नियंत्रण नहीं है... यहाँ तक कि वो कभी-कभी पूरी तरह से कंगाल हो
जाती हैं... तो ऐसी स्थिति में, अगर उनके साथ हिंसा होती है तो उस हिंसा से
बचने के लिए वे मुफ्त बस पास के साथ वास्तव में दरवाजा खोलकर घर के बाहर निकल जा
सकती है। यह निश्चित रूप से एक एक बेहतरीन नीति थी।
हालाँकि, उन्होंने जो दूसरा काम किया उससे मैं बहुत
निराश हुई। और कर्नाटक सहित पूरे भारत में हर किसी ने इस निति को बाद में अपनाया।
हर किसी को यह पसंद आयी। यह मूल रूप से महिलाओं को बेमतलब का पैसा देने जैसा था।
वैसे, मुझे इस बेमतलब
का पैसा देने से सैद्धांतिक रूप से गहरी आपत्ति है। ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि मैं
विश्वास नहीं करती कि लोगों को किसी सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होती है।
महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता होती है। उन्हें यह मिलनी चाहिए। हालाँकि, राजनीतिक दलों का
पूरा मकसद यह होता है की ऐसा कुछ भी लागू न करे या फिर ऐसा कुछ ना करे जो महिलाओं
के हाथों में स्वायत्तता प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, महिलाओंको आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देना जिससे
वह सुरक्षित महसूस करे और अपना सिर ऊंचा करके चले, किसी भी अंधेरी गली में किसी का भी सामना करने
की स्थिति में हो, यह सब लोग देखना नहीं चाहते । कोई भी (राजनीतिक) दल इस बारे
में बात नहीं कर रहा है। वे इसे नहीं चाहते। और यह (प्रशिक्षण) काम करता है! जब
मैं धारवाड़ (कर्नाटक) में एक उपायुक्त रूप से काम करती थी तो मैंने खुद भी इस
निति को आजमाया था। और यह निश्चित रूप से काम करता है! यह उन चीजों में से एक थी
जो वे (आप) कर सकते थे। मैं उन चीजों के बारे में बात कर रही हूँ जो वे कर सकते थे
लेकिन जिन्हें उन्होंने नहीं किया। यह पहली बात थी।
दूसरी बात जो उन्होंने नहीं की, वह थी आश्रय स्थलों में, परामर्शदाताओं (counsellors)
के पास, घरेलू हिंसा से
सुरक्षा अधिनियम के संचालन में निवेश करना। और नाकि भारतीय दंड संहिता में, क्योंकि भारतीय
दंड संहिता सुधार से परें है। इस के बारें में हम कुछ नहीं कर सकते और घरेलू हिंसा
कि समस्या पूरी दुनिया में फैली हुई है। और वास्तव में पुलिस महिलाओं के रक्षक
नहीं हैं। हालाँकि जब आप घर के अंदर पीड़ित महिला के लिए मदद का रास्ता उपलब्ध
कराना चाहते है, जो अपने जीवन को स्वयं चलाने का आत्मविश्वास खो चुकी है, घरेलू हिंसा
संरक्षण अधिनियम के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध करके इसे हासिल किया जा सकता था और
इस के लिए आप के पास पैसा था और वे महिलाओंको मदद का रास्ता मुहैया करा सकते थे।
और आपको इसे आपके घोषणापत्र का सबसे पहला बिंदु बनाने की भी जरूरत नहीं थी। इस
तरीके से आप इस मसले को विवादास्पद होने से और आपके दल को महिलाओं और पुरुषों में
बंट जाने से बचा सकते थे। तो ठीक है, ऐसा मत कीजिये लेकिन फिर भी महिलाओं को राहत
मिल सके इस लिए पर्याप्त राशी का प्रबंध करें। ऐसा नहीं हुआ।
अब तीसरी बात, और इस बात से मुझे वाकई बहुत पीड़ा हुई है
क्योंकि ऐसे कम से कम तीन पेशे थे जिनका संचालन लगभग पूरी तरह से महिलाओं द्वारा
किया जाता है। इनमें से एक है "आंगनवाड़ी" यानी कि बाल देखभाल केंद्र जो
हर जगह, खास करके गांवों
में, पूरी तरह से
महिलाओं द्वारा संचालित, गरीब बच्चों के लिए निःशुल्क बाल देखभाल केंद्र
हैं। फिर वहाँ स्वास्थ्यकर्मी या आशा कार्यकर्ता होती हैं। मुझे लगता है कि यह
शायद असंवैधानिक है। ये पेशा (विशेष रूप से) महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। और फिर, ज़ाहिर है, आपके पास तीसरा
पेशा भी है जिसे आप और मैं बैंगलोर में देख चुके हैं। ये कूड़ा बीनने वाले लोग
हैं। कचरा उठाने वाली बहुत भारी संख्या में महिलाएं है और फिर हम नर्सेस और
शिक्षकों के बारें में न भूले जो कि अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
सीधे तौर पर ये तीनों समूह सरकारी संस्थानों द्वारा, स्थानीय निकायों
द्वारा नियंत्रित होते है… फिर भी ऐसा
क्यों है कि उन्हें उनके अधिकार दिलाने के लिए कुछ नहीं किया गया? क्योंकि उनकी
कमाई न के बराबर होती है और एक मामूली रकम उन्हें मिलती है... मैं आपको बता सकती
हूँ कि कोविड लॉकडाउन के दौरान, स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा,
बिना रुकावट के पूरे दिन
का काम किया जा रहा था। कूड़ा बीनने वाले हमेशा काम के लिए घर के बाहर, रस्तों पे थे और
उन्हें दो महीने, तीन महीने या कई बार छह महीने के बाद भुगतान किया जा रहा
था।! और यह १०० % (अवैध) है! इस बारे में कोई संदेह नहीं है। उन्हें जीवनयापन के
लिए पर्याप्त वेतन नहीं मिल रहा था। उन्हें सरकारी कर्मचारी बनाया जा सकता था। वे
ऐसा कर सकते थे। उन्हें एक स्थायी नौकरी के अंतर्गत मिलने वाली पूरी सुरक्षा
प्राप्त हो सकती थी, जैसे कि अपने जिंदगी में आगे बढ़ने का अवसर, चिकित्सा सहायता
प्राप्त करने का अवसर, बीमा का मौका...और बाकि सब कुछ। उन्हें यह
अधिकार के रूप में मिल सकता था और नाकि किसी सामाजिक सुरक्षा भुगतान के रूप में जो
आप दे रहे हैं। और आप उनसे इसके लिए आभारी होने की उम्मीद करते हैं? तो, मेरा मतलब यह है
कि वह सब कुछ जो महिलाओं को वास्तव में सशक्त बनाने के लिए किया जा सकता था, अपना सीर ऊँचा
करके, अपने पैरों पर
खड़े हो कर वह कह सकती थी कि हाँ, यह हमारा अधिकार है। लेकिन वह मौका उन्हें नहीं
दिया गया।
और अगर आप महिलाओं के मताधिकार के बारे में पूरे इतिहास को
देखें तो आपको जानकारी मिलेगी कि… हमने (भारत में) इसके लिए कोई लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि अन्य देशों
ने इसके लिए लड़ाई लड़ी, जिन महीलाओंने इसके लिए लड़ाई लड़ी, उन्होंने अपने
मतदान के अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी। क्योंकि वे अपने मत की ताकत पर समाज में उनके
खिलाफ मौजूद असमानताओं को वास्तव में बदलना चाहते थे। भारत में वह प्रक्रिया नहीं
हुई है।
और यही कारण है कि मैं इस बारें में निराशावादी हूँ। यह
मेरा निराशावादी अध्याय है।
अनुबंध : धन्यवाद।
और मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि आपने आम आदमी पार्टी
(आप) के बारे में जो अवलोकन किया है वह भारत में किसी भी अन्य राजनीतिक दल के लिए
कहाँ जा सकता है।
रेणुका : जी हां, बिल्कुल!
अनुबंध : और यह सिर्फ आप तक ही सीमित नहीं है।
रेणुका : आप सही कह रहे हैं।
अनुबंध : और आपने उनके शासन और अन्य पहलुओं के लिए आप की
प्रशंसा भी की है।
चूंकि हम आप के बारे में बात कर रहे हैं, इसलिए मुझे यह भी
स्पष्ट कर देना चाहिए कि मैं स्वयं २०१५ तक आप आंदोलन के शुरुआती दिनों में शामिल
था। हालांकि, इसके बाद मैंने
उनसे अपना संबंध तोड़ लिया और हम अलग हो गए। जबकि आप ने यह अनुबंध जारी रखा। इस
प्रकार, यह एक पहलू था।
अब, एक आखिरी मुद्दा है जो मुझे वास्तव में बेहद
जरुरी महसूस होता है, खास कर के भारतीय दर्शकों के दृष्टिकोण से
क्योंकि इस बारें में जानने का उन्हें ज्यादा मौका नहीं मिलता और इसलिए मैं इस बात
पर प्रकाश डालना चाहता हूं। और यह उस तुलना के बारे में है जो विश्व की विभिन्न
लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के साथ आपने की थी। और अब मैं अपनी स्क्रीन साझा करना
चाहता हूँ ताकि इसे उजागर किया जा सके।
ये वे अवलोकन हैं जो आपने किताब में किए हैं। हालाँकि मैंने इसमें एक ऐसी श्रेणी जोड़ी है जो आपकी किताब में मौजूद नहीं थी। यह मेरी तरफ से है। मैं आपको इस पर भी टिप्पणी करने के लिए आमंत्रित करता हूं। इसलिए, यहाँ हम विश्व के अलग अलग लोकतंत्रों के बारे में बात कर रहे हैं। आपने उन्हें कार्यशील लोकतंत्र, सिमित लोकतंत्र और पथभ्रष्ट या अलोकतांत्रिक समूहों में बाँटा है। कार्यशील या पूर्ण लोकतंत्रों की बात करें तो आपने उसमें पश्चिमी यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान को शामिल किया है। और आपने उल्लेख किया है कि स्विट्जरलैंड एक सबसे अधिक लोकतांत्रिक देश है जहां कार्यपालिका, संघीय परिषद बिना किसी नेता के एक सामूहिक निकाय है। सिमित लोकतांत्रिक देशों के उदाहरण में आपने तुर्की और सिंगापुर का जिक्र किया है और आप दावा करती हों कि वे लोकतंत्र और तानाशाही के कगार पर है। अब पथभ्रष्ट या अलोकतांत्रिक देश: इसमें आपने रूस, ईरान, हंगेरी, सऊदी अरब, चीन और ट्रंप युग के तहत अमेरिका को शामिल किया है। मैंने वहां एक नई श्रेणी जोड़ी है। यह जबरन थोपी गई लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के बारे में है। और इसके बारें में आपकी राय जानना चाहूंगा। क्योंकि हमें बताया गया था कि... जैसे कि हम जानते हैं कि अफगानिस्तान, इराक पर अमेरिका द्वारा हमला किया गया और वहाँ "लोकतंत्रों" को “स्थापित” किया गया। उस वक्त अफगानिस्तान में तालिबान के शासन के विपरती महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने का तर्क भी दिया गया था। आपको याद है ना?
हाल ही में बांग्लादेश में भी एक तरह का तख्तापलट हुआ था।
वहाँ अभी भी लोकतंत्र है, लेकिन साथ ही यह आरोप भी है कि यह सब संयुक्त
राज्य अमेरिका द्वारा रचा गया था। हमारे पास "अरब स्प्रिंग" का उदाहरण
भी है। और उनमें से कई देशों में भी यही आरोप लग रहे हैं कि इसके पीछे संयुक्त
राज्य अमेरिका का हाथ था जिससे ऐसी सरकारें स्थापित कि जाएँ जो अमरीका के प्रति
सहयोगात्मक रवैया अपनाएगी और इस तरह के अन्य कारणों के लिए … तो क्या आप इससे सहमत
हैं?
रेणुका : नहीं, नहीं, मैं वास्तव में इससे सहमत नहीं हूँ।
क्योंकि मैं पथभ्रष्ट या अलोकतांत्रिक देशों के सूची से
संयुक्त राज्य अमेरिका को अलग कर दूंगी। मैंने किताब में इस तरह की गणना या विभाजन
नहीं किया है। मैंने बस इतना ही कहा है कि मुझे लगता है कि किसी देश में लोकतंत्र
है या नहीं यह तय करने के लिए उन छह मुद्दों को ध्यान में लेना होगा। और मैंने इसे
"लोकतंत्र के लिए पहचान मापदंड" का नाम दिया।
मै तो कहती हूँ कि प्रत्येक देश या प्रत्येक देश के नागरिक
ने शायद एक साथ बैठकर इस बात कि जाँच करनी चाहिए कि उनका देश एक लोकतंत्र है या
नहीं। या फिर वे कौनसी स्थिति में हैं। और मैं निश्चित रूप से अमेरिका को एक
कार्यशील लोकतंत्र के रूप में पहले स्थान पर रखूंगी। यह यक़ीनन एक कार्यशील
लोकतंत्र है। आखिरकार, भारत भी निश्चित रूप से उसी सूची में है… इसलिए
मैं भारत को भी कार्यशील लोकतंत्रों में शामिल करुँगी। अभी भी वह उसी स्थान पर
मौजूद है, यह अभी भी एक
लोकतंत्र है। इसके पीछे विभिन्न कारण है और मैंने भारत का परीक्षण मेरे छह
मानदंडों के आधार पर किया है। इसलिए, मैं निश्चित रूप से अमेरिका को उस श्रेणी में
रखूंगी।
सभी लोकतंत्रों में विभिन्न प्रकार कि समस्याएं हैं क्योंकि
उनमें से कोई भी, वास्तव में बहुमत के शासन को लागू करने में सफ़ल नहीं है। और
यही मेरे शोध प्रबंध का विषय था। दूसरी छोर पर मुझे अफगानिस्तान, इराक और
बांग्लादेश वगैरे देशों से कोई मतलब नहीं है। और मैं अरब स्प्रिंग को बस एक ऐसी
घटना मानती हूँ जो अपने वादों पर खरी नहीं उतरी। इसलिए, मैं कहूंगी कि सूची के दूसरे छोर पर निश्चित
रूप से वे देश हैं जो लोकतांत्रिक नहीं हैं। और मैं स्पष्ट रूप से कहूंगी कि इसमें
शामिल है ऐसे देश जिन्होंने अभी तक कुछ ऐसा कहा तक नहीं है कि वे लोकतांत्रिक देश
बनना चाहते हैं, उदाहरण के लिए चीन। वह तो ऐसा कहते भी नहीं है कि वह एक
लोकतंत्र बनना चाहता है। । और फिर इसमें मध्य पूर्वी राजतंत्र, जहाँ राजशाही
व्यवस्थाएं हैं, वे भी शामिल है। उनमें से किसी में भी लोकतंत्र नहीं है। वे
लोकतंत्र नहीं बनना चाहते। उन्होंने लोकतंत्र होने का दिखावा तक नहीं किया है।
और फिर आपके पास है... वैसे, मैं हंगरी के बारे में कोई टिप्पणी नहीं कर रही
हूँ क्योंकि मुझे इसके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है। मेरा मतलब है, किस तरह से उसका
मेरे छह मापदंडों के आधार पर परिक्षण किया जाएँ। मैं उस विषय की विशेषज्ञ नहीं
हूं। इसलिए, मैं वास्तव में
उसके बारें में कुछ नहीं कह सकती। तुर्की एक नाजुक मोड़ पर है, इसलिए मैं इसे
सिमित लोकतंत्र में रखूंगी। सिंगापुर के बारे में मुझे एक समस्या है। मैं इसे
पूर्ण या कार्यशील लोकतंत्र कि सूची में नहीं शामिल करुँगी। नहीं, यह निश्चित रूप
से कहीं न कहीं सिमित लोकतंत्र की सूची में है और संभवतः इसपर हमें कोई निर्णय
लेना होगा। और रूस स्पष्ट रूप से... हालांकि इसका अपना संविधान है, लेकिन फिर भी यह
लोकतंत्र नहीं है। इसलिए, मैं निश्चित रूप से इस सूची को बदल दूंगी।
और मुझे आपका यह "जबरन लोकतंत्र" बिल्कुल समझ में
नहीं आता क्योंकि मैंने अभी तक इसकी अवधारणा नहीं बनाई है। आपने शायद इसके बारें
में सोचा है और आप शायद जबरन लोकतंत्र के लिए एक अलग अवधारणा से प्रेरित हो। तो, अफगानिस्तान और
इराक और निश्चित रूप से, जैसा कि मैंने कहा, अरब स्प्रिंग यह महज एक घटना है जो घटित हुई।
यह घटना एक आशाजनक घटना थी लेकिन यह नाकाम हुई या फिर असफ़ल रही जैसे कि हम देख
सकते हैं ट्यूनीशिया, मिस्र जैसे कई देशों में और इसी तरह उन सभी
जगहों पर जहां इसका प्रभाव महसूस किया गया। बांग्लादेश के बारे में मैं असमंजस में
हूँ। मुझे सच में नहीं पता कि वहां क्या हो रहा है। हम जानते हैं कि वहाँ तख्ता
पलट हुआ हैं और आप इसके बारें में बहुत सारी अलग अलग कहानियाँ सुनते हैं। इन कथाओं
को प्रेरित करने वाला कारक क्या है इसके बारें में भी सोचना होगा... इसके बारे में
प्रयाप्त जानकारी के बिना इस बारें में कोई निश्चित भूमिका लेने में मुझे घबराहट
महसूस होती है। कुछ लोग कहते हैं कि इस सब के पीछे अमेरिकी है जो लोगोंको विशेष
तरीकों से प्रदर्शन करने के लिए मजबूर कर रहा है। और आप जानते हैं कि मुहम्मद
यूनुस एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने बहुत अच्छा काम किया है और उनकी एक खास
प्रतिष्ठा है। इसलिए मुझे... मुझे सच में नहीं पता, इसलिए मैं इस मामले में चिंतिति हूँ।
लेकिन अंत में एक बहुत ही अच्छी बात पर रुकना है तो, वह है श्रीलंका
के बारे में। श्रीलंका एक ऐसी जगह है जहाँ मुझे महसूस हुआ कि हम जो सोच रहे थे
उसके विपरीत हुआ है… मैं इसके प्रति बहुत उत्सुक थी और सोच रही थी कि वहाँ अब क्या
होगा... हालाँकि, वे उन हिंसक विरोध प्रदर्शनों के दुष्टचक्र से बाहर आ गए।
उन्होंने गंभीरता से, एक साथ बैठकर, एक नए सिरे से अपना संविधान लिखना शुरू किया, समस्या पर समाधान
निकाला और एक ऐसी सरकार का गठन किया जिसके बारे में अब हमें ज्यादा कुछ सुनने को
नहीं मिल रहा है। जब तक हमें कुछ सुनाई नहीं देता, इसका मतलब यह खुशहाली की,
अच्छी खबर हो सकती है!
इसलिए, श्रीलंका की
स्थिति मुझे अच्छा महसूस कराती है।
अनुबंध : धन्यवाद।
मुझे खेद है कि इस सूची में कुछ सुधार की आवश्यकता है। मुझे
उनपर ध्यान देना चाहिए था। खैर, कोई बात नहीं क्योंकि मैंने आपकी किताब से
जानकारी संकलित करने का प्रयास किया। और किताब में इसे इस तरह से प्रस्तुत नहीं
किया गया था। फिर भी, मेरा मकसद इस चर्चा को आगे बढ़ाना है और मुझे
खुशी है कि आपने इसे इसी भावना से स्वीकार कर लिया।
अब, जैसा कि हम दुनिया के विभिन्न कोनों में
बसे इन लोकतंत्रों के बारे में बात कर रहे
हैं और चूंकि मैं पिछले लगभग १० वर्षों से फ्रांस में रह रहा हूँ, तो मुझे यहाँ कि
लोकतांत्रिक पद्धतियों कि तुलना करने का और उनका अनुभव करने का भी मौका मिला है।
और यह खास करे के मेरे भारतीय दर्शकों के लिए, मैं अपने कुछ अवलोकनों को उजागर करना चाहूंगा, और और चूंकि आप
भी फ्रांस में रह चुकी हों, तो आप शायद उन्हें आसानी से समझ सकती हों। सबसे
पहले सकारात्मक बातों, सर्वोत्तम प्रथाओं के बारे में और फिर मैं
लोकतंत्र में कुछ मुश्किलों के बारे में भी चर्चा करूंगा। फ्रांस में चुनाव के लिए
धनराशि का प्रावधान है। यहाँ सरकार ही इस बात का ध्यान रखती है कि कैसे राजनीतिक
दलों को चुनाव के लिए धनराशि मिलती है। मतलब, बेशक, उसमें भी कुछ समस्याएं हैं लेकिन भरोसा करने
लायक कुछ ढांचा तो है। तो यह एक बिंदु है।
मुझे जो बात वाकई दिलचस्प लगी वह यह थी कि कि प्रत्येक
राजनैतिक दल का चुनावी घोषणापत्र स्थानीय नगरपालिकाओं द्वारा वितरित किया जाता है।
इसमें वे ऐसा करते है कि वे हर दल से अपने घोषणापत्र को एक पन्ने पर छपवाने को
कहते हैं और फिर उसे एक लिफाफे में डाल देते हैं। मतलब राजनैतिक दल का घोषणापत्र
लिफाफे के अंदर रखा जाता है और फिर इसे शहर के प्रत्येक निवासी मतदाता के घर भेजा
जाता है। इस तरह आपको चुनाव विज्ञापन हर जगह बिखरे नहीं दिखेंगे। और प्रत्येक दल
को सार्वजनिक धन से मतदाताओं से संवाद करने के लिए एक मौका मिलता है। फिर, जब मैंने पहली
बार फ्रांस में अपना मतदान किया तो मुझे सचमुच बहुत हैरानी हुई। यहां अभी भी
मतपत्रद्वारा मतदान प्रणाली प्रचलित है। और मतगणना नागरिकों द्वारा की जाती है!
यहाँ कोई चुनाव आयोग नहीं है। यहां न तो पुलिस है, न ही सैन्य गश्त। और फिर,
जब लोग मतदान करने आते है
तो कभी-कभी उनसे पूंछा जाता हैं, क्या आप रुक सकते है और मत गिनती में हमारी मदद
कर सकते है? तो वास्तव में यह
लोकतंत्र की सच्ची भावना है जहाँ नागरिकों को सक्रिय भागीदारी के लिए आमंत्रित
किया जाता है।
वैसे मैंने आपसे स्कैंडिनेवियाई देशों के उदाहरण के बारे
में भी बात की थी। वहां, लोगों को अपने कर घोषणापत्र में एक सूची दि
जाती है जिसमें वे उनके कर का पैसा कहाँ खर्च किया जाना चाहिए इसके लिए अपनी
प्राथमिकताएं बता सकें। जैसे चाहे वह शिक्षा हो, रक्षा हो, जन स्वास्थ्य हो, इत्यादि। और जो भी सरकार सत्ता में हो, व्यापक रूप से
उन्हें उन सार्वजनिक इच्छाओं का सम्मान करने के लिए बाधित किया जाता है। मुझे यह
बात बेहद अनोखी लगती है।
अब, कुछ यहाँ कि समस्याएं हैं और यह महत्वपूर्ण है।
इनके बारे में भी बात करना जरूरी है क्योंकि भारत में बहुत से लोग पश्चिम में
कार्यरत लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ और लोकतांत्रिक प्रथाओं की ओर एक अच्छे उदाहरण के
रूप में देखते हैं और हमें उनकी कमजोरियों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। तो, फ्रांस में...
क्योंकि आपने किताब में जनमत संग्रहों (referendum) के बारे में और खास कर के ब्रेक्सिट (Brexit) जनमत संग्रह के
बारे में बात कि है, मुझे लगता है कि यह भी प्रासंगिक होगा कि हम फ्रांस में
२००५ में हुए जनमत संग्रह के बारे में बात करें। यह जनमत संग्रह यूरोपीय संघ के
संविधान के बारे में था जिसे सदस्य देशों द्वारा अपनाया जाना था। और फ्रांसीसी
नागरिकों ने, साथ ही डच नागरिकों
ने "नहीं" के पक्ष में मतदान किया। दुर्भाग्यवश, दो साल बाद, २००७ में, (राष्ट्रपति) निकोला सारकोजी (Nicolas SARKOZY) के अधीन लिस्बन
की संधि पर हस्ताक्षर किए गए और इस प्रकार पिछले दरवाजे से यह संविधान पुरे
उरोपियन यूनियन के आवाम पर थोपा गया। इसलिए, यह वास्तव में जनता के निर्णय का उल्लंघन था।
इसके अलावा, फ्रांसीसी विधानसभा में पारित होने वाले लगभग
८० % कानून अब यूरोपीय संघ के निर्देशों से प्रेरणा लेते है। इसका मतलब है कि उनके
पास अब कोई संप्रभुता नहीं बची है। वे बस वही लागू कर रहे हैं जिसके बारें में
यूरोपीय संघ (ईयू) में पहले से निर्णय लिया गया है। और हम बाद में यूरोपीय संघ के
साथ जुड़ी समस्याओं पर भी चर्चा करेंगे।
इसके अलावा, फ्रांसीसी सरकार के खिलाफ हिंसा के कुछ बेहद
गंभीर आरोप लगे है। उदाहरण के लिए, विशेष रूप से उन्होंने, हम जिन्हें "पीली जैकेट वाले" (Gilets Jaunes) के नाम से जानते
हैं, उन विरोध
प्रदर्शनों को कैसे संभाला इस पर एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty
International) और यूरोपीय संघ
की मानवाधिकार संस्था और अन्य संस्थाओं ने उनकी कड़ी आलोचना कि हैं।
हम यह भी जानते हैं कि हालिया में हुए पेंशन सुधार के कायदे
के खिलाफ लाखों फ्रांसीसी लोग सड़कों पर उतर आये थे। लेकिन फिर भी उनकी मांगें
स्वीकार नहीं की गईं। हालांकि, जब भी व्लादिमीर झेलेंस्की (Vladimir ZELENSKY) फ्रांस आते हैं, उन्हें अक्सर
अरबों यूरो के चेक मिलते हैं, संसद में बिना किसी चर्चा के, बिना किसी अनुमोदन
के। इस प्रकार, यह विरोधाभास मौजूद है।
वैसे फ्रांसीसी सरकार खोजी पत्रकारों के खिलाफ भी काफी सख्त
है, विशेषकर तब, जब राज्य का कोई
हित जांच के दायरे में हों। यह सब फ्रांस के बारे में था।
अब यूरोपीय संघ के बारे में बात करते है। और फिर, यदि आपके पास कोई
टिप्पणी हो तो मैं आपको आमंत्रित करूंगा। यूरोपीय संघ की संसद काफी हद तक शक्तिहीन
है। उदाहरण के लिए, यह संसद स्वयं कोई नया कानून प्रस्तावित नहीं कर सकती। यह
केवल यूरोपीयन आयोग या यूरोपीयन परिषदद्वारा प्रस्तावित कानून पर ही मतदान कर सकती
है। उर्सुला वॉन डेर लेयेन (Ursula VON DER LEYEN), जो यूरोपीय संघ कि "मनोनीत" (nominated) राष्ट्रपति
हैं... वह कोई निर्वाचित राष्ट्रपति नहीं हैं। वह मनोनीत राष्ट्रपति हैं। इसलिए, वहां भी एक
समस्या है।
वैसे, इससे पहले वह जर्मनी की रक्षा मंत्री थीं और
उनके कार्यकाल के दौरान वहाँ उनपे भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लगे थे। और फिर भी
उन्हें यूरोपीय संघ के अध्यक्ष के रूप में "चुना" गया। फिर कोविड काल के
दौरान उन पर आरोप लगे थे कि उन्होंने अरबों यूरो के लेन-देन वाले अनुबंधों पर महज
एसएमएस के जरिए हस्ताक्षर किए, सभी प्रक्रियाओं और मानदंडों को दरकिनार करते
हुए। उन पर निरंकुश होने का भी आरोप है। उदाहरण के लिए, जब उन्होंने पूरे यूरोपीय संघ के क्षेत्र में
रशिया टुडे और स्पुतनिक चैनल पर प्रतिबंध लगा दिया, गलत सूचना फैलाने का आरोप लगा कर। हालांकि, इन चैनलों को
अपने बचाव में कानूनी मदद का कोई अवसर नहीं मिला। और यह फ़रमान पूरी तरह
अलोकतांत्रिक था। और उसी समय, बीबीसी, सीएनएन और अन्य पश्चिमी चैनल मॉस्को में देखे
जा सकते थे। हालांकि रूस कोई "लोकतांत्रिक " देश नहीं है। इस प्रकार, यह विरोधाभास
मौजूद है। बेशक, अब रूस ने भी यह प्रसारण रोक दिया है।
फिर, यूरोपीय संघ परिषद के सदस्य जिनमें प्रत्येक
सदस्य राष्ट्र का एक, ऐसे २७ सदस्य हैं, वे सभी निर्वाचित नहीं होते हैं। वे अधिकतर
मनोनीत होते हैं। और उनके पास पूरे यूरोपीय संघ के बारे में निर्णय लेने के लिए
अपार शक्तियां होती हैं। इसके अलावा, यूरोपीय संघ में लॉबिंग करना एक आधिकारिक
प्रक्रिया है। इसलिए, यह नैतिकता नहीं है, यह नीतिशास्त्र या सिद्धांत नहीं है, यहाँ पैसा ही सब
कुछ तय करता है। इन बातों को हम "लोकतंत्र की कमी" के अंतर्गत रख सकते
हैं। यदि इस संबंध में आपकी कोई टिप्पणी हो तो कृपया बताएं।
रेणुका : जी हाँ, बिल्कुल। मुझे लगता है कि आपने वास्तव में
यूरोप में जो कुछ हो रहा है, अच्छे और बुरे
पहलुओं के बारे में, उसका बहुत अच्छा परिप्रेक्ष्य दिया है।
बेशक, हर देश, हर लोकतंत्र में चुनौतियाँ हैं और मुझे बहुत
खुशी है कि फ्रांस में “मानवाधिकार” के सकल्प का जन्म हुआ। यह वास्तव में लोकतंत्र
का घर है, हालांकि इसमें कई
हिंसक क्रांतियां हुई थीं, इससे पहले कि यह उस मुकाम पर पहुँचता जहाँ यह
पहुँचा है। और वे सभी शानदार कल्पनाएँ है जिन्हें उन्होंने अपनाया है। लोगों की
भागीदारी सहित सब कुछ। अब, धनिकतंत्र (plutocracy) के खिलाफ जो लड़ाई है मुझे लगता है कि यह बहुत
महत्वपूर्ण है। मैंने अपनी किताब में विशेष रूप से यही कहा है कि मैंने धनिकतंत्र
के मुद्दे पर कुछ टिप्पणियाँ नहीं दी है। लेकिन मैं मानती हूं कि यह कई देशों के
लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। यह निश्चित रूप से एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है। और
मुझे बहुत खुशी है कि आपने इसका जिक्र किया और शायद मुझे और अधिक छानबीन करनी
चाहिए कि चुनावों के लिए सार्वजनिक धन की व्यवस्था कैसे की जा सकती है। यह निश्चित
रूप से एक प्राथमिकता है।
साथ ही, क्योंकि हमारे पास चुनावी बांड की समस्या भी है
जो काफी लंबे समय से चली आ रही है। इसलिए, यह बहुत मुश्किल है। फिर आप जो एक-दो अन्य
बातें कह रहे हैं... मुझे लगता है कि उसमें सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा जो बहुत से
लोगों के लिए है, दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में लोग जिन चुनौतियों का
सामना कर रहे हैं, उनको यह सवाल है कि आप आपके सरकार की विदेश नीति को कैसे
प्रभावित करते हैं। ऐसा लगता है कि किसी तरह से यह लोकतांत्रिक नियंत्रण से बच
निकलता है। और इसका मतलब यह है कि, अगर मुझे युद्ध लड़ना ही पड़ेगा तो क्या मैं
युद्ध लड़ने से पहले जनता की स्वीकृति प्राप्त कर सकता हूँ? हालांकि, हमें अच्छी तरह से पता है कि वियतनाम युद्ध के
दौरान क्या हुआ था। ईरान-इराक युद्ध के दौरान क्या हुआ ये भी हमें मालूम है। और
किसी भी देश में ऐसी स्थिति नहीं है कि जहाँ लोगों को इस बात का भरोसा है कि उनके
चुने हुए प्रतिनिधि, उनकी तथाकथित निर्वाचित सरकार, उनकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए विदेश नीति
तय करती है। और यह लोकतंत्र में एक बहुत बड़ा मुद्दा है, जो मुझे लगता है कि... मुझे उम्मीद है कि कोई
इस बारे में लिखेगा कि कैसे लोगोंको किसी सरकार की विदेश नीति को नियंत्रित करना
संभव है। क्योंकि संविधानों में जो कुछ भी है, वह लगभग सभी लोकतंत्रों में कारगर नहीं होता।
यह वाकई एक समस्या है। हम देख सकते हैं कि अमेरिका में क्या हो रहा है जहां दोनों
प्रमुख दलोंके लोग हैं जो फिलिस्तीनियों और इज़राइल के लिए भी आवाज उठा रहे हैं।
तो फिर कैसे सरकार को प्रभावित किया जाए जब वह अपनी विदेश नीति बनाता है? यह एक बहुत बड़ा
मुद्दा है।
अब, आपने यूरोपीय संघ के सदस्य देश और स्वयं
यूरोपीय संघ के बिच के संबंधो के बारें में बात उठाई है। मुझे पता है कि ब्रेक्सिट
(Brexit) शब्द बहुत ही
विवादास्पद है। बहुत से लोगों के मन में यह एक बुरा शब्द है। हालाँकि, एक बड़ी समस्या
यह है कि... ब्रेक्सिट में ठीक यही बात थी, कि हम उनके आदेश को क्यों सुन रहे हैं, जो कि एक बाह्य
निकाय है और जिसके पास लोकतांत्रिक साख
नहीं है? खासकर तब जब हमने
अपनी सरकार का चुनाव कर लिया है और इसलिए हमारी सरकार के पास उन मुद्दों को हल
करने के लिए ताकत होनी चाहिए । ज़ाहिर है, फ्रांस और जर्मनी के बारे में तो मैं सोच भी
नहीं सकती कि इनमें से कोई एक यूरोपीय संघ से बाहर निकलना चाहें। मेरा मतलब है, क्या वे सचमुच कह
रहे हैं कि हमें यूरोपीय संघ नहीं चाहिए? क्योंकि अगर ऐसा है तो तब यूरोपीय संघ का अंत
हो जाएगा। क्योंकि वे यूरोपीय संघ का केंद्रीय हिस्सा थे। इसलिए, अन्य देश यूरोपीय
संघ से बाहर निकलने के बारे में सोच सकते है, लेकिन फ्रांस और जर्मनी नहीं। फ्रांसीसी और
जर्मन ऐसा नहीं कर सकते... खैर, ऐसा नहीं है कि इन देशों में यूरोपीय संघ के
प्रति शत्रुतापूर्ण भावना नहीं है। यह निश्चित रूप से मौजूद है।
और जनमत संग्रह के संबंध में, आपने जो बात कही है वह बहुत ही दिलचस्प है
क्योंकि मैंने बार-बार इसका जिक्र मेरी किताब में किया है। तो ऐसा ही है कि जब लोग
जनमत संग्रह के आधार पर निर्णय लेते हैं, और जिसे ईमानदारी से कार्यान्वित किया गया हो, तो फिर भले उसमें
किसी की जित सिर्फ एक वोट से ही क्यों ना हों, उन्हें विजेता
घोषित कर दिया जाता है। मेरा मतलब है, आप जानते हैं कि कितने कम बहुमत से क्यूबेक का
कनाडाई संघ से अलग न होने का निर्णय लिया गया था। यह बेहद करीबी बहुमत था।
स्कॉटलैंड का ब्रिटेन के साथ रहने का फैसला कोई बहुत बड़े बहुमत से नहीं लिया गया
था। इसलिए, यह एक बड़ा बहुमत
नहीं है। लेकिन फिर भी यह बहुमत है। अब, अगर आप जनमत संग्रह का सम्मान नहीं करते हैं तो
आप लोकतांत्रिक नहीं हैं। बस इतना ही। बात इतनी ही सरल है। जनमत संग्रह में लिया
गया फैसला, चाहे आपको पसंद
हो या न हो, आपको इस निर्णय
को लागू करना ही होगा क्योंकि लोकतंत्र हमें ऐसा करने के लिए मजबूर करता है। हम
ब्रिटेन में जो हो रहा है उस पर गौर कर सकते हैं। ब्रेक्सिट में क्या हुआ उसे बाजू
में रखने की बात हो रही हैं और धीरे-धीरे यूरोपीय संघ में वापस आने के लिए
प्रयासरत विभिन्न विधियों या तरीकों का इस्तमाल किया जा रहा है। लेकिन मसला यह है
कि अगर आप जनमत संग्रह का सम्मान नहीं करते है और कहते हैं कि हम इस बात के लिए
तैयार होने का इंतजार करेंगे और फिर इस पर विचार करेंगे, तो यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। यह
लोकतांत्रिक नहीं है। इसलिए, यदि ऐसा हो रहा है और अगर आपकी बात सही है, तो हाँ, मुझे लगता है कि
यह बहुत गंभीर मामला है।
मेरा मानना है कि यूरोपीय संघ और उसके सदस्य देशों के बीच
कुछ तनाव है। और समय के साथ इसमें और भी वृद्धि होने वाली है। आपको पूरी तरह से एक
अलग संगठन, एक अलग संधि
बनानी पड़ सकती है जो आम हितों का ख्याल रख सके। एक संप्रभु देश का एक संघीय ढांचे
में शामिल होने का कोई स्वाभाविक मार्ग नहीं हो सकता। आप उस आसान रस्ते से नहीं
जाओगे जिस तरह से लोग शायद कल्पना कर रहे हैं।
अनुबंध : इन महत्वपूर्ण टिप्पणियों के लिए आपका धन्यवाद।
जनमत संग्रह के बारे में मेरी एक संक्षिप्त टिप्पणी है।
उदाहरण के लिए स्विट्जरलैंड में, जिसे आपने एक महत्वपूर्ण लोकतंत्र, एक कार्यशील
लोकतंत्र से नवाज़ा है। कभी-कभी वे कुछ बहुत ही मामूली मुद्दों पर भी जनमत संग्रह
कराते हैं। उदाहरण के लिए, “क्या मस्जिदों पर मीनार होनी चाहिए?” मेरे लिए, यह उस तरह का
सवाल नहीं है जो लोगों से पूछा जाना चाहिए। जैसे भारत में यह प्रश्न पूछने के समान
होगा कि “क्या राम मंदिर होना चाहिए?” फिर वे यह भी पूछते हैं,
“स्विट्जरलैंड में विदेशी
अप्रवासियों का प्रतिशत कितना होना चाहिए? हर साल स्विट्जरलैंड में कितनोंको स्वीकार किया
जाना चाहिए?” इसलिए, एक बहस चल रही है
कि ऐसे प्रश्न पूछे जाने चाहिए या नहीं।
खैर, एक और उदाहरण है। यूरोपीय संघ पर हाल ही में
आयोजित रोमानिया के राष्ट्रपति चुनाव के साथ हस्तक्षेप करने का भी आरोप है, खास कर उस वक्त
जब ऐसा उम्मीदवार पहला विकल्प बनके सामने आया जो यूरोपीय संघ का पसंदीदा नहीं था।
यहां तक कि फ्रांस का संस्थान... आप इसे कैसे कहेंगे? जो कि भारत में अनुसंधान एवं विश्लेषण शाखा (RAW-आरएडब्ल्यू) से
समकक्ष है... हा... फ्रांसीसी खुफिया सेवा पर भी यह आरोप लगाया गया है कि उन्होंने
भी रोमानिया के इन चुनावों में कुछ हस्तक्षेप किया है। इस प्रकार, कई मुद्दे हैं।
अब आगे बढ़ते हैं। यह बातचीत लम्बी खिंच रही है लेकिन मुझे
लगता है कि इस मसले पर चर्चा करना महत्वपूर्ण है।
मैं फ्रांस में प्रसारमाध्यमों की स्थिति का एक संक्षिप्त
अवलोकन देना चाहूंगा। और शायद भारत में भी कुछ ऐसा ही करें इसलिए यह उदहारण एक
प्रेरणा बन सकता है। ये सभी फ्रांस के प्रसार माध्यम हैं। और यहाँ एक "ले
मोंद दिप्लोमैटिक" (Le Monde Diplomatique) अख़बार है जो वास्तव में "ले मोंद" से
अलग है। यह एक अलग अखबार है। यह अख़बार मुख्य रूप से पाठकों की सदस्यता के माध्यम
से काम करता है। और यह काफी हद तक स्वतंत्र है, इस अर्थ में कि "ले मोंद
दिप्लोमैटिक" की पत्रकारिता में और मुख्यधारा के प्रसार माध्यमो में आपको
स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
भारत में कई लोगों को शायद यह जानकर आश्चर्य हो सकता है
लेकिन फ्रांस में ९५% से ९८% प्रसारमाध्यम, फिर चाहे वह अख़बार, लेख पत्रिका हो या टेलीविजन, चाहे वह
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो, यह सब बड़े उद्योगपतियों के हाथों में है। तो, आपके पास बर्नार्
आरनो (Bernard ARNAUD) हैं।
यहां आपको उद्योगपतियों के नाम दिखाई देंगे और उनकी संपत्ति
के आधार पर उनका अनुक्रम। इसलिए, यहाँ प्रमुख नाम ये हैं: बर्नार् आरनो (Bernard ARNAUD), व्ह्यन्सों
बोलोरे (Vincent BOLLORE)... आपके पास झाविये नील (Xavier NIEL) हैं... तो, मैं कहूंगा कि ये सब फ्रांस के अंबानी और अदानी
हैं। पिछले २० साल से वह इस सूची को प्रकाशित कर रहे हैं। और वे इसे हर साल
सुधारित करते रहते हैं। इसलिए, मेरी दिली इच्छा है कि एक दिन भारत में भी कोई
ऐसा करें ताकि प्रसार माध्यमोंके मलिकोंकी संपत्तियों पर नज़र रखी जा सके। तो यह
प्रसार माध्यमोंके बारे में था।
रेणुका : क्या मैं प्रसार माध्यमोंके बारे में कुछ कह सकती हूँ?
अनुबंध : ज़रूर।
रेणुका : दरअसल, भारत में प्रसार माध्यमोंकी हालत बेहद खराब है।
और एक दृष्टिकोण से, मुझे लगता है कि इस मामले में हमने पहले ही अरब स्प्रिंग
जैसी घटना देखी थी… शायद आप जैसे लोग उस समय इतने छोटे थे कि इसे जानते ही नहीं थे
लेकिन हमने दूरदर्शन से एक ऐसे निजी प्रसारमाध्यम संस्थान तक,
जो वास्तव में स्वतंत्र
था, वहाँ तक का बदलाव
देखा है। यह वास्तव में पूरी तरह से स्वतंत्र था और वह तरह-तरह के दिलचस्प काम कर
रहा था। उस समय मेरी मुलाकात नीदरलैंड के एक राजनयिक से हुई। मैं उस वक्त कुछ काम
नहीं कर रही थी और उस समय उन्होंने कहा था, “मैं भारतीय प्रसार माध्यमों में ऐसी ऐसी चीजें
देख रहा हूँ जो हम नीदरलैंड्स में कभी सोच भी नहीं सकते”! तो उस माहोल कितना खुला
और जीवंत था। दरअसल उस वक्त तरह-तरह की घटनाएं घट रही थीं। और फिर, उद्योगपतियों
द्वारा इस पर कब्जा कर लिया गया जिन्होंने उस शक्ति को महसूस किया और इसे
नियंत्रित करना आवश्यक समझा। इस प्रसार माध्यमों की यह शक्ति को, इस असाधारण शक्ति
को। इससे पहले भी कुछ उद्योगपति थे जो लोग प्रसार माध्यमों में थे, लेकिन उन्होंने
ऐसा नहीं किया था। जैसे, गोयनका परिवार वहाँ था या फिर “द टाइम्स ऑफ
इंडिया” भी एक निजी उद्योग के स्वामित्व में था। लेकिन अब उन्होंने जिस तरह की
शक्ति हासिल कर ली है और जिसका वे बेशर्मी से फायदा उठा रहे हैं ये कुछ अलग ही है।
और भारत और फ्रांस की स्थिति के बीच के अंतर के बारें में
कहें तो… वैसे, आपका वह प्रसार माध्यम वाला चित्र, यह वाकई एक बेहद शिक्षाप्रद अनुभव था। फ्रांस
की स्थिति और भारत की स्थिति में फर्क शायद यह है कि उन लोगों की संख्या जो भारतीय
प्रसार माध्यमों को नियंत्रित करते है उनकी की गिनती आप शायद एक हाथ की उंगलियों
पर कर सकते हैं। लेकिन वहाँ (फ्रांस में) उनकी संख्या शायद थोड़ी अधिक है। तो बस
इतना ही। इसके अलावा और कोई फर्क नहीं है।
लेकिन भारत के सन्दर्भ में एक बहुत ही उज्ज्वल बात सोशल मीडिया का गहरा प्रभाव दिखाई देना है। वैसे, मुझे यह भी लगता है कि बहुत सारे बिकाऊ चनेल्स भी है जिनका पालन-पोषण हुआ है और जो तरह-तरह के फर्जी आंकड़े तैयार करना, झूठी राय फैलाना और न जाने क्या-क्या कर रहे है। और फिर भी, निश्चित रूप से एक बहुत मजबूत, अच्छा, एक सच्चा सोशल मीडिया, ईमानदार टिप्पणियों के साथ, ईमानदार तथ्यों के साथ वास्तव में मौजूद है और हममें से अधिकांश लोग उनका अनुसरण करते हैं... और आपको पता है, मैंने इसे अपने चुनाव प्रचार के दौरान देखा था कि लोग मुझे दरवाजे पर ही बता देते थे... यह काफी समय पहले की बात है। “हम मुख्यधारा के प्रसार माध्यमों को नहीं देख रहे हैं। हम उन्हें देखना नहीं चाहते।“ लोग वास्तव में वैकल्पिक मीडिया माध्यमों की ओर रुख कर रहे हैं। और मुझे लगता है कि यह एक बेहतरीन तरीका है। इसीलिए मुझे भारत के लोगों पर भरोसा है कि वे ढूंढ रहे है। सबसे अच्छा विकल्प तो "एएलटी न्यूज" जैसा माध्यम है। हमारे पास “एएलटी न्यूज़” है।
अनुबंध : जी हाँ।
मैं यहाँ जिस बात पर विशेष ज़ोर देना चाहूँगा वह यह है कि
प्रसार माध्यमोंका यह पतन सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है, जैसा कि आपने किताब में भी कहा है। यह एक
वैश्विक घटना है।
और इसमें दो महत्वपूर्ण ऐसे घोटाले है जिनसे हमारी आंखें
खुल जानी चाहिए। एक उदाहरण पिछले साल का अमेरिकी सहायता (USAID)
घोटाला है। हमें इसके
बारे में पता चला है। मेरा मतलब है, पिछले कई वर्षों या दशकों से, अमेरिका की यह
संस्था प्रमुख वैश्विक प्रसार माध्यम संस्थानों को वित्तीय सहायता प्रदान कर रही
है। इसलिए, कोई भी यह सोच
सकता है कि वे ऐसा क्यों करेंगे? क्योंकि हम अनुमान लगा सकते हैं कि यह किया गया
है कोई खास राय गढ़ने के उद्देश्य से। हम इसे "पश्चिमी दुशप्रचार" भी कह
सकते हैं।
एक और घोटाला "संगठित अपराध और भ्रष्टाचार रिपोर्टिंग
परियोजना (OCCRP)" से संबंधित है। इसमें एक विशालकाय खोजी
पत्रकारिता संस्थान, जो कि ओसीसीआरपी है और अमेरिकी सरकार,
इन दोनों के बीच छिपे हुए
संबंध थे। और यह विश्व में खोजी मीडिया का सबसे बड़ा समन्वयित संगठन है। इस जांच
से पता चला है कि अमेरिकी सरकार के साथ इसके संबंध हैं। “और वाशिंगटन इसके बजट का
आधा हिस्सा मुहैया कराता है। उसे अपने वरिष्ठ कर्मचारियों और निधियों पर निर्णय
लेने का अधिकार है। उसकी जांच का मुख्य केंद्र रूस और वेनेजुएला है।" इस
प्रकार, मेडियापार्ट ने २
दिसंबर २०२४ को इसकी सूचना दी थी।
चूंकि हमने प्रसार माध्यमों के बारे में बात की थी और मैं
इस विषय को यहीं समाप्त करना चाहता हूँ। फिर भी, आपने धनिकतंत्र (plutocracy)
का भी जिक्र किया। वैसे
मेरे लिए अब लोकतंत्र के लिए अगला खतरा यह सिर्फ बड़े उद्योगपतियों द्वारा कुछ
प्रसार माध्यमों पर कब्जा नहीं है, लेकिन अब हम इससे आगे बढ़ रहे हैं जहाँ संपूर्ण
सरकारी यंत्रणा पर ही कब्जा हो रहा है! और यही हमारे समय की चुनौती है। मैं यहां
आपके लिए कुछ प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश डालूंगा।
इसके अलावा, अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (artificial
intelligence) भी मौजूद है। और
उदाहरण के लिए… कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए आवश्यकता है एक बड़े पैमाने पर बहोत
स्थिर और शक्तिशाली बिजली कि और केवल परमाणु ऊर्जा ही इतनी बिजली, इतने बड़े पैमाने
पर प्रदान कर सकती है। इसलिए, संयुक्त राज्य अमेरिका में जो हो रहा है वह यह
है कि अब परमाणु ऊर्जा उत्पादन निजी संस्थाओं के हाथों में चला गया है, जो कि एक गंभीर
मामला है। इस प्रकार, वे २०१३ से प्रमुख कृत्रिम बुद्धिमत्ता
कंपनियों को यह बिजली प्रदान कर रहे हैं और इन्ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता कंपनियों की
सेवाओं का उपयोग फिर अमेरिकी सरकार द्वारा किया जाता है। क्योंकि सरकार के पास खुद
की कृत्रिम बुद्धिमत्ता कंपनियां नहीं है। इसलिए, आप कल्पना कर सकते हैं। इस प्रकार, आप जितनी अधिक
ऊर्जा लगाएंगे, उतना ही अधिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता का निर्माण होगा। यही
संबंध है।
मुझे यहाँ फिर से इस बात पर ज़ोर देना होगा कि सिर्फ बिजली
के निर्माण के लिए अब तक १५०० अरब डॉलर निवेश किये गए हैं! इनमें से कुछ में पहले
से ही निवेश किया जा चुका है और २०२६ या २०२७ तक पूरी राशि खर्च हो जाएगी। इसके
अलावा, २०३० तक ३००० अरब
डॉलर से अधिक की राशि कृत्रिम बुद्धिमत्ता में निवेश होने वाली है। अब, हमें इस निवेश के
विशालकाय स्वरूप पर ध्यान देना होगा। क्योंकि फ्रांस पर ३४०० अरब यूरो का कर्ज है
जो कि इसके सकल घरेलु उत्पाद (GDP) का लगभग ११३% है। इसलिए, यह बड़े पैमाने पर हो रहा है। और अगर हम यह मान
लें कि दुनिया में संसाधन सीमित हैं, और अगर इतनी बड़ी रकम एक ही दिशा में जा रही है, तो लोकतंत्र और
जनता पर इसके प्रभाव की कल्पना की जा सकती है।
उदाहरण के लिए, इटली ने हाल ही में एलन मस्क (Elon MUSK) के स्पेस लिंक (Space Link) को गुप्त रक्षा
संचार प्रदान किया है। इस निर्णय का रणनीतिक महत्व बेहद ज्यादा है। जर्मनी में, विभिन्न लैंडर (landers) की पुलिस... तो, लैंडर छोटे जिलों
की तरह होते हैं। वे लैंडर पैलेंटिर (Palantir) के निगरानी सॉफ्टवेयर का उपयोग करते हैं, पैलेंटिर जो कि
एक अमेरिकी निजी कंपनी है। फिर ब्रिटेन में २०२३ से, एनएचएस - राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (NHS - National Health Service) मरीजों की जानकारी को प्रबंधित करने के लिए पैलेंटिर
सॉफ्टवेयर का उपयोग करती है। फ्रांस में यह काम माइक्रोसॉफ्ट करता है, जो मरीजों की
जानकारी प्राप्त करता है।
इसके अलावा सार्वजनिक और सरकारी संस्थाओं के लिए निजी
क्लाउड सुविधाएं भी मौजूद हैं। तो, एक बार फिर यहाँ हित द्वंद्व (conflict of interest) और संप्रभुता के
मुद्दे सामने आ गए हैं। अंततः, २०२५ में, संयुक्त राज्य अमेरिका में एक “अमेरिकी सुरक्षा
चिप अधिनियम” पारित किया गया। जिसका अर्थ है कि एनवीडिया (Nvidia)
जो कि एक प्रमुख अमरीकी
आईटी हार्डवेयर कंपनी है और जो विश्व के कंप्यूटर बाजार के ९० से ९५ % हिस्से पर
कब्ज़ा जमाये हुए है। अतः, इसका अर्थ है कि उन्होंने अब कानून द्वारा यह
अनिवार्य कर दिया है कि हमारे सभी लैपटॉप में जीपीएस ट्रैकिंग फीचर होना चाहिए।
वैसे, हम (पश्चिमी देश)
हुआवेई (Huawei) और अन्य चीनी कंपनियों पर इसी बात का आरोप लगाते रहे हैं, और अब, इसे संयुक्त
राज्य अमेरिका द्वारा क़ानूनी तरीके से, एक वैध तरीके से किया जा रहा है। इससे उन सभी
लोगों पर असर पड़ेगा जो उन लैपटॉप का इस्तेमाल करते हैं फिर वो भारतीय हों, फ्रांसीसी हों या
कोई और। तो, ये अगली
चुनौतियाँ हैं।
यदि आपके पास इसपर कोई टिप्पणी हो तो कृपया बताएं।
रेणुका : ऐसा लगता है कि आपने कई चीजों की जांच की है।
जैसा कि मैंने धनिकतंत्र (plutocracy)
के बारे में कहा था...
मैंने अपनी किताब की शुरुआत में ही उल्लेख किया है कि हालाँकि धनिकतंत्र एक बहुत
बड़ा मुद्दा है, मैंने इस पर कुछ नहीं लिखा है। निश्चित रूप से धनिकतंत्र कि
लोकतंत्र को पलटने और उसे नुकसान पहुचाने की संभावना बहोत ज्यादा है। यह एक तथ्य
है। हालाँकि, सच कहूँ तो, आपके द्वारा बताए
गए सभी विवरणों के बारे में मुझे ज़्यादा जानकारी नहीं है। निश्चित रूप से आप कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उठा रहे हों और मुझे
यकीन है, मुझे उम्मीद है
कि संबंधित देश इस पर गौर करेंगे और उनपे अपने लोगों से दबाव बनेगा जब इनमें से
कुछ चुनौतियों से वे अवगत हो जाएंगे।
अनुबंध : और कौन जाने, शायद आप आपकी इस किताब के अगले संस्करण में इस
पहलू पर एक अध्याय भी जोड़ देंगे!
इस के साथ ही मुझे आशा है कि आपकी किताब का अनुवाद विभिन्न
भारतीय भाषाओं में किया जायेगा ताकि यह महत्वपूर्ण चर्चा उन तक पहुंच पायेगी।
रेणुका : मुझे भी यही उम्मीद है क्योंकि हमारे देश में कई भाषाओं के
साथ चुनौतियां हैं। और हमें लोगों तक पहुचना होना।
लेकिन आपको पता है, भारत से अच्छी खबर यह है कि लोग जागरूक हैं। और
मैं लोगों से मिलती रहती हूँ, जब भी मैं आसपास घूमती हूँ , अचानक से लोग मिल
जाते है और मै उनसे बात करती हूं। और जरूरी नहीं कि सिर्फ हम जैसे संपन्न लोग ही
मिलते है। और जब आप विभिन्न लोगों से बात करते हैं, जिनमें अलग अलग आय स्तरों वाले लोगों की
श्रेणियां और अत्यंत गरीब लोग भी शामिल है तो आपको बेहद उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाएं
मिलती हैं। जब वे मतदान करने के लिए बाहर आते हैं तो उन्हें विश्वास होता है, उनके दिल की
गहराइयों में, उस छोटी सी चीज़ जो वे पकड़े हुए हैं और जिस शक्ति का वे
प्रयोग कर रहे हैं, उस पर उन्हें यकीन होता है। तो, यह यकीन मौजूद है और मुझे इस बात की खुशी है।
अनुबंध : खैर, आपकी किताब ने वास्तव में जिस चीज को उजागर
किया है वह ऐसा तथ्य है कि हम भारतीय इस दुनिया का हिस्सा हैं। दुनिया में हमारा
हित जुड़ा हुआ है और इसके विपरीत, दुनिया का हित भारत से जुड़ा हुआ है। हम सब आपस
में जुड़े हुए हैं। और ये सब हमारे समान, साझा अस्तित्व के मुद्दे हैं, एक तरह से हमारे
साझे लोकतांत्रिक अस्तित्व के मसले है। यह वाकई बहुत अच्छी बात है।
मैं इसके लिए आपका आभारी हूं।
अब, मैं वास्तव में चाहता हूं कि हमें अपनी चर्चा
यहीं समाप्त करनी चाहिए क्योंकि यह काफी लंबी खिंच गई है। ये इसलिए भी हुआ क्योंकि
ये सब दिलचस्प मसले और विषय हैं।
बस एक आखिरी प्रश्न। हालाँकि मैं उन्हें एक साथ पूछता हूँ
क्योंकि असल में मेरे दो सवाल है। हमारे समय में किताबें पढ़ने का महत्व, इस विषय पर मै
आपके विचार सुनना चाहता हूँ। और यह खास करके मेरी पीढ़ी के लोगों के लिए या फिर
हमसे अगली पीढ़ी के लिए है। शायद इसलिए भी क्योंकि आपके समय में किताबें पढ़ना आज
की तुलना में कहीं अधिक सामान्य था। हमारे ज़माने में ध्यान भटकाने वाली चीजें बहुत
ज्यादा हैं। फिर भी, मुझे लगता है कि आज के समय में भी पढ़ना बहुत प्रासंगिक है।
और फिर आपने मुझे बताया था कि आपके पास एक अगली योजना है, एक नई किताब लिखने की योजना। तो, अगर आप इन दोनों
सवालों को एक साथ जोड़ सकें और फिर हम रुक जाएंगे।
रेणुका : हाँ, पढ़ना!
मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि उन झूठे दावों के बावजूद कि
पढ़ना खत्म हो चुका है, पढ़ना अभी भी प्रासंगिक है। और हम अक्सर सुनते
रहते हैं कि पढ़ना खत्म हो चुका है। मैं उन भाग्यशाली लोगों में से एक प्रतीत होती
हूँ जिनके पास ज्यादातर ऐसे दोस्त है जो पढ़ते हैं। और वे बहुत पढ़ते हैं। वे
तरह-तरह की चीजें पढ़ते हैं, जो मुझे बेहद दिलचस्प लगता है।
क्योंकि मेरे लिए पढ़ना ही एकमात्र तरीका था जिससे दुनिया
के द्वार मेरे लिए खुल गए। मेरा मतलब है, आप अपनी ही दुनिया निर्माण करते हों और वास्तव
में पढ़ने ने मुझे जीवन में मार्गदर्शन दिया। इससे मुझे यह पता चला कि मेरे जीवन
के विभिन्न चरणों में मुझे क्या उम्मीद करनी चाहिए। ऐसे लगता था जैसे कोई मेरे साथ
हो, जैसे कोई भूत मेरे
बगल में खड़ा हो, और मेरा हाथ पकड़कर मुझे आगे ले जा रहा हो। इसलिए, पढ़ना अत्यंत
महत्वपूर्ण है और यह मेरे लिए आज भी बहुत महत्वपूर्ण है।
लेकिन मुझे लगता है कि मेरे कुछ दोस्त जो पढ़ते नहीं हैं, उनमें और दूसरों
में अंतर यह है कि वे उनकी बहुतांश जानकारी एकत्रित करने के लिए सोशल मीडिया पर
निर्भर हैं। पढ़ने और सोशल मीडिया के बीच का अंतर वही है जो अभी, इस वक्त हो रहा
है... इस तरह की लंबी बहस जिसमें आप विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, आप किसी व्यक्ति
के तर्कों को देखते हैं, आपको कही गई बात का तर्क समझ में आता है, आप तालिका को
देखते हों, आप आरेखों को
देखते हों, आप आंकड़ों को
देखते हों, और फिर आप अपनी
राय बना लेते हैं। वह प्रक्रिया आप पढ़ने के माध्यम से कर सकते हैं। आप इसे सोशल
मीडिया के माध्यम से नहीं कर सकते। और मुझे नहीं लगता कि भविष्य में भी ऐसा संभव
होगा क्योंकि इसके लिए विचारों का एकाग्र होना, बार-बार एक ही बात पर सोचना, इस प्रक्रिया की
एक निश्चित आवश्यकता है । और आप यह कर सकते हैं, यह आप केवल किताब में लिखित सामग्री के साथ ही
कर सकते हैं। और वह भी कोई छोटे-मोटे प्रारूप में नहीं। यह एक किताब में ही होना
चाहिए। और यह कौशल, मुझे उम्मीद है कि यह हमारे बच्चों के लिए लुप्त नहीं हों
जाएगा।
मुझे इस बात की चिंता है क्योंकि आजकल विद्यालयों में
वास्तव में जितनी पढाई हो रही हैं उसका दायरा काफी सीमित होता जा रहा है। यह अब
उतना नहीं है जितना इससे पहले हुआ करता था। और यह बात मुझे चिंतित कर रही है
क्योंकि उन्हें अपने दिमाग को किसी जानकारी को देखने और समझने के लिए प्रशिक्षित
करना होगा और स्वयं यह तय करना होगा कि कोई बात तर्कसंगत है भी या नहीं। यह तर्क
वास्तव में हर स्तर पर लागू होता है। और अगर ऐसा नहीं होता है, तो यह कहने में सक्षम
होना चाहिए, "ठीक है, यह इन कारणों के लिए तर्कसंगत नहीं है।"
इसलिए, यह सोचने की एक
ऐसी प्रक्रिया है जो केवल एक किताब ही रच सकती है। बेशक, आप इसे किंडल के माध्यम से कर सकते हैं या आप
इसे किसी किताब के माध्यम से कर सकते हैं। मुझे किताब को हाथ में लेना पसंद है।
जैसा कि मैंने किंडल में पाया, की उस में विचारों का आना-जाना इतनी बार नहीं
होता। इसलिए, मुझे निश्चित रूप
से खुशी है कि मै पाठकों के बीच रहती हूँ और मुझे लगता है कि इसने मेरे जीवन कि
कीमत में इजाफा किया है। मैं ऐसे जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती जिसमें मैं नहीं
पढूंगी।
अनुबंध : और आपकी अगली किताब?
रेणुका : खैर, मुझे नहीं पता कि
मैं यहां इसके बारे में विस्तार से बात करना चाहती हूं। मैंने कुछ अध्यायों को
छोड़ दिया है लेकिन जैसा कि आपने शुरुआत में उल्लेख किया है मुझे राजनीति विज्ञान
और अर्थशास्त्र में रुचि थी। और यह किताब एक भिन्न प्रकार से अर्थशास्त्र के बारे
में है। मैं इस किताब को एक व्यक्तिगत रूप देने जा रही हूँ क्योंकि मैं अपने मन
में यह सवाल पूछते हुए बहुत उत्सुक रही हूँ कि कितना पैसा वास्तव में पर्याप्त है? इसलिए, इसका मतलब यह है
कि मुझे वास्तव में पैसे को परिभाषित करने की आवश्यकता है, यह जानने के लिए कि पैसे में कितनी शक्ति होती
है। और आज हमने जितनी भी बातें कीं, उन सबके बावजूद, हमारें यहाँ कितनी सारी कविताएँ, कहानियाँ, गीत, लोकगीत है जो कहते हैं,
"पैसा ही सब कुछ
नहीं है"। और यह वास्तव में सब कुछ नहीं है। और पैसा किन-किन चीजों को खरीद
सकता है? पैसा किन-किन
चीजों को नहीं खरीद सकता?
और वे कौन सी चीजें हैं जिनके लिए पैसा एक पर्याय है? क्योंकि हम पैसे
को एक विकल्प के रूप में इस्तेमाल करते हैं किसी की सफलता का आकलन करते समय, किसी के व्यवसाईक
जीवन का मूल्यांकन करते समय। वास्तव में महिलाओं को दबाकर रखने में... क्योंकि हम
कहते हैं, यदि कोई महिला
अपने पति से अधिक कमाती है तो वहाँ कुछ समस्या है। मुझे नहीं सझता कि पैसे कि एक
रकम क्यों किसी के शक्ति का या प्रभुत्व का या फिर किसी कि संपूर्णता की भावना का
प्रतीक माना जाना चाहिए। और इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए मैं कुछ अन्वेषण करना
चाहूंगी, कुछ समय पढ़ाई
में बिता कर जानना चाहूँगी की कैसे पैसा लोगों के मतों को खरीद सकता है। यह किस
मामले में उन्हें खरीद सकता है और किस मामले में उन्हें नहीं खरीद सकता। क्योंकि
(जोहरान) मामदानी का प्रभाव हमें दिखाता है कि एक निश्चित सीमा से आगे वास्तव में
कुछ भी नहीं खरीदा जा सकता। यह संभव नहीं हो सकता है। मेरा मतलब है, आप नहीं जान
सकते। इसलिए, मुझे नहीं पता कि
मैं किस निष्कर्ष पर पहुँचूँगी। लेकिन मैं वास्तव में पैसा नाम की यह अजीब सी चीज
कि जांच करना चाहूंगी। यह वास्तव में क्या है?
अनुबंध : यह तो वाकई दिलचस्प है!
और इससे मुझे दो बातें याद आ गईं। मेरी एक फ्रेंच दोस्त है, और जब वह छोटी थी, तो उसने एक बार
अपनी माँ से पूछा, “कोई एक चीज महंगी है या नहीं, इसका फैसला हम कैसे करें?”
और उसकी माँ का जवाब
था... “यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस उद्देश्य से और कहाँ!” रेगिस्तान में, पानी की एक बोतल
के लिए भी आप बहुत अधिक धन का भुगतान करने के लिए आसानी से तैयार हो जायेंगे, लेकिन रोजमर्रा
की जिंदगी में ऐसा नहीं होगा। इसलिए, यह सापेक्ष है।
एक और पहलू जो मुझे दिखाई देता है, और नए भारतीय संदर्भ में तो यह और भी अधिक
महत्वपूर्ण है। हम देखते हैं कि आपके पास जितना अधिक पैसा है/आप जितना अधिक कमाते
हैं, शायद इससे आपको
दुनिया को प्रदूषित करने के लिए अधिक क्षमता मिलती है... जैसे कि फिर आपके पास
विदेश यात्रा जैसी सभी महंगी आदतें आती है... जैसे आप महँगी चीजों पर और आदि पर
अपना पैसा खर्च कर सकते हैं। अतः, मुझे इसमें एक सहसंबंध दिखाई देता है।
पुस्तकों के संबंध में, मैं कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहूंगा।
मुझे पता चला कि डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर, जब उन्होंने अपनी पढ़ाई अमेरिका में कोलंबिया
विश्वविद्यालय में की, तो महज दो साल में उन्होंने २००० से अधिक
किताबें पढ़ डालीं! अपनी थोड़ी-बहुत बचत से वे पुरानी किताबें खरीदते थे। अतः, यह उनके पठन कि
व्याप्ति दिखाता है और फिर यह सब बाद में उन्होंने जिस तरह का काम किया, उसमें भी
प्रतिबिंबित होता है।
रेणुका : मैं अपने जीवन पर
पीछे मुड़कर देखते हुए आपको बता सकती हूँ, मेरे जीवन के सबसे सुखद लम्हों में से एक था उस
दौर में जब मेरे पास लगभग कोई पैसा नहीं था और मैं पेरिस में एक शिष्यवृत्ति ले कर
पढाई कर रही थी। और उसके भरोसे मै पैदल घूमती थी, पश्चिमी यूरोप के सभी हिस्सों का भ्रमण करती थी, कुछ बेहद कम
पैसों में और इसने फिर भी मुझे आज तक बहोत खुशी का एहसास दिलाया है। और हाँ, अपनी पहली कमाई
मैंने किताबें खरीदने में लगायी और वो पैसे लेकर मै किताबों की दुकान में चली गयी।
उस किताबों की दुकान का मालिक मेरे मन में जो कुछ भी हो रहा होता था, वह उसे पढ़ लेता
था। और वह मुझे बहुत बड़ी छूट दिया करता था। बिना किसी... मेरा मतलब है की ...
बिना किसी हंगामे से। क्योंकि, मुझे लगता है कि किताबों का एक प्रेमी दूसरे को
पहचान लेता है। और उसके बाद मोलभाव करने की कोई जरूरत नहीं बचती। इसलिए, मुझे वह किताबों
की दुकान हमेशा याद रहती है जो मेरे कॉलेज के बगल में थी जहाँ मैं अपनी पहली कमाई
ले चली गयी थी और मैंने उस वक्त वहा एक किताब खरीदी थी।
अनुबंध : मुझे उम्मीद है और मुझे लगभग पूरा यकीन है कि
इस बातचीत से, इस साक्षात्कार से और भी अधिक लोगों को किताबें पढने कि
प्रेरणा मिलेगी और विशेष रूप से आपकी किताब पढ़ने कि प्रेरणा।
आपका बहुत-बहुत धन्यवाद रेणुका मुझसे बात करने के प्रस्ताव
को स्वीकार करने के लिए!
आपने भारतीय लोकतंत्र को आगे बढ़ाने के लिए एक बहुत बड़ा
योगदान दिया है, इसे और अधिक सुलभ बनाने के लिए, एक बहुत ही सरल भाषा में। लेकिन सरल भाषा का
मतलब यह नहीं है कि इससे चीजें महत्वहीन हो जाती हैं... इसके विपरीत, यह इसे सुलभ
बनाती है। और यही लोकतंत्र का उद्देश्य होना चाहिए।
तो, मैं आपको फिर से धन्यवाद देता हूं और मुझे
उम्मीद है कि भविष्य में भी आपसे बातचीत जारी रहेगी।
रेणुका : धन्यवाद।
अनुबंध : आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
रेणुका विश्वनाथन
२०१८ में, रेणुका ने
राजनीति में अपना पहला कदम रखा जब उन्होंने आम आदमी पार्टी के बैनर तले बेंगलुरु
के शांति नगर निर्वाचन क्षेत्र से कर्नाटक विधानसभा चुनाव लड़ा।
रेणुका मतदाता पंजीकरण और शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के तहत
आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों के स्कूलों में नामांकन के लिए एक सक्रिय
कार्यकर्ता रही हैं। वह पर्यावरण और महिला मुद्दों में भी शामिल हैं।
रेणुका कई भाषाएँ धाराप्रवाह बोलती हैं, जैसे मलयालम, तमिल, कन्नड़, हिंदी, अंग्रेजी, फ्रेंच और स्पेनिश। इसके अलावा, उन्हें फिल्मों, नाट्यकला, संगीत, साहित्य और कला
में गहरी रुचि है। उन्हें यात्रा करना, पढ़ना और भी बहुत
कुछ पसंद है।
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