Friday, January 23, 2026

Bless This Mess - Hindi

 



दुनिया में सचमुच में  कितने लोग कहते हैं कि उनके जीवन की मुख्य रुचि राजनीति है? रेणुका विश्वनाथन उन लोगों में से एक है जो इस बात को दृढ़तापूर्वक और स्वयं स्वीकार करते हुए कहते हैं।

२६ जनवरी २०२६, आज जब भारत अपना गणतंत्र दिवस  मना रहा है, तो इस सुनहरे दिन पर मैं रेणुका के साथ भारतीय लोकतंत्र पर उनकी टिप्पणियों पर चर्चा करता हूँ, जो उनकी हाल ही में प्रकाशित किताब "ब्लेस दिस मेस" में शामिल हैं।

रेणुका विश्वनाथन भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। ३७ वर्षों से अधिक के अपने लंबे प्रशासनिक कारकीर्द में उन्होंने राज्य और केंद्रीय सचिवालय में विभाग प्रमुख के रूप में कार्य किया है। मनमोहन सिंह की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार में वह ग्रामीण विकास सचिव भी रह चुकी हैं। २०१८  में उन्होंने आम आदमी पार्टी (आप) के तरफ से बेंगलुरु के शांति नगर निर्वाचन क्षेत्र से कर्नाटक विधानसभा चुनाव लड़ा था।

इस भाग १ सत्र में, हम केरल और तमिलनाडु की राजनीति से जुड़ी उनकी बचपन की यादों, लोकतंत्र के स्तंभों, भारतीय गणराज्य की लोकतांत्रिक साख के उनके अपने आकलन, मतदाता सूचियों पर बदलती जनसांख्यिकी के प्रभावों, जातिगत समीकरणों और राज्य एवं आम चुनावों पर इसके प्रभावों, विफल होते संघवाद और भी बहुत कुछ विषयों पर चर्चा करेंगे।

यहां रेणुका के कुछ मर्मस्पर्शी और बेहद प्रासंगिक विचार दिए हैं।

“हर मत का मूल्य समान नहीं होता।“

“चुनावी बहुमत वास्तव में अल्पमत है।”

"लोकतंत्र ने अल्पसंख्यक दृष्टिकोण 'हिंदुत्व' को सत्ताधारी दृष्टिकोण बनने की अनुमति दी।"

"राष्ट्रीय चुनावों पर जातिगत कारक का प्रभाव राज्य चुनावों की तुलना में अलग होता है।"

हम आपके सामने यह निमंत्रण प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें रेणुका नागरिकों को लोकतंत्र में "सक्रिय भागीदार" बनने के लिए आमंत्रित करती हैं!

 

टिप्पणी:

१) इस साक्षात्कार में दो भाषाओं में (फ़्रांसिसी और हिंदी) एक साथ उपशीर्षक उपलब्ध कराए गए हैं।

पता: https://www.youtube.com/watch?v=dTAfFg7Sx8g

२) इस साक्षात्कार को निम्नलिखित भाषाओं में एक लेख के रूप में पढ़ा जा सकता है: अंग्रेजी, फ्रेंच, इतालवी, हिंदी, मराठी, बंगाली और कन्नड़।

पता: https://thefrenchmasala.blogspot.com/2026/01/bless-this-mess-hindi.html




अनुबंध: नमस्ते! मेरा नाम अनुबंध काटे है।  मैं पेरिस में रहने वाला एक अभियंता हूं और पिछले कुछ महीनों से,  लगभग एक साल या उससे भी अधिक समय से,  मैं लेखकों के साथ साक्षात्कार कर रहा हूँ। क्योंकि मुझे किताबें पढ़ना पसंद है। और आज मैं बहुत खुश हूँ क्योंकि यह उन दुर्लभ अवसरों में से एक है जब मुझे अपने किसी मित्र का साक्षात्कार लेने का अवसर मिलता है, जिन्होंने एक किताब भी लिखी है। और उनका नाम रेणुका विश्वनाथन है।

रेणुका, आपका स्वागत है! 

रेणुका: धन्यवाद। 

अनुबंध: बेहद ख़ुशी से! रेणुका मेरी दोस्त है। बल्कि मैं यह भी कहूंगा कि वह एक "कोम्रेड" है। जैसे की उन्होंने किताब में लिखा है,  वह चाहती है कि हम उन्हें इसी शब्द से संबोधित करे।  क्योंकि जब मैं बैंगलोर में रहता था,  हमने शुरुआती दिनों में एक साथ काम किया।  आम आदमी पार्टी (आप) के लिए और हम वहां कई गतिविधियों में शामिल थे।  हम शायद थोड़ी देर बाद उन पर बात करेंगे। लेकिन रेणुका ने जो किताब लिखी है, उस किताब का नाम है “ब्लेस धीस मेस”(Bless This Mess)। और मैं इस साक्षात्कार को २६ जनवरी २०२६ को साँझा करना चाहता हूँ। इस अवसर के लिए समुचित इससे बढ़िया मुझे कोई और किताब नहीं सूझी।

तो, मैं अब आज का सत्र शुरू करूंगा। 

इसे शुरू करने से पहले, मैं यह कहना चाहूंगा कि  रेणुका का औपचारिक रूप से परिचय कराएँ। तो, रेणुका, आपका प्रारंभिक बचपन  मद्रास (चेन्नई) में था। जिसे उस समय मद्रास प्रेसीडेंसी कहा जाता था।  बाद में, वह त्रावणकोर प्रेसीडेंसी में,  केरल में कोचीन और एर्नाकुलम चली गईं। वहाँ उनके पिता केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे  और बाद में वे केरल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने। उनकी मां डॉक्टर थीं। यह उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि है।

जहां तक उन के शिक्षा का सवाल है, उन्होंने केरल विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और इतिहास में बीए (बैचलर ऑफ आर्ट्स) किया है। बाद में उन्होंने अन्नामलाई विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में  एमए (मास्टर ऑफ आर्ट्स) की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने  अर्थशास्त्र में दूसरी बार एमए (मास्टर ऑफ आर्ट्स) की उपाधि हासिल की। यह पत्राचार पाठ्यक्रम (correspondence course) था। इसके अलावा, उन्होंने फ्रांस में एमफिल (मास्टर ऑफ फिलॉसफी)  का अध्ययन किया है और  यह एक  प्रशासनिक पाठ्यक्रम  DESS (D'Études Superieures Spécialisées) था,  जो एक साल का अभ्यासक्रम था। और बाद में,  १९८४ में उन्होंने पेरिस नौ (IX) विश्वविद्यालय से पीएचडी भी की। यह एक "प्रशासनिक डॉक्टरेट" “Doctorat d'État” थी। और यह विश्व में मौजूद राजकोषीय संघों के संबंध में  एक तुलनात्मक अध्ययन के बारे में था। तो, यह आपके फ़्रांस से सम्बन्ध  के बारे में था।

अब, उनकी पेशेवर जिम्मेदारियों के बारे में। यह ३७ वर्षों का कार्यकाल रहा है। आपने प्रशासनिक सेवाओं (civil service)  में प्रवेश किया और वहां काम किया। जैसा कि मैंने पहले बताया,  ३७ वर्षों का यह कार्यकाल एक नौकरशाह (bureaucrat) के रूप में था। वहाँ आप धीरे धीरे आगे बढ़ी और पदोन्नति पाती गई। पहले आप एक विभाग प्रमुख के अधीन एक कनिष्ठ अधिकारी थी,  और मनमोहन सिंह की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार में आप राज्य और केंद्रीय सचिवालायों में   ग्रामीण विकास सचिव थीं। आपने राज्य संसद और केंद्रीय संसद दोनों में,   मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदन हेतु और विधानमंडल के मतदान के लिए  कानूनों और नीतियों को प्रस्तावित करने में भी भूमिका निभाई। आप मंत्रिमंडल की नोट्स पर, उनकी मंजूरी से पहले हुई चर्चाओं में भी शामिल थीं। आप पेशेवर और व्यक्तिगत कारणों से दुनिया में काफी घूमी हों। आप २०१८ में आम आदमी पार्टी (आप) की कर्नाटक विधानसभा चुनाव की शांतिनगर (बेंगलुरु) से उम्मीदवार भी थीं।

अब, उन शहरों और  देशों के बारे में जहां आप रह चुकी है या जा चुकी है। तो, मैंने मद्रास से त्रावणकोर के बारे में बताया था। फिर आप वहाँ से मैसूर गईं जहाँ आपकी शादी हुई। फिर आप बैंगलोर चली गई। वहां से... पहले पेरिस, फिर दिल्ली और बैंगलोर। आपका उस दौरान दिल्ली और बैंगलोर के बीच  काफी आना जाना रहा ।आप कई भाषाओं की जानकार है।  रेणुका कई भाषाएँ बोलती हैं  और वह उनका आनंद लेती है। मलयालम उनकी मातृभाषा है। आप तमिल, हिंदी और अंग्रेजी भी बोलती हों। आप Alliance Française de Bangalore (AFB) में  चार साल फ्रेंच सीखी हों। आपको स्पेनिश भाषा भी पसंद है जो आपने दिल्ली विदेशी भाषा संस्थान और बाद में बैंगलोर विश्वविद्यालय में कई वर्षों के दौरान सीखी है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप अलग अलग विषयों में  एक जूनून के साथ रुचियाँ रखती हों। आप फिल्मों की भी शौकीन हों और आपको नाट्यकला, संगीत, साहित्य और कला भी बहुत पसंद है।  आप पर्यावरण और महिलाओं से जुड़े मुद्दों में भी सक्रिय रूप से  शामिल रहती हों। आपको यात्रा करना और पढ़ना बहुत पसंद है… तो, हम सबके लिए रेणुका  एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व हैं।

आप मतदाता पंजीकरण के लिए एक कार्यकर्ता भी रही हों। इसके अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों को   शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के तहत पाठशालाओं में नामांकन करने के लिए भी आप सक्रीय रही हों। हाँ। तो, यह आपका एक व्यापक  परिचय था लेकिन यह पूरी तरह से तारीफ़े काबिल है। और मैंने ऐसा इसलिए भी किया क्योंकि आप एक  अगली किताब लिखने की तय्यारी में हों और शायद उस समय, मैं अपने दर्शकों को  इस प्रस्तावना को सुनने के लिए आमंत्रित करूंगा।

तो, आपके इस परिचयको सुनने के लिए शुक्रिया।

मैंने आपकी किताब पढ़ी और मुझे वह वास्तव में बहुत पसंद आई।  मै इस की सराहना करता हूँ क्योंकि  यह न केवल आपकी टिप्पणियाँ,  आपके अवलोकन को साथ लाती है लेकिन यह ऐसे अवलोकन हैं जो आपके “ज़मीनी अनुभव” और आपके “क्षेत्रीय गतिविधियों” के माध्यम से आते हैं। और इसके अलावा आपका इसमें एक सटीक बौद्धिक योगदान भी रहा है। तो, इसमें दोनोंका एक बेहतरीन मिश्रण है। आपकी किताब में राजनीति से जुड़े अध्याय हैं जिसमें  लोकतंत्र पर सामान्य टिप्पणियां हैं। फिर, इसमें मतदाता सूची से संबंधित मुद्दे हैं। आपने न्यायिक पहलुओं पर चर्चा की है।  फिर राजनीतिज्ञों की जवाबदेही,  राजनीति और लोकतंत्र में  महिलाओं का स्थान। इसके अलावा, नौकरशाहों, जातिगत मुद्दों और भी बहुत कुछ के बारे में। हमारे पास शायद उन सभी पे चर्चा करने का पर्याप्त समय न हो। लेकिन आइए, देखते हैं कि हम कितना सफ़र तय कर सकते हैं। असल में मेरा मुख्य उद्देश्य यह है कि यह साक्षात्कार  दर्शकों को इस किताब को पढ़ने की प्रेरणा देने का काम करे।

तो, मैं अपना पहला प्रश्न आपसे पूछता हूँ। आपको यह किताब लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?  इसके पीछे की कहानी क्या थी? 

रेणुकाधन्यवाद अनुबंध।

दरअसल, मैं बस एक छोटी सी बात जोड़ना चाहती हूँ कि मैं कन्नड़ भाषा भी बोलती हूँ। क्योंकि मैंने वहीं से (कर्नाटक से) चुनाव लड़ा था। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है। और यह एक खूबसूरत भाषा है और  यह मेरी रुचि का एक हिस्सा है। 

मैंने सोचना शुरू किया...  इस किताब को लिखते समय  मुझे याद आया कि जब हम आपके जीवन पर एक नजर डालते हैं,  आप याद करते है कि जीवन में  आपकी मुख्य रुचि क्या थी? और मुझे एहसास हुआ  कि मुझे राजनीति में हमेशा से ही दिलचस्पी रही है। और इसलिए मैंने शैक्षिक रूप से  राजनीति विज्ञान के बारें में जो कुछ सीखा था   और जो अनुभव मैंने जमीनी स्तर पर, एक कार्यकर्ता के रूप में काम करते वक्त पाए थे, मैंने इन्हें एक साथ जोड़ने की कोशिश की। और इस किताब की शुरुआत यहीं से हुई थी। 

अनुबंधबहुत बढ़िया। धन्यवाद। 

अब इस किताब को पढ़ते वक्त  जो कुछ मुख्य बातें हैं, जो मुझे महत्वपूर्ण लगी  मै उनकी ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा  और उसके बाद मै अपना अगला प्रश्न आपसे पूछूंगा।

तो, सबसे पहले… आपने इस किताब में  विविध और अलग-अलग मुद्दों को छुआ है। इसलिए, यह केवल एक मुद्दे पर आधारित लेखन या चिंतन नहीं है। जैसा कि मैंने कहा, इसमें आपने अपने व्यक्तिगत अनुभव, एक नौकरशाह के रूप में,  एक जागरूक नागरिक के रूप में, एक कार्यकर्ता के रूप में,  एक राजनीतिज्ञ के रूप में शामिल किये है।  और इसमें हम बहुत सारे जमीनी स्तर के किस्से,  अनुभव देखते हैं जो कि अनमोल हैं। और एक अहम् बात यह भी है की आपने भारतीय लोकतंत्र की तुलना दुनिया के अन्य लोकतंत्रों के साथ कि है  और यह बहुत महत्वपूर्ण है की हम  छोटी-छोटी बातों में उलझकर अपना ध्यान न भटकने दे। सिर्फ एक देश पर और एक लोकतंत्र पर अपनी निघाहें लगा कर,  बल्कि साथ ही एक व्यापक दृष्टिकोण भी रखें। तो, यह महत्वपूर्ण है। 

मैं महाराष्ट्र से हूँ और दुर्भाग्यवश, उत्तर भारत के लोग  दक्षिण भारत की राजनीति के बारे में   गहन ज्ञान नहीं रखते क्योंकि यह उनके लिए  बहुत ही अगम्य,  भिन्न और जटिल मालूम होता है। और अक्सर इसमें  भाषा भी एक बाधा के रूप में सामने आती है।  इस किताब ने मुझे  एहसास करवाया है कि …  क्योंकि मैंने बैंगलोर में सात साल बिताए हैं  और मुझे इनमें से कई बातें पता नहीं थीं। और आपकी किताब की बदौलत मैंने ये सब सीखा। तो, इसमें दक्षिण भारतीय राजनीति  सरल और सुलभ तरीके से पेश है,  मेरे लिए यह सबसे खास बात है।  मैं यह भी देखता हूँ कि किताब में  आपने आम आदमी पार्टी (आप) की प्रशंसा भी की है और आलोचना भी। और एक तरह से यह आपकी निष्पक्षता का,  इसके बारे में वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण  रखने के प्रयास का प्रमाण है। तो, यह  बहुत महत्वपूर्ण है। और आप वास्तव में, शास्त्रीय अर्थ में  पक्षपाती नहीं हों।

और फिर एक  आखिरी बात...  आप को विश्वास हैं कि राजनीति ही  परिवर्तन का एकमात्र मार्ग है,  इसका जिक्र आपने अपने निष्कर्ष में किया है। तो, मैं वास्तव में  इसकी सराहना करता हूँ… 

और मुझे जो बात सबसे अच्छी लगी,  वह थी तमिलनाडु और केरल के बीच जो आपने एक खूबसूरत तुलना कि है। और वहां की आपकी बचपन की यादें। मैं उन बातों को संक्षेप में उजागर करना चाहता हूँ और इसके बाद  मैं आपसे इस पर टिप्पणी करने का अनुरोध करूंगा।

तो, आप का कहना है कि तमिलनाडु में, उदाहरण के लिए,  क्षेत्रीय, सांस्कृतिक और भाषाई निष्ठाएँ  जातिगत निष्ठाओं जितनी ही महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि तमिलनाडु में  ब्राह्मण वर्चस्व को पदच्युत करने का महत्वपूर्ण कार्य पहले ही किया जा चूका है। और केरल के बारे में, आप कहते हैं की वहां  सीरियाई ईसाई लोगोंका  प्रभुत्व है,  विशेषकर कांग्रेस के भीतर।  हालांकि, वहाँ की राजनीति पर नायर समुदाय और कुछ ब्राह्मण लोग भी हावी हैं। और तमिलनाडु के बारे में आप कहते हैं कि  वहाँ स्पष्ट रूप से एक अलगाववादी प्रवृत्ति या एक आंदोलन था। विशेष रूप से, जैसे हम जानते है कि  १९५० के दशक के उत्तरार्ध में वहाँ  “द्रविड़ नाडु” (तमिल एलम) की मांग कि गयी थी। लेकिन केरल में यह भावना बिल्कुल अनुपस्थित थी।  पड़ोसी राज्य केरल में,  हालाँकि तमिल लोगों की तरह वे भी  राजनेताओं के प्रति अनादरपूर्ण रवैया रखते हैं,  लेकिन केरल कभी भी अलगाववादी नहीं था।

और फिर आप कहते हैं कि सामान्य तौर पर,  यह मान्यता है कि अन्य भारतीय राज्यों की तुलना में,   केरल के लोग अपने साथी नागरिकों को  लिंग, क्षेत्र, धर्म, जाति या संपत्ति आदि की परवाह किए बिना, समान नागरिकों के रूप में देखते है। इसलिए, वहाँ समानता की भावना है और यह काफी प्रमुख है।

इसके बाद, आपने एक और महत्वपूर्ण पहलू को उजागर किया है। और मुझे याद है, उन दिनों अखबारों ने  इस बारे में बात की थी लेकिन अब हम  इसके बारे में ज्यादा बात नहीं करते। १९९५ में जब डीएमके (दमक) ने देवेगौड़ा सरकार में  भाग लिया था उसी वक्त तमिलनाडु का केंद्र में अलगाव समाप्त हुआ था। तब तक, उनका सिर्फ एक बाहरी समर्थन था और केंद्रीय राजनीति में उनकी  कोई सक्रिय भागीदारी नहीं थी।

एक आखिरी बिंदु है और फिर मैं रुक जाता हूँ। केरल में तो निश्चित रूप से ऐसा है। यह वामपंथी वर्चस्व  उनके राजनीतिक परिदृश्य में है और वहां के श्रमिक संघ  काफी संगठित और जुझारू थे। और शायद यही एक कारण था कि  उद्योग जगत केरल जाने से हिचकिचा रहा था। और उन्होंने अन्य राज्यों को प्राथमिकता दी जहां ये श्रमिक संघ कमजोर थे। नतीजतन, केरल ने उच्च शिक्षित अभियंतो, डॉक्टरों, नर्सों, मैकेनिकों को विदेशों में भेज कर उनकी निर्यात शुरू कि। तो, यह सब मैंने आपकी किताब से समझा और जो मुझे पसंद आया। 

अब, मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप हमें अपने बचपन की यादें बयां करें और आपके तमिलनाडु से केरल स्थलांतर की  कहानी बताएं। 

रेणुकादरअसल, मैं केरल और तमिलनाडु के बीच  समानताएं देखना चाहूंगी। और आज के परिप्रेक्ष्य से उनमें जो  अंतर और समानताएँ है। सबसे पहले राजनीतिक समानता;  इसमें मुख्य बात यह है कि ये दोनों राज्य  पूरी तरह से “भक्त” विषाणु से,  दक्षिणपंथी विषाणु से  मुक्त हैं।  ये दोनों राज्य इससे पूरी तरह से मुक्त हैं  और यही वह गढ़ है जिस पर... आज रास्वसं और भाजपा... वे इसी दरवाजे पर लगातार हथौड़ा मार रहे हैं…  वे किसी भी तरह इन दोनों राज्यों में प्रवेश करना चाहते हैं। और यह एक दिलचस्प पहलू है क्योंकि  दक्षिणपंथी विचारधारा के प्रति उनके प्रतिरोध का  कारण पूरी तरह से भिन्न है। केरल के मामले में, यह समाजवादी विचारधारा के कारण है। केरल शायद  दुनिया का पहला ऐसा राज्य है जहाँ एक वामपंथी सरकार एक  खुले तौर पर, निष्पक्ष चुनाव जित कर सत्ता में आई थी। और यह घटना आजादी के तुरंत बाद घटी।  लेकिन तमिलनाडु में एन दोनों पक्षों (डीएमके और एआईडीएमके) की  विचारधारा में वामपंथ का कही नामोनिशान भी नहीं है।  ये दोनों क्षेत्रीय पक्ष है...  वे दोनों क्षेत्रीय पक्ष हैं और वास्तव में,  यह वही तमिल राष्ट्रवाद, तमिल संस्कृति है... यह मूल रूप से एक जबरदस्त भावना है   जो उन्हें देश के बाकी हिस्सों से लड़ने के लिए प्रेरित करता है। और जैसा कि मैंने लिखा है, एक समय तो  उनमे ऐसी ख़ाहिश भी थी की  एक अलग तमिल राज्य (तमिल एलम) बनाया जाएँ।  तो, यही है इन दोनों राज्यों के बारे में सबसे महत्वपूर्ण कि इन दोनोंने दक्षिणपंथी ताकतों से  लड़ाई लड़ी, लेकिन उनके लड़ने के  कारण अलग-अलग थे। 

दूसरी बहुत महत्वपूर्ण बात  जो मैंने समझी है वह यह थी कि तमिलनाडु  अलगाववादी था।  इसकी शुरुआत एक अलगाववादी विचारधारा से हुई।  और यह तमिलनाडु में आज भी कुछ हद तक,   उसके संघवाद के प्रति लगाव के रूप में समाहित है। वे होंगे… मुझे लगता है कि तमिलनाडु  शायद भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है  जिसने संविधान के प्रावधानों के अनुरूप संघीय सीमाओं को आगे बढ़ाया है। और इसीलिए शिक्षा के लिए उनकी अपनी एक खुद की  नीति है और वे उस पर कायम रहते है। और वे यह एक उदहारण  के तौर पर दिखाने की कोशिश करते है कि आप  अपनी स्वयं की शैक्षिक नीति तैयार करने पर कितनी  स्वायतता दिखा सकते है। और जैसा कि आप फ्रांस से अच्छी तरह जानते हैं कि शिक्षा लोगों के दिमाग की कुंजी है। और खास करके जब बात राजनीतिक परिवर्तन, लोकतंत्र,  या इस तरह के किसी विषय की आती है,  तो यह बिलकुल महत्वपूर्ण है। इसलिए वे,  हम सभी के लिए शिक्षा की लड़ाई लड़ते है।  लेकिन जब मैं केरल गयी,  मुझे पता चला कि वहाँ अलगाव की अवधारणा को  कोई समझ नहीं पाता। उन्होंने कभी अलग राज्य बनाने के बारे में सोचा भी नहीं था... मेरा मतलब है, हालाँकि यह एक सच्चाई है कि स्वतंत्रता के  समय के दौरान त्रावणकोर – कोचीन (Princely state) ने एक स्वतंत्र राज्य बनने का प्रयास किया था। लेकिन अभी, आज, केरल में  ऐसा कोई नहीं है जो सोचेगा, चलो ठीक है,  हम किसी दिन इस देश को छोड़ सकते हैं...  हम भारत को छोड़ सकते हैं। कोई भी ऐसा नहीं चाहता... वे कभी खुद को भारत से अलग नहीं समझते क्योंकि उन्हें जो कुछ भी चाहिए,  वे इसे भारत के बाकी हिस्सों से प्राप्त करते हैं।  उनकी भोजन सामग्री और अन्य सभी प्रकार की जरूरते।  इसके अलावा, वे भारत में हर जगह जाते हैं और वहाँ काम भी करते हैं। हालाँकि यह (अलगाववाद) तमिलनाडु में होता रहा है  लेकिन इसका भावनात्मक पहलू, जो उनकी संरचना में ही शामिल है,  केरल में इस तरह की भावना बिल्कुल भी नहीं पाई जाती। और वहाँ (केरल में) हमेशा से दो राष्ट्रीय दल रहे हैं।  एक तो निश्चित रूप से वाम मोर्चा है।  और दूसरा, कांग्रेस का एक मध्यमार्गी मोर्चा है। तो, दोनों राज्यों के बीच  यह एक बड़ा अंतर है जो मैंने देखा है।  

अनुबंधधन्यवाद। 

तमिलनाडु में जो अलगाववादी प्रवृत्ति पाई गयी है उसके संबंध में मुझे कुछ कहना है… तो, पिछले साल, संयोगवश...  या यूं कहें कि इस साल... मेरी स्वीडिश राजनीति वैज्ञानिक, स्टेन विडमाल्म (Sten WIDMALM) से, उनकी किताब, “तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में कश्मीर”, के बारे में बातचीत हुई। उन्होंने कश्मीर और अन्य भारतीय राज्यों के बारे में तुलना करते हुए  कहा कि कश्मीर और तमिलनाडु में अलगाववादी प्रवृत्तियों से निपटने के लिए भारत सरकार का दृष्टिकोण बिल्कुल विपरीत था। उदाहरण के लिए, कांग्रेस ने जब यह देखा कि  डीएमके और अन्य क्षेत्रीय दल  एक अलग देश की मांग कर रहे थे और वे वहा की राजनीती पर हावी हो रहे थे, तो उस वक्त, कांग्रेस चुपचाप से पीछे हट गई और हाशिए पर चली गई। और अपनी चुनावी हार स्वीकार कर उसने वहां लोकतंत्र को फल-फूलने की अनुमति दी।  जबकि कांग्रेस का दृष्टिकोण कश्मीर के बारें में बिल्कुल विपरीत था,  जहां उसने कश्मीर राज्य की राजनीति में  हस्तक्षेप किया और वास्तव में वहां लोकतंत्र को उभरने नहीं दिया। दरअसल, लोकतंत्र के विकसित होने से कश्मीर में  एक अलग राज्य की मांग समाप्त करने कि संभावना बन सकती थी।

रेणुका: मैं उनकी कही बात से पूरी तरह सहमत हूं।

दरअसल, मैंने इस विषय पर अलग से  एक लेख लिखा था जब पिछली बार  कश्मीर में अशांति बढ़ रही थी। और मैंने दिल्ली में अपने अनेक वर्षों के वास्तव के दौरान यह देखा है कि किसी भी सरकार द्वारा कश्मीर को लोकतांत्रिक तरीके से  कार्य करने की कभी अनुमति नहीं दी गई।  बेशक, यहाँ एक ऐसे राज्य की बात हो रही है...  तमिलनाडु और कश्मीर के बीच एक छोटा सा अंतर है। वास्तव में यह एक मामूली अंतर है…  कश्मीर उत्तर में एक सीमावर्ती राज्य था   और वह  पाकिस्तान के  साथ लगा हुआ था। तो, उसकी पाकिस्तान के साथ एक भूमि सीमा थी। तो, इस वजह से कश्मीर की स्थिति  थोड़ी पेचीदा हो गयी। लेकिन फिर, तमिलनाडु भी  काफी हद तक एक सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित था।  उसकी सीमा के ठीक उस पार श्रीलंका था। और यह भारत और श्रीलंका के बीच  बस एक छोटा सा जल-रास्ता (strait) है। लेकिन, इसमें राजनीती की गयी।

तो, मुझे लगता है,  मेरी अपनी भावना यह है कि  भारतीय संघवाद की अधिक मात्रा उस कश्मीरी मानसिकता का, जो अलगाववाद थी, वह उसे पूरी तरह से ठीक कर सकती थी। और...  खैर, ऐसा लग सकता है कि … बेशक, ऐसा हो सकता है कि यह  एक बहुत ही सरल व्याख्या है लेकिन  मुझे अब भी लगता है कि अधिक से अधिक लोकतंत्र  यह हमेशा अलगाववाद का समाधान होता है। 

अनुबंध: धन्यवाद।

अब, मेरा सुझाव यह है कि मैं अपनी स्क्रीन आपसे साझा करूँ। 


क्योंकि मैंने आपकी किताब के कुछ पहलू लिए है और मैंने उसका एक छोटासा प्रस्तुतीकरण तैयार किया है। तो, आप इसे पहचान लेंगे। मुझे लगता है कि  हमारी बातचीत को आगे बढ़ाने से पहले एक व्यापक  दृष्टिकोण को अपनाना और किताब में आपने  जो तुलनात्मक अभ्यास किया है उसे सामने रखना जरुरी है।  यह लोकतंत्र के स्तंभों के बारे में है।  और यहाँ सबसे ऊपर, हमारे पास "जनता - मतदाता" हैं। यहाँ शासन की दो प्रमुख प्रणालियाँ हैं।  एक का नाम "वेस्टमिंस्टर" है,  जो हमारे यहाँ भारत और ब्रिटेन में है। और दूसरी "राष्ट्रपति " प्रणाली है जो अमेरिका और फ्रांस में है। हमारे यहाँ जो चार स्तंभ हैं, उनमें से पहला है विधानसभा / लोकसभा,  और फिर कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रसारमाध्यम हैं।  हालाँकि आपने प्रसारमाध्यम के लिए  कोई विशेष अध्याय,समर्पित नहीं किया है  लेकिन आपने इस विषय पर अन्य अध्यायों में चर्चा की है। 

इसलिए, विधानसभा / लोकसभा हमेशा जनता द्वारा चुनी जाती है।  इसमें एक लोकसभा और एक राज्यसभा होती है।  राज्यसभा के लिए प्रतिनिधियों का चयन अप्रत्यक्ष रूप से होता है। कार्यपालिका (मंत्रिमंडल) के मामले में, इसके सदस्य  चुन कर आ सकते है या उनकी सीधी नियुक्ति हो सकती है। तो, वेस्टमिंस्टर प्रणाली में एक प्रधानमंत्री होता है  जो वास्तव में सरकार का मुखिया होता है।  इसी तरह एक अलग “राष्ट्रपति प्रणाली” भी हैं। इसके बाद न्यायपालिका आती है।  न्यायपालिका के बारे में तीन दृष्टिकोण हो सकते हैं। यह इस बारे में है कि न्यायधीशों का चयन कैसे किया जाता है।  तो, भारत में एक "कॉलेजियम" प्रणाली है।  इसके अलावा “प्रतियोगी परीक्षाएं” हो सकती हैं। और फिर आते हैं "चुनाव"। इसके अलावा, न्यायपालिका निर्वाचित प्रतिनिधियोंद्वारा गठित नहीं है और इसलिए वह जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होती है। लेकिन, इस बात पर बहस चल रही है कि इसे भी जनता के प्रति  जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। और किताब में, आपने इस तथ्य के बारे में भी बात की, कि न्यायपालिका संविधान की सुरक्षा  और स्वामित्व के मानक की उत्तरदायी है।

इसके अलावा, किसी लोकतंत्र के लिए संविधान का अस्तित्व में होना अनिवार्य नहीं है।  उदहारण के तौर पर आपने कहा कि ब्रिटेन जैसे कुछ देश हैं, जिनके पास सामान्य अर्थों में कोई संविधान नहीं है।  और आपने बताया कि संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में  एक विशिष्टता है जहां राष्ट्रपति का चुनाव  "इलेक्टोरल कॉलेज" द्वारा किया जाता है जो कि राज्यों द्वारा  गठित संविधान है और न कि केवल सीधे जनमत से। और इसमें आपने ट्रंप का उदाहरण लिया। आपने कहा था कि ट्रंप जनमत के मत हार गए थे और वह फिर भी राष्ट्रपति बन गए। हालांकि अधिकांश  मतदाताओं ने उनके लिए अपना मत नहीं दिया। तो, मैं बस इतना ही  कहना चाहता था।

सबसे पहले, क्या आप मेरी  इस प्रस्तुति से सहमत हैं, जो मैंने आपकी किताब से बनायी है? और यदि इस बारे में आपकी कोई टिप्पणी हो, तो बताईयेगा।

रेणुका: हां, कुल मिलाकर, मोटे तौर पर यह ठीक है। 

किसी भी सरकार में तीन अलग-अलग शाखाएँ होती हैं। मेरा मतलब है, चाहे वहां लोकतंत्र हो या न हो, कम से कम लोकतंत्र में तो निश्चित रूप से ऐसा होता है। इसमें एक विधायिका होती है, एक कार्यपालिका होती है और एक न्यायपालिका होती है। तो यह है… यहाँ मैंने प्रसारमाध्यम को लोकतंत्र के लिए एक अलग इकाई के रूप में, एक आवश्यकता नहीं माना। क्योंकि जो मुझे लोकतंत्र की आवश्यकताएं लगती थीं, उसके अनुसार, मैंने अपनी खुद की   एक सूची बनाई थी। आपकी यह सूची किताबों में जो लिखा है उसके अनुसार  पूरी तरह से मेल नहीं खाती लेकिन यह वह संशोधित संस्करण है, यह लोकतंत्र का एक प्रकार का सिद्धांत है जो मैंने तैयार किया है। लेकिन मोटा मोटी यह सही है, उचित है। मेरा मतलब है, मुझे क्या कहना है यह आपको समझ आ गया है। 

अनुबंध: धन्यवाद।

और चूंकि हम इस बारे में बात कर ही रहे हैं,  मैं एक और सारणी प्रस्तुत करना चाहूंगा  जहाँ आपने भारत के बारे में,   भारतीय लोकतंत्र के बारे में  एक क्रम-सूची जारी कि है। तो, इसे मैंने आपकी किताब से तैयार किया है। 


आपने वहाँ उन्हें सूचीबद्ध किया था। और एक बार फिरमैं आपको इसकी पुष्टि करने के लिए आमंत्रित करूंगा। 

तो, यहाँ हमारे पास अलग-अलग मापदंड हैं। हर एक मापदंड को आपने १० में से अंक दिए हैं और मैंने वहां कुछ टिप्पणियों को अधोरेखित किया है।

तो, सबसे पहले बात करते हैं स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की। आपने इसके लिए १० में से ४ अंक दिए हैं। और वहां आपने ईवीएम में हेराफेरी,  मतदाता सूची से मतदाताओं का बहिष्कार, विपक्षी दलों को सरकारी तंत्र आदि के माध्यम से परेशान किया जाना, इत्यादि का जिक्र किया है।

दूसरा मानदंड: यहाँ आप अल्पसंख्यकों को अपने विचारों को  बयाँ करने की सुलभता पर बात करती हो।  यह किस हद तक अनुमत है? इसे १० में से ४ अंक मिले है। क्योंकि संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह,  परामर्शकारी और समावेशी प्रक्रियोंकी  काफी कमी है।

तीसरा मानदंड: न्यायपालिका के बारे में, आपने इसके द्वारा कभी-कभार संवैधानिक अधिकारों  और स्वतंत्रताओं की सुरक्षा  होने के कारण  १० में से ५ अंक दिए हैं। हालाँकि, मैं आपको इस मूल्यांकन पर पुनर्विचार करने के लिए आमंत्रित करना चाहूँगा क्योंकि मुझे यकीन नहीं है कि  इसे ५ अंक देना उचित होगा। इसका कारण दिन-प्रतिदिन भारत की न्यायपालिका के स्तर में गिरावट होना है और यह बहुत ही चिंताजनक है।

चौथा मानदंड: मतदाताओं के सवालोंके प्रति सरकार की जवाबदेही। इसके दस में से चार अंक है। इसका कारण सूचना के अधिकार को कमजोर करना और प्रसारमाध्यम पर कब्जा करना है।

पांचवा मानदंड: लोकतांत्रिक समतावाद। आपने इसे दस में से छह अंक दिए हैं। इसका कारण भारत में मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए  विरोध प्रदर्शन और भारी मतदान का प्रभावी अस्तित्व है। ये उसका स्पष्ट संकेत हैं। तो, मैं इससे सहमत हूँ।

छठा मानदंड: और चुनाव के बाद, सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण। मुझे लगता है कि यह मुद्दा महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के संदर्भ में, इसके बारे में  लोग ज्यादा बात नहीं करते। हम इसे स्वाभाविक मानते हैं।  हालांकि, भाजपा आज कल हर चुनाव परिणाम को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए, हर संभव करतूत करती है,  जिस वजह से इस मापदंड पर गंभीर समस्याएं खड़ी होती हैं। तो, यह मूल्यांकन १० में से ७ है।

राष्ट्रपति शासन का नियंत्रिक या कम उपयोग। यह तो निश्चित है। हमने भारत में २०१४ के बाद से राष्ट्रपति शासन के  बहुत कम मामले देखे हैं। जैसा कि उससे पहले  होता था और जिसका २०१४ के बाद डर था।

तो, औसतन, कुल मिलाकर,  भारत को दस में से पांच अंक मिलेंगे। 

तो, क्या आप इस प्रस्तुति के साथ सहमत हैं? 

रेणुका: हाँ।

मुझे लगता है कि आपने इसका बहुत अच्छे से सारांश प्रस्तुत किया है। 

दरअसल, जैसा कि आप बाईं ओर देख सकते हैं, ये छह बिंदु मूल रूप से हैं, जो मेरे विचार से लोकतंत्र के लिए आवश्यक तत्व हैं, मैंने उन्हें पहचान लिया था। तो, यह उन छह बिंदुओंके अनुसार  किया गया मूल्यांकन हैं... यह एक मोटामोटी मूल्यांकन है। इसमें कई संस्थाएं हैं, कई बहुत ही विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं है, जो वास्तव में  अपने अंकों को मात्रात्मक रूप से मापते हैं  और फिर वे भारत को अंक देते हैं। और हम (भारत) बहुत तेजी से निचे जा रहा हैं।  पिछले कुछ वर्षों में भारत के मूल्यांकन में गिरावट आई है। मेरा मतलब है, पिछले कुछ वर्षों में, कम से कम  पिछले १० वर्षों से तो निश्चित रूप से, अंतर्राष्ट्रीय मूल्यांकन में  भारत ने एक लोकतांत्रिक देश के रूप में  अपना स्थान खो दी है। यह तो निश्चित है।

तो, यह बहुत ही मोटामोटी मूल्यांकन है। और वैसे, मैंने यह सब, जिस समय यह किताब  छपने के लिए गई थी, उस वक्त लिखा था। इसमें कुछ चीजें ऐसी हैं... यह बहुत ही परिवर्तनशील वातावरण है और  इसमें चीजें लगातार बदलती रहती हैं।  तो, इसमें उतार-चढ़ाव चलता रहता है।

चूंकि हम बाद में न्यायपालिका के बारे में बात करने वाले हैं,  मैं हमारी छोटी सी बहस के बारे में, जो मेरे न्यायपालिका को दिए गए अंकों के बारे में है,  मै उसकी अभी बात नहीं करूंगी। लेकिन लोकतांत्रिक समतावाद के बारें में, मैं सचमुच बहुत खुश और प्रसन्न हूँ  कि आप भी यही मानते हैं, कि आप भी  उसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं जिस पर मैं पहुंची हूं। और अब हमारे पास और भी सबूत हैं, क्योंकि अभी जो हो रहा है,  वो ये है कि…आप अरावली पर्वतमाला की रक्षा के लिए हो रहे विरोध प्रदर्शन को देखिए।  ऐसा लगता है कि यह विरोध प्रदर्शन वास्तव में सफल रहा है।  मैंने आखिरी बार जब सुना था था, उसके अनुसार  सरकार अरावली पर्वतमाला में खनन की  अनुमति न देने पर  मान गयी थी। देखते हैं कि वे अपना वादा किस हद तक निभाते हैं।  हालांकि, यह अच्छी बात है कि लोग सतर्क हैं और वे वास्तव में जमीन पर उतरने में, आन्दोलन करने में और अपना प्रभाव डालने में सक्षम हैं।

इसलिए, यही कारण है कि मुझे  भारतीय लोगों में विश्वास है कि  वे आवश्यकता पड़ने पर,  विरोध प्रदर्शन का सहारा लेकर  बाजी अपनी तरफ पलट सकते है।

अनुबंध: और मुझे इस बात पर जोर देना चाहिए कि किताब में आपने जिक्र किया है कि आप स्वभाव से आशावादी हैं।

और मैं भी इससे सहमत हूँ  क्योंकि भारत और भारतीय हमें  कभी भी अविश्वसनीय तरीके से  चौंका सकते हैं। मिसाल की तौर पर, अतीत में जिस तरह से  किसानों का विरोध प्रदर्शन हुआ था, उसने हमें इस बात पर  विश्वास करने का एक कारण दिया। इसके अलावा,  नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ भी प्रदर्शन हुए थे। और ये सब जनविरोध की विशाल सार्वजनिक अभिव्यक्तियाँ हैं। वे सब वाकई प्रशंसनीय हैं।

इस संदर्भ में मुझे जो बात पसंद आई, वह यह है कि इसमें,  आपने खुद को भारतीय या विदेशी संस्थानों द्वारा जारी  क्रमसूची पर, केवल अपनी टिप्पणी करने तक ही सीमित नहीं रखा, लेकिन आप इससे एक कदम आगे गयी। और आपके अनुभवों के साथ, अपनी खुद कि एक क्रमसूची जारी कर आपने अपने विचार व्यक्त किए। और इससे चर्चा, बहस को बढ़ावा मिलता है। मैं इस कदम की वास्तव में सराहना करता हूं।

तो चलिए आगे बढ़ते हैं। 

अब मेरे पास एक ऐसा विषय है  जहां आपने एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू की बात की। पहला तो है कि आपने कहा कि  सभी मतों का मूल्य समान नहीं होता। और यह वास्तव में  मेरे लिए एक बेहद महत्वपूर्ण बात है। और दूसरा बिंदु है कि असल में (सत्तारूढ़) बहुमत अल्पसंख्यक है। यह भी आपकी ही एक अवधारणा है। 

तो, इन दो अवधारणाओं के आधार पर, मैं बस कुछ मुख्य बिंदुओं को पढ़ लूंगा। और फिर मैं आपसे,  दोबारा आपकी टिप्पणियां आमंत्रित करूँगा। 

तो, आपने कहा था कि संसद में राज्यवार सीट आवंटन पर गतिरोध बना हुआ है लेकिन अंतरराज्यीय निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण और  सीमाओं का निर्धारण पिछली बार २००८ में किया गया था, जैसा कि कुलदीप सिंह आयोग द्वारा अनुशंसित किया गया था। और यह रपट आपको सौभाग्यवश ही मिली था। जिससे आपको वाकई में कुछ  बहुत ही दिलचस्प बात पता चली...  और यह कहता है कि…  आपको इस तथ्य से आश्चर्य हुआ कि कर्नाटक में,  भारत के किसी भी राज्य के प्रति निर्वाचन क्षेत्र से मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक थी। इसका मतलब यह था कि कर्नाटक के मतदाता का मत अन्य (भारतीय) राज्यों के मतदाताओं की तुलना में कम मूल्य का था। और यह बहुत ही खुलासा करने वाला तथ्य है! 

फिर बाद में, जब आपने खुद  शांतिनगर (बेंगलुरु) से चुनाव लड़ा तो आपने जाना कि वहां २ लाख (२००,०००) मतदाता थे जबकि पड़ोसी निर्वाचन क्षेत्र, केआर पुरम में  ४ लाख (४००,०००) लोग थे। इसलिए, एक मत के प्रभाव के संदर्भ में इसका मूल्य लगभग आधा हो गया। और आम तौर पर लोग, उनके मतों के बारे में, इस परिपेक्ष में नहीं सोचते। और यह एक अहम् जानकारी है।

इसमें आपने सेवाभावी संस्था जनग्रह के सर्वेक्षण का जिक्र किया था। और उन्होंने पाया कि मतदाता सूची में  मौजूद नामों में से केवल ५५% ही  वास्तविक मतदाताओं के मत थे। और फिर आपने कुछ गिनती कीं।  आपका कहना है कि ५५ % वास्तविक मतदाताओं के साथ, और मान लीजिए कि कुल मतदान ६० से ७० % है...  और फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट मतगणना के अनुसार विधायक (विधानसभा सदस्य) या निर्वाचित प्रतिनिधि का चयन उनके निर्वाचन क्षेत्र के  केवल १० से १५% लोगोंके समर्थन से ही हुआ था! अतः, यही वास्तविकता है, यही कड़वी सच्चाई है। और आपका सवाल निम्नलिखित है: क्या इसे फिर जनता की सरकार और बहुमत का शासन  कहा जा सकता है?  तो, यह एक पहलू है और फिर एक आखिरी बात... 

इसका मतलब यह है कि चुनावी बहुमत वास्तव में एक अल्पमत है। और आपने कहा कि बहुमत वास्तव में एक अल्पसंख्यक है...  और लोकतंत्र ने अल्पमत वाली “हिंदुत्व” की विचारधारा को  सत्ताधारी विचारधारा बनने कि अनुमति दी। तो, यह वास्तव में लोकतांत्रिक उत्साह और निष्पक्षता के उस वादे को पूरा करता है जहां एक अल्पसंख्यक विचारधारा, एक दिन, सत्ताधारी बहुमत बनने का ख़्वाब देख सकती हैं।

तो, इन विचारों के लिए, सहे दिल से आपका धन्यवाद।

अब, मैं आपको इसपर टिप्पणी करने के लिए आमंत्रित करता हूं। 

रेणुका: दरअसल, आपको अगर कोई आपत्ति न हो तो  मुझे थोड़ा पीछे जाने दीजिए। 

क्योंकि इस किताब को लिखते समय  मुझे यह एहसास हुआ और इसे लिखते समय  मुझे यह बात समझ में आई कि  जब लोकतंत्र को परिभाषित किया गया था, जब आप इसकी परिभाषा करते हैं, तो जनतंत्र अंततः बहुमत के शासन पर निर्भर करता है। और इस में मुझे यह पता लगा कि... हमारे पास जो उपकरण हैं... और मैं विशुद्ध रूप से लोकतंत्र के तकनीकज्ञ के रूप में  बात कर रही हूँ और किसी अवधारणा के दृष्टिकोण से नहीं... तो लोग जब एक प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं, तो उनकी पसंद को जानने के लिए अगर मेरे पास सही उपकरण हैं, तो क्या मैं वास्तव में एक विधायिका का संचालन कर रही हूँ,  या संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका का भी?  कार्यपालिका का चुनाव वास्तव में विधायिकाद्वारा किया जाता है। तो क्या अंततः मैं एक ऐसी सरकार का गठन कर रही हूँ...  जो बहुमत का प्रतिनिधित्व करता है?

और जो मैंने पाया वह मेरे लिए बेहद भयावह था। असल बात यह है कि  दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में इसके लिए  आवश्यक साधन नहीं है! अब, यह विवादास्पद हो सकता है,  लेकिन मुझे लगता है कि हम सभी को इस बारे में सोचना चाहिए। किसी भी लोकतंत्र में हमारे पास आवश्यक साधन नहीं है,  यह सुनिश्चित करने के लिए कि जब लोग मतदान करें,  या जब हम मतदान प्रक्रिया से गुजरते हैं,  तो हमें उम्मीद होती है कि अंततः हमारे पास एक विधायिका और एक कार्यपालिका होगी  जिन पर बहुमत का समर्थन या स्वीकृति है। हालांकि, अंततः हमें जो मिलता है वह एक ऐसी सरकार है जिसके विरुद्ध बहुमत ने मतदान किया है! यह तो वाकई में एक बड़ी खोज है। इसका मतलब यह नहीं है  कि मैं लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखती हूँ...  या हमें लोकतंत्र को आजमाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। क्योंकि, मुझे लगता है कि लोकतंत्र ही संभवतः मनुष्यों के पास एक ऐसा अविष्कार है  जो सबसे आशावादी अवधारणाओं में से एक है और हम अभी तक इसमें सफ़ल नहीं हुए हैं। 

जनता की सरकार लाने के अपने लक्ष्य से, जिसकी हम सभी कोशिश कर रहे हैं, इस लक्ष्य से हम अभी भी बहुत दूर हैं।  जब हम अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। क्योंकि हम सचमुच के बहुमत तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। तो, मेरी परिभाषा में, सरकार के संदर्भ में  इसका मतलब यह होगा कि विधायिका एक ऐसी जगह नहीं है जहाँ बहुमत बैठता है। वास्तव में यह एक ऐसी जगह है जहाँ अल्पसंख्यकों का एक मिश्रण है। मैं इसे इसी तरह देखती हूं।

तो, मैंने जो किया है  वह यह है कि मैंने इन छह कारणों को समझाया है। मैंने इन्हें छह कारणों को सामने रखा है जो वास्तव में  यह साबित करते है कि हम जो करने की कोशिश कर रहे हैं,  हम उसे हासिल करने में कामयाब नहीं हो रहे है। और बेशक, पहला सवाल है कि मूल रूप से  हमारी मतदाता सूची पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हैं। किसी विशेष क्षेत्र में जिन लोगों को मतदाता सूची में शामिल किया जाना चाहिए और हमारे पास मौजूद  जो वास्तविक मतदाता सूची है, इस बीच बहुत बड़ा अंतर है। बेशक, इस असमानता की सीमा का पता लगाने का  एकमात्र तरीका यही है कि हम मूलतः प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र का अध्ययन करें। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची का अध्ययन करें। आप इस पर कुछ प्रतिस्थापन नहीं कर सकते, आप केवल नमूना सर्वेक्षण नहीं कर सकते। इससे वास्तव में  कुछ भी साबित नहीं होता। वास्तविक स्थिति एक निर्वाचन क्षेत्र से दूसरे निर्वाचन क्षेत्र तक बिल्कुल अलग हो सकती है।

और बेशक, मैंने आपको  जनग्रह सर्वेक्षण के बारें में बताया है  जो कि, दरअसल,  इसे खास प्रचारित नहीं किया गया था। और यह कहने की प्रवृत्ति थी, नहीं,  इसके बारे में बात मत करो। यह एक मुद्दा था।

अब, आपने जो दूसरा मुद्दा उठाया है, जिसका जिक्र आपने प्रत्येक मत के महत्व के बारे में किया है, यह निर्भर करता है,  किसी क्षेत्र में निर्वाचन क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय आनजान को  वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार आपके ढलने कि क्षमता पर।  और यह किसी भी लोकतंत्र में असंभव है।  मेरा मतलब है, आप जो भी करें,  आप इसे तात्कालिक आधार पर नहीं कर सकते। अब, भारत जैसे देश में, यह बेहद मुश्किल हो जाता है। क्योंकि कुलदीप सिंह आयोग का अहवाल  २०१० की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित था। और हमने २०२० तक जनगणना नहीं कराई है। और अभी भी १५ साल बीत चुके हैं। हम अंततः एक ऐसी स्थिति में पहुँच रहे हैं  जहां हम ज़मीनी हकीकत से बहुत पीछे हैं। यह पहली समस्या है। 

दूसरी समस्या यह होगी कि जब हम सीमाएँ निर्धारित करते हैं…  हम एक बड़ा टकराव देखने जा रहे है उन राज्यों के बीच जो संसद में अपना प्रभाव खोने वाले हैं क्योंकि उनकी आबादी को नियंत्रित किया गया है,  इसके विपरीत जिन्होंने ऐसा नहीं किया है,  या मान लीजिए कि उनका उनकी आबादी को नियंत्रित करने का तरीका कम प्रभावी है। इसलिए,  वहाँ एक समझौता था। यह एक राजनीतिक समझौता था, लेकिन यह लोकतांत्रिक नहीं था। यह एक राजनीतिक समझौता था जिसके परिणामस्वरूप मूल रूप से यह है कि किसी राज्य को दी गई सीटों की संख्या को  बहुत पहले की जनगणना तिथि तक सीमित रखा गया है  ना कि वास्तविक स्थिति के अनुरूप। और यह सब  अगले साल पुनर्विचार के लिए आगे आयेगा। और तमिलनाडु जैसे राज्य  स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठा रहा है कि उनकी सीटों की संख्या कम होने वाली है,  या कम से कम संसद में उनका प्रभाव कम होने वाला है।  तो, तब तक यह नियंत्रण में  है।  लेकिन असल में, कर्नाटक के परिणाम  जिसका आपने जिक्र किया है, वह इसलिए हुआ क्योंकि सांसदों की संख्या को स्थिर रखते हुए,  इसे बदले बिना, उन्हें फिर भी जनसंख्या का आवंटन कर्नाटक की विभिन्न संसदीय  सीटों के बीच करना था। और बेशक, उन्होंने कुछ संसदीय सीटों की सीमाओं को बदलें का काम किया लेकिन जाहिर तौर पर, अंततः इसका जो परिणाम निकला  वो  बिल्कुल अलग था। और यह बहुत पुराने आंकड़ों पर,  जनगणना के पुराने आंकड़ों पर आधारित है। तो, यह स्थिति पूरी तरह से भ्रमित है। यह पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया है। 

और मैं सोच रही थी कि राजनीति का कोई भी छात्र एक  दिलचस्प काम कर सकता है। आप ऐसा कर सकते है  कि आप आपके एक मत को ले सकते हैं और बस यह गणना  कर सकते है कि कौन से निर्वाचन क्षेत्र है जिसमें  आपको अपने मत का अधिकतम प्रभाव मिलेगा।  शांति नगर में मेरे मत की कुछ अहमियत है और शायद, अगर मैं कहीं और  मत दूं... और आप इस प्रयोग को किसी राज्य के भीतर सिमित रख सकते हैं और देख सकते है कि आपके मत का क्या मोल है,  यदि आप मतदाता सूची में शामिल लोगों की  संख्या के अनुसार निर्वाचन क्षेत्र A से B, फिर C,  और अंत में D की ओर बढ़ते है। इसलिए, यह एक बेहद दिलचस्प अभ्यास होगा।

अनुबंध: और मुझे यही बात सबसे ज्यादा पसंद आई कि एक नागरिक के तौर पर,  यह सिर्फ "निष्क्रिय मतदाता" होने कि बात नहीं है बल्कि  एक "सक्रिय भागीदार",  एक सक्रिय नागरिक होने कि बात है,  और यही एक आमंत्रण है  जो आप हम सभी को,  इन विचारों के माध्यम से दे रही हो। और मैं वास्तव में इस बात कि सराहना करता हूं। 

तो चलिए आगे बढ़ते हैं, हालांकि हमारे पास  ज्यादा समय नहीं बचा है और इसलिए हम शायद  हर चीज के बारे में विस्तार से बात नहीं कर सकते।  फिर भी, सूचना के अधिकार (आरटीआई) के बारे में,  सूचना का अधिकार अधिनियम, जो अब काफी कमजोर हो चुका है,  इसके बारे में आपने जो सुझाव दिया है वह बहुत सराहनीय था और  मैं इसे यहाँ रेखांकित करना चाहता हूँ या इसे यहाँ  कहना चाहता हूँ। यह दिल्ली के मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा दिया गया है।  उन्होंने कहा था कि आरटीआई के माध्यम से जो जानकारी पहले से ही मौजूद है, आरटीआई के तहत जारी या उपलब्ध कराई गई जानकारी है, इसे विभागीय वेबसाइट पर डाल देना चाहिए, इससे लोग बार-बार वही सवाल पूछने से बचेंगे  और पूरी व्यवस्था को फिर से काम न करना होगा। तो, यह एक बेहतरीन सुझाव है। मुझे यह जानकारी आपकी किताब की बदौलत मिली। 

अब आइए जातिगत राजनीति की ओर बढ़ते हैं। और यह आपकी किताब का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। मैं यहाँ कुछ मुद्दों को पढ़ूंगा जो  मुझे वास्तव में पसंद आये और जिसके बारे में मुझे पहले ज्यादा जानकारी नहीं थी, जैसे कि शादी के बाद महिलाओं को किस प्रकार अपनी जाति से बाहर वर्गीकृत किया जाता है। मतलब अंतरजातीय विवाह। आपने कहा है कि हालांकि अदालतों ने  यह माना है कि ऐसी महिलाएं अपनी शादी के बाद  अपनी जन्म जाति में जारी रहेंगी और उनके बच्चोंको  दोनों अभिभावकों में से किसी एक की ओर से  जातिगत स्थिति का दावा करने का विकल्प है।  हालाँकि, अक्सर सरकारी अधिकारी उन्हें अपने पिता की जाति के अधीन  वर्गीकरण करने पर जोर देते है। और मुझे पता नहीं था  कि कानून द्वारा यह सुरक्षा  या प्रावधान मौजूद था। मैंने इसे स्वाभाविक मान लिया था कि शायद यह इसी तरह होगा।  क्योंकि हमारे समाज में यह मान लिया जाता हैं कि महिलाओंको अपने पतियों की जाति में  शामिल कर लिया जाता है। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि आपने हमें इसके पीछे कि कानूनी पृष्ठभूमि भी बताइ।

फिर आपने डॉ. अंबेडकर का हवाला दिया जिन्होंने कहा था कि “जाति से उत्पन्न सामाजिक, शैक्षिक और आय संबंधी असमानताएं  राजनीतिक समानता को विकृत कर देगी जो कि लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।“ अब, शायद बहुत से लोग उनकी यह बात जानते हैं  लेकिन आज के समय में  इस बात को फिर से दोहराना महत्वपूर्ण था।

और आपने बाद में कहा कि  एक राजनेता का दृष्टिकोण होता है कि जाति व्यवस्था राजनीतिक दलों को न्यूनतम प्रयास से अधिकतम लाभ उठाने के लिए मदद करती है जिससे उनका समर्थन आधार मजबूत हो जाता है। तो यह हमें समझाता है  कि यह किस तरह से काम करता है। और आपने कहा कि यह बहुत ही उल्लेखनीय था और बहुत कम लोग इस तरह से सोचते हैं।  आपने जाति का राष्ट्रीय चुनावों पर और राज्य की राजनीति पर कैसे भिन्न प्रभाव है  इस के बारे में बात की है। और कैसे केंद्र की तुलना में जाति राज्य स्तर पर  कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। आपने इस बात को भी  उजागर किया कि कैसे जातिगत राजनीति का  भारत पर समग्र रूप से  प्रभाव के बारे में  अभी तक कोई शास्त्रीय अध्ययन नहीं हुआ है। इसलिए, हमें राज्य जाति राजनीति  के बारे में कई अध्ययन देखने को मिलते हैं,  लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर नहीं।  यह एक महत्वपूर्ण पहलु है। आपने आगे यह भी  उल्लेख किया कि जाति का प्रभुत्व बना रहता है अगर  देशभक्ति की भावना पर आधारित कोई लहर, जैसे पुलवामा,  या सहानुभूति का कोई कारण, जैसे राजीव गांधी,  इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कि स्थिति ना हो। या फिर सिर्फ नफरत, जैसे मुसलमानों के खिलाफ नफरत,  ठीक वैसे ही जैसे २००२ में गुजरात चुनावों में हुआ था। 

और फिर आप थोड़ा इतिहास की ओर लौटती हों। आपने १९८५ के कर्नाटक चुनावों के बारे में बात की और  आपने रामकृष्ण हेगड़े की जनता दल का उदाहरण दिया  जो उस वक्त कर्नाटक में सत्ता में आया था। हालाँकि उन्होंने दिसंबर १९८४ में लोकसभा की सीटें  बड़ी संख्या में खो दि थी। इस प्रकार, यह इस बात का उदाहरण है कि राज्य और केंद्रीय चुनाव में, लगभग एक ही समय पर मतदाता किस प्रकार अलग-अलग तरीके से मतदान करते हैं। फिर, ज़ाहिर है,  हमारे पास आम आदमी पार्टी (आप) का उदहारण है जिस प्रकार उन्होंने २०१५ में और २०२० में भी दिल्ली विधानसभा चुनाव जीता हालाँकि उन्हें केंद्र में ज्यादा सीटें नहीं मिल पायी।

अब आखिरी हिस्सा। और मैं इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूँ क्योंकि यह कर्नाटक में रहने वाले  लिंगायतों और वोक्कालिगा लोगोंके के बारे में था। मैं इसकी सराहना करता हूँ क्योंकि अब मुझे इसकी  ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वहाँ दलवार गणनाएँ कैसी होती है और चीजें कैसे काम करती हैं, यह समझ आया है।

और एक आखिरी बात है। “जाति की धारणा समानता और बंधुत्व के विचारों के विपरीत है जिस पर लोकतंत्र आधारित है।"

तो, मैंने इन सबको जातिगत विचार-विमर्श के  मुख्य बिंदुओं के रूप में एक साथ समूहित किया है जिसका जिक्र आपने किताब में किया था। 

तो, अगर आपके पास कोई टिप्पणी हो तो कृपया बताएं। 

रेणुका: मैं अब जिस जातिगत मुद्दे पर चर्चा करने जा रही हूँ वह भारत के अलावा किसी अन्य देश पर  लागू नहीं होता। क्योंकि असल में, दुनिया में हम ही एकमात्र ऐसे देश हैं  जिनमें जाति व्यवस्था प्रचलित है। असल में,  मैंने इस पर सामाजिक, या फिर धार्मिक दृष्टिकोण से  चर्चा नहीं की लेकिन जिस हद तक यह  लोकतंत्र का राजनीतिक परिणाम प्रभावित करता है, केवल उस हद तक। और हाँ, मेरा निष्कर्ष और मेरी परिकल्पना यही है। यह मूलतः एक परिकल्पना है क्योंकि मैं,  मुझे जिन कुछ राज्यों के बारे में जानकारी है  केवल उसके आधार पर काम कर रही हूँ। जातिगत कारक राज्य स्तरीय चुनाव पर  अपना असर केवल उसी स्थिति में  डालता है  जब और कोई बड़ा मुद्दा न हो  जिसका इस्तेमाल वहां चुनाव प्रक्रिया को तोड़-मरोड़ करने के लिए किया जा सकता है। इसलिए, लोग सोचते हैं कि उनकी पहचान  जाति से जुड़ी हुई है।  और कुछ हद तक उनकी आर्थिक स्थिति अभी भी जाति से जुड़े हुई हैं क्योंकि उनमें से कुछ...  यह एक संघ (guild) की तरह है, एक मध्ययुगीन संघ की तरह, जिसके हम सभी सदस्य हैं। हम सब किसी विशेष व्यवसाय से जुड़े लोग है। लोगोंका पेशा शुरू से ही जाति से जुड़ा हुआ था। तो, आपका एक निश्चित आर्थिक हित है जो कि  आपकी जाति से जुड़ा हुआ है।  तो, ये दो चीजें हैं जो वास्तव में  चुनाव में निर्णायक साबित होती है।

अब, मुझे कम से कम तीन ऐसे क्षण मिले है जब जाति का मुद्दा राष्ट्रीय चुनाव के लिए  महत्वपूर्ण हो गया था। पहला मौका तब आता है  जब, अंबेडकर की बदौलत,  संविधान सामने आया और हमने दलितों के लिए  आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र बनाए थे। यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय था जिसे  संविधान लागू होने के समय लिया गया था।  तो, यह एक महत्वपूर्ण कारक है।

दूसरा मामला मंडल आंदोलन के समय का था। उस समय एक भावना थी… और इसका कारण हमें अभी तक नहीं पता...  इसका विश्लेषण अत्यंत सटीक  शास्त्रीय तरीके से नहीं किया गया है।  जहां तक मुझे पता है,  उस हद तक कि मंडल कारक (factor) की वजह से  चुनावों में फर्क पड़ा, जो घटना वी.पी. सिंह के पद छोड़ देने के बाद घटी थी, और जिसकी वजह से चुनाव, मध्यावधि चुनाव, उस समय  लगभग चुनाव जैसी स्थिति बन गई थी।  यह एक दिलचस्प अध्ययन है जिसे करने की आवश्यकता है।  क्योंकि मंडल राष्ट्रीय स्तर पर सचमुच  एक अहम् मुद्दा बन गया । 

और तीसरा बिंदु अब आने वाला है जब वास्तव में जाति जनगणना का मुद्दा चर्चा के लिए आने वाले समय में आगे आने वाला है। और यह काफी दिलचस्प होने वाला है। यह बहुत विवादास्पद है और इस पर चर्चा जरूर होगी। यह एक राष्ट्रीय मुद्दा बन जाएगा।

अब, एक मुख्य कारण जिसकी वजह से क्यों राज्य स्तर पर परिणाम, राज्य स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर  जाती के मुद्दों से प्रभावित नहीं होते है...  यह इसलिए, क्योंकि...  क्योंकि हमारे पास नहीं है...  किसी जाति का प्रभुत्व सभी राज्यों में एक जैसा नहीं होता है। आपके पास जातियों का बिल्कुल एक अलग समूह है जो संभवतः केरल में हावी हैं। कर्नाटक में जातियों का एक अलग समूह है। और वे आसानी से चातुर्वर्ण ढांचे में समाहित नहीं होते  जिसके बारे में अंग्रेज बात कर रहे थे। हम किसी चातुर्वर्ण संरचना में नहीं हैं। इसलिए, हम कहीं अधिक कठिन, जटिल परिस्थिति में हैं जहां लोगों ने कब्जा कर लिया है…  कुछ समुदायों ने सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले ली है। और जब उनके पास राजनीतिक सत्ता होती है, तो फिर वे इसे दूसरों के साथ साझा नहीं करते। यह तो स्वाभाविक ही है।  यह मानवीय स्वभाव है। और आखिरी बात... मुझे लगता है कि कर्नाटक की स्थिति यह बात पूरी तरह से साबित करती है कि एक राष्ट्रीय दल  किसी राज्य में पैर जमाने की कोशिश दो तरीकों से करता है। पहला उपाय है कि जाति के मुद्दे से ऊपर उठकर  किसी प्रकार का राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर, जैसे कि घृणा। जिस तरह आ राजीव गांधी के बारे में बात कर सकते हैं,  उनकी माता (इंदिरा गांधी) के मृत्यु के बाद उभरी स्थिति में। इस प्रकार, जाति के मुद्दे से कोई फर्क नहीं पड़ता जब आपके पास कुछ और बड़ा मुद्दा हो। जब हर कोई किसी और चीज के बारे में सोच सकता है। अब, यह एक अच्छी बात हो सकती है या फिर  यह नफरत जैसी कोई बुरी चीज हो सकती है। या फिर सिर्फ देशभक्ति की एक सामान्य भावना कि हम किसी दूसरे देश से लड़ रहे हैं और यह कि बाहरी देश हमें धमकी दे रहा है। लेकिन, अगर वे वह कहानी नहीं बना सकते,  तो यह राष्ट्रीय दल क्या करता है कि वह  राज्य दलों के साथ गठबंधन बनाता है।

और कर्नाटक में ठीक यही हुआ है। अब, अगर मैं कर्नाटक के बाहर के किसी भी व्यक्ति से पूछूं,  तो उन्हें लगता है कि कर्नाटक के बहुत से लोग दक्षिणपंथी विचारधारा में विश्वास रखते हैं क्योंकि यहाँ  भाजपा की सरकारों के कारण हमने ऐसी नीतियां अपनाई हैं।  सच्चाई तो यह है कि कर्नाटक में कट्टरपंथी,  दक्षिणपंथी विचारधारा  अभी भी काफी हाशिए पर है। यह केवल कर्नाटक के तटीय क्षेत्र में ही है जहाँ आपके पास ऐसे बहुत से लोग हैं जो शुरू से ही,  जो हमेशा से हिंदुत्व में विश्वास रखते आए है। और फिर कोडावा नामक छोटे जिले में। कोडावा समुदाय।वह भी इस प्रकार विचार करते है। बस इतना ही।अब, कुछ हद तक, यह धीरे-धीरे बैंगलोर में फैल रहा है। जो कि एक बहुत ही शहरीकृत क्षेत्र बनता जा रहा है। और यहाँ कर्नाटक के बाहर से भी बहुत सारे लोग हैं जो  बैंगलोर आकर रहने लगे है। इसलिए, बैंगलोर वास्तव में, उस अर्थ में  एक कन्नडिगा शहर नहीं है। इसमें बाहर से आए हुए बहुत से लोग हैं  जो अपने पूर्वाग्रहों को साथ लाते हैं  लेकिन यह वास्तव में कर्नाटक नहीं है।

अब सवाल यह है कि भाजपा ऐसा करने में सक्षम क्यों रही है? कर्नाटक में उनका सत्ता में आना इसलिए हो पाया  क्योंकि उन्होंने एक पीड़ित समुदाय के साथ जातिगत गठबंधन किया था जो बहुत लंबे समय तक  सत्ता के सुखों का आनंद ले रहा था। और वे इस बात से बहुत घमंड करते थे। वे लिंगायत थे। लिंगायत ही वे लोग थे जिन्होंने, प्रारंभ से, आप यदि कर्नाटक के  राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें,  स्वतंत्रता के बाद, एक मुख्यमंत्री  के बाद दूसरा,  वे सब लिंगायत समुदाय से थे। और लिंगायतों को  लगता था कि उन्हें राजनीतिक रूप से जो कुछ हो रहा है  उस पर नियंत्रण रखने का अधिकार है। और सत्ता के  वे सभी फल जो अब उनके पास थे, उसकी बदौलत  उन्होंने दूसरों को पूरी तरह से हाशिए पर डाल दिया था। और यह घटना लगभग तुरंत बाद घटी जब मैं कर्नाटक आयी थी। और उसके बाद मैंने देखा कि कैसे मुख्य मंत्री देवराज देवराज अरासु ने अपनी चाल चली। उन्होंने अन्य सभी समुदायों को एकत्रित कर लिया,  जो प्रमुख जाती (लिंगायत) का हिस्सा नहीं थे और उन्होंने उनका एक गठबंधन बनाया। और उस गठबंधन के साथ,  वह व्यावहारिक रूप से सत्ता में बने रह सकते थे, एक प्रकार का बहिष्कार करके। यह कहते हुए कि "मैं लिंगायतों को  हमारे साथ नहीं लूँगा"। क्योंकि लिंगायत बहुत घमंडी थे और वे अपनी सत्ता किसी के साथ साझा नहीं करते थे।  तो, वे सचमुच मुसीबत में पड़ गए थे और उन्हें भाजपा के रूप में एक प्रायोजक मिल गया।

और भाजपा को इसमें  एक बहुत अच्छा अवसर दिखाई दिया। एक गठबंधन का गठन हुआ। क्योंकि भाजपा, अपने कट्टरपंथी विचारों के साथ,  कर्नाटक में सत्ता में नहीं आ सकती। वह केवल जाति का उपयोग करके ही सत्ता प्राप्त कर सकती है।  और यकीन मानिए, लिंगायत कट्टरपंथी नहीं हैं।  दरअसल, यही सच है। इसलिए, हमारे सामने  एक बहुत ही दिलचस्प स्थिति है जहाँ एक  राष्ट्रीय दल लिंगायतों के साथ अपने संबंधों को  मजबूत कर राज्य में सत्ता में आ गया।  और मुझे यकीन है कि अलग-अलग राज्यों में वे परिस्थतियाँ होंगी जो  उस राज्य के लिए बहुत विशिष्ट है।  किसी राज्य में चुनाव के समय की स्थितियां। उदाहरण के लिए, अब गुजरात चुनाव आ रहे हैं। अगर आप कुछ राजनैतिक विशेषज्ञों की बात सुनें,  जो उस राज्य के बुद्धिमान टिप्पणीकार हैं,  राजनीतिक टिप्पणीकार,  वे जातिगत मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करेंगे।  और हम बाकी सब लोग उन्हें सुनेंगे  और इसे समझने कि कोशिश करेंगे।  इसलिए, मेरा यही मतलब था,  जब मै कह रही थी कि प्रत्येक राज्य की अपनी… लगभग सभी राज्यों की अपनी-अपनी विशिष्टताएँ हैं।

अब, अगर आप चाहते हैं तो मै यहां  आम आदमी पार्टी (आप) का सिर्फ एक बार जिक्र करना चाहूंगी।  मैं आपको बताऊंगा कि मैंने आम आदमी पार्टी के बारे में  क्या समझा। वह बिना किसी भी जाति समूह के साथ  गठबंधन बनाये सत्ता में आने कि  कोशिश कर रहे थे। उन्होंने दिल्ली में ऐसा किया। लेकिन मुझे सबसे ज्यादा  आश्चर्य पंजाब में घटी घटना से हुआ। क्योंकि पंजाब में, जाहिर है कि शिरोमणि अकाली दल को  लोगोंका बहोत समर्थन था। और मुझे पता नहीं हैं… मुझे अब भी समझ नहीं आ रहा है कि कैसे आप पंजाब में अपना पाँव जमा सका। वे कोशिश कर रहे हैं कि  शायद कोई ऐसा रास्ता खोजे जिससे  जाती का मुद्दा अप्रासंगिक हो जाये। मैं यह नहीं कह रही हूं कि  कोई चीज अच्छी है या फिर बुरी है। उन्होंने वहां जाती के मुद्दे का इस्तेमाल नहीं किया है।

और मेरे अपने अनुभव में, जब मै बैंगलोर में  घूम-घूम कर चुनाव प्रचार कर रही थी, तब मैंने देखा कि युवा लोग शायद खुले विचारों वाले हो सकते हैं। कुछ ऐसा अपनाने के लिए तैयार हो सकते है जो जाती के मुद्दे से परे हो। और मैं इसके (जाती के) पक्ष में या विपक्ष में नहीं हूँ। मेरा मतलब है,  मेरी इस पर कोई विशेष राय नहीं है। मैं बस इतना कह रही हूं कि यह एक चलन है, जो बाजार में उपलब्ध है,  मौजूद है।

अनुबंध: खैर, पंजाब में ऐसा होता आ रहा है, जब  २०१४ के लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद  जहां पंजाब में आप ने चार सीटें जीतीं।  और यह २०१५ और २०२० में दिल्ली में  आम आदमी पार्टी की अभूतपूर्व जीत के पहले था। तो, खैर, यह इस बात का एक प्रमाण है  कि पंजाब के लोग नए, जोखिम भरे  निर्णय लेने से  कतराते नहीं हैं। 

रेणुका: आप ठीक कह रहे हैं!

अनुबंध: धन्यवाद। 



 

रेणुका विश्वनाथन

 

रेणुका विश्वनाथन एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं। अपने ३७ वर्षों से अधिक के लंबे प्रशासनिक सफ़र में, उन्होंने विभाग प्रमुख से लेकर राज्य और केंद्रीय सचिवालय तक विभिन्न पदों पर कार्य किया है। मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार में रेणुका ग्रामीण विकास सचिव भी रह चुकी हैं।

२०१८ में, रेणुका ने राजनीति में अपना पहला कदम रखा जब उन्होंने आम आदमी पार्टी के बैनर तले बेंगलुरु के शांति नगर निर्वाचन क्षेत्र से कर्नाटक विधानसभा चुनाव लड़ा।

रेणुका मतदाता पंजीकरण और शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों के स्कूलों में नामांकन के लिए एक सक्रिय कार्यकर्ता रही हैं। वह पर्यावरण और महिला मुद्दों में भी शामिल हैं।

रेणुका कई भाषाएँ धाराप्रवाह बोलती हैं, जैसे मलयालम, तमिल, कन्नड़, हिंदी, अंग्रेजी, फ्रेंच और स्पेनिश। इसके अलावा, उन्हें फिल्मों, नाट्यकला, संगीत, साहित्य और कला में गहरी रुचि है। उन्हें यात्रा करना, पढ़ना और भी बहुत कुछ पसंद है।

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